
तब अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पीस रही थी धरती हमारी,
अपने हीं घर में यातनाएं सह रहे थे लोग और खुद को पराजित महसूस कर रही थी माँ भारती हमारी,
27 सितंबर 1907 को भारत के पावन धरती लायलपुर जिले के बंगा में जन्म लिया एक सिंह,
पाँच साल के बाल्यावस्था से खेल उनके अनोखे थे,
ऐसी उनकी अद्भुत कृति थी जैसे सबकुछ माँ के पेट से ही सीखे थे,
दोस्तो को दो मंडली में बाँटना,
परस्पर आक्रमण कर युद्ध का अभ्यास करना,
13 अप्रैल 1919 को जालियाँ वाला बाग हत्याकांड ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था,
जब अंग्रेजी शासन ने मानवीयता को शर्म सार किया था,
अमानविय कृत को देख भगत सिंह ने प्रण लिया,
आजादी ही मकसद थी उनकी आजादी को ही अपना जीवन दे दिया,
पिता जी किसान थे भगत जी के,
कभी – कभी खेतों में जाकर भगत
छोटी- छोटी लकड़ियों के टुकड़े बोया करते थे,
क्या करते हो पूछने पर गोलियों का कारोबारी बताते,
कारण पूछने पर उत्तर देते थे,
अपने देश को स्वतंत्र करवाना है,
देशभक्ति धर्म है मेरा और देशभक्ति ही करते जाना है,
माँ पिता जी को गर्व होता था जब कोई ये कहता था,
वीर धीर और निर्भीक पुत्र जना आपने,
देश को अतुल्य तोहफा दिया है आपने,
राजगुरु, सुखदेव और चंद्र शेखर के साथ मिलकर क्रांतिकारी संगठन का निर्माण किया,
नई पुस्तकों को पढ़ना इनके शौक़ में सुमार था,
लाहौर षडयंत्र मामले में भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव को फाँसी की सजा सुनाई गई,
क्रांति के लिए उठ रहे आवाज को बड़ी निर्ममता से दबाई गई,
23 मार्च 1931 शाम सात बजे उन तीनों को फाँसी दे दी गई,
लेकिन मौत से पहले कोई डर नही था,
इंकलाब ही गूंज रहा था,
पुस्तक पढ़ा अंत समय मे लेनिन का,
युवा आज भी कसमे खाते हैं,
क्रांति के लिए उनका वही नारा दोहराते हैं, इंकलाब जिन्दा बाद, इंकलाब जिंदा बाद,
जिंदा रहेंगे सबके दिलों में हमेशा,
आज भी देश को बदलने के लिए बनना होगा भगतसिंह जैसा |
चंद्रप्रभा
गिरिडीह (झारखंड)







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