मानवता को शर्मसार करती मानव तस्करी

मानव तस्करी दुनिया भर में एक गंभीर समस्या बनकर उभरी है। यह एक ऐसा अपराध है जिसमें व्यक्ति को उनके शोषण के लिये खरीदा और बेचा जाता है। कोरोना संकमण काल में तो मानव तस्करी को लेकर स्थिति और बदतर हुई है। वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस घृणित अपराध के खिलाफ कार्रवाई करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को प्रोत्साहित करने हेतु ‘मानव तस्करी से निपटने के लिये वैश्विक योजना ‘ (द ग्लोबल प्लान ऑफ एक्शन टू कॉम्बैट ट्रैफिकिंग इन पर्सन्स) को अपनाया था। संयुक्‍त राष्‍ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय द्वारा जारी मानव तस्करी पर वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्र अब इस अपराध के प्रति जागरूक हो रहे हैं, पीड़ितों की पहचान कर रहे हैं और अधिक-से-अधिक तस्करों को सज़ा दे रहे हैं। महिलाएँ और लड़कियाँ मानव तस्करी से सर्वाधिक पीड़ित हैं। इनमें से अधिकांश की तस्करी यौन शोषण के लिये की जाती है।
मानव तस्करी से जुड़े मामले में 2020 में भारत को गत वर्ष की भांति टियर-2 श्रेणी में रखा गया है। कोरोना संकमण काल में तो मानव तस्करी को लेकर स्थिति और बदतर हुई है। सरकार ने 2019 में मानव तस्करी जैसे बुराई को मिटाने के लिए प्रयास तो किये लेकिन इसे रोकने से जुड़े न्यूनतम मानक हासिल नही कर पायी। आज भी भारत वर्ल्ड ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मानचित्र पर अहम ठिकाना बना हुआ है।राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2016 में भारत में मानव तस्करी के 8000 से ज़्यादा मामले सामने आए। वर्ष 2015 में मानव तस्करी के 6877 मामले सामने आए थे। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने भी यह बात पूरी दुनिया के सामने जाहिर किया है। माओवादी / नक्सली समूहों ने हथियार और आईईडी को संभालने के लिए छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे राज्यों में 12 वर्ष तक के कम उम्र के आदिवासी बच्चों को जबरन भर्ती करता है और मानव ढाल के तौर पर भी उनका इस्तेमाल करता आ रहा है। माओवादी/ नक्सलवादी समूहों से जुड़ी रही महिलाओं और लड़कियों के साथ माओवादी शिविरों में यौन हिंसा भी की जाती है। सरकार विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए जम्मू कश्मीर में भी सशस्त्र समूह 14 वर्ष तक के कम उम्र के किशोरों को लगातार भर्ती और उनका इस्तेमाल करते रहे हैं। एक स्वयं सेवी संगठन के रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में मानव तस्करी के पीड़ितों की संख्या 80 लाख से भी ज्यादा है जिसका बड़ा हिस्सा बंधुआ मजदूरों का है। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में नौकरी दिलाने के नाम पर गरीबों और जरूरतमन्द को बुलाते है। असम और बिहार जैसे बाढ़ प्रभावित राज्य में भी तस्कर सक्रिय रहे हैं। घरेलू स्तर पर तस्करी से निपटने के लिये राजनीतिक प्रयासों के साथ-साथ स्थानीय निवासियों तथा अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों का भी सहयोग अपेक्षित है। ज़िला और राज्य स्तरीय एंटी ट्रैफिकिंग कमेटियाँ ऐसे उपाय करें जिनसे अति संवेदनशील लोगों को सुरक्षा मिले और उन्हें तस्करी का शिकार होने से रोका जा सके। अति संवेदनशील समुदायों के लिये जीविकोपार्जन और शैक्षणिक कार्यक्रम चलाकर, सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं के कार्यान्वयन को आसान बनाकर, कानून एवं व्यवस्था संबंधी फ्रेमवर्क बनाकर रोका जा सकता है।
मानव तस्करी भारत ही नही बल्कि वैश्विक स्तर पर कायम है अतः इसका निवारण करना अति आवश्यक है। इसके लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत कानून बनाने की आवश्यकता है ताकि मानव तस्करी पर रोक लगाई जा सके। सरकार को मानव तस्करी को रोकने के लिए विभिन्न नीतियाँ और सख्त कानून बनाना होगा। तस्करी के शिकार लोगों को छुड़ाने और अपराधों की जांच के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर विभिन्न प्राधिकरण/ नियामकों की स्थापना की जानी होगी। पुलिस एवं अन्य संबंधित अधिकारी एक साथ मिलकर कार्य करने एवं आपस में सूचनाओं का आदान-प्रदान करें, जिसका उपयोग मानव तस्करों पर लगाम कसने के लिए किया जा सके।मानव तस्करी से निपटने के लिए सरकार के साथ-साथ समाज को भी आगे आना होगा।

बलराम साहू
बिलासपुर (छत्तीसगढ़ )

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