बेनजीर सत्याग्रह का अपमान


देश के सबसे लंबे और अनुशासित किसान सत्याग्रह के साथ वार्ता के अंतहीन दौर इस बेनजीर सत्याग्रह का घोर अपमान है। नौकरशाही के सहारे बातचीत का ये सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा।
देश में ऐसी कोई नज़ीर नहीं है जिसमें चुपचाप एक के बाद एक ५० से अधिक सत्याग्रही शहीद हो गए हों। महात्मा गांधी के नेतृत्व में हुए किसान आन्दोलन मौजूदा किसान आन्दोलन का मुकाबला नहीं कर सकते। सरकार किसानों को पुलिस या सेना की गोली से मारने के बजाय उनकी अनदेखी और अपमान कर मार रही है। पिछले बयालिस दिन में सरकार की कोशिश एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकी।
लोकतंत्र के प्रति आस्थावान किसानों को अलोकतांत्रिक तरीके से परास्त करने का प्रयास किया गया है , जैसे किसान सरकार के दुश्मन हों।इस पूरे घटनाक्रम में देश के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कठपुतली से ज्यादा कुछ साबित नहीं हुए।वे रटे रटाए जबाब और प्रस्ताव किसानों के सामने लाते हैं और खैनी चबाते हुए। वापस लौट जाते हैं। लगता है कि सरकार के लिए ये बेनजीर सत्याग्रह कोई मायने नहीं रखता।
किसानों की मांगें स्पष्ट हैं।वे तीनों कानूनों की वापसी से कम कुछ नहीं चाहते और सरकार इसके लिए किसी सूरत में तैयार नहीं है, इससे इन आरोपों की पुष्टि होती है कि सरकार उन लोगों के दबाव में है जो किसान की मेहनत का अपहरण करना चाहते हैं। सरकार पर यह आरोप नहीं है,ये साफ दिखाई दे रहा है, अन्यथा मसला कब का हल हो जाता।
देश का दुर्भाग्य है कि ऐसा कोई सर्वमान्य नेता हमारे पास नहीं है जिसके ऊपर किसान भरोसा कर सके। माननीय प्रधानमंत्री जी ने सारे ठठकर्म करके देख लिए लेकिन किसानों से सीधे बात नहीं की।वे गुरुद्वारा में अरदास कर आए लेकिन ऊपर वाले ने उनकी नहीं सुनी क्योंकि उन्हें जहां माथा टेकने जाना चाहिए था वहां वे गये ही नहीं।वे लगातार किसानों के सब्र का इम्तिहान ले रहे हैं।और किसानों के सब्र का बांध है कि टूट ही नहीं रहा।बिखर ही नहीं रहा।
पिछले दिनों में सरकार की ओर से किसान आन्दोलन को तोडने की नाकाम कोशिश भी की गई। समानांतर आंदोलन खड़ा करने के प्रयास भी किए गए लेकिन कामयाबी नहीं मिली।पर सरकार हार मानने को राजी नहीं है। सरकार की जिद अनूठी है।अब लगता है कि सरकार संसद में ही इस बेनजीर सत्याग्रह का फैसला करेगी। संसद में सरकार ने ध्वनि मत से कानून बनाए थे।संसद में सरकार की ताकत है और शायद इसी बिना पर सरकार जीत हासिल करना चाहतीं है। हकीकत में सरकार बाजी हार चुकी है। किसान सत्य के रास्ते पर डटे हैं,बंटे और बिखरे नहीं है।
भगवान से प्रार्थना है कि वो सरकार को सद्बुद्धि दे ताकि किसान आन्दोलन समाप्त हो और दुनिया भर में हो रही बदनामी से देश को मुक्ति मिल सके। आगामी वार्ता का निर्णायक होना सबके हित में है।
@राकेश अचल

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