
देश के हर हिस्से में हाथरस हो रहा है ,लेकिन हमारी सुई हाथरस पर अटक गयी है .हाथरस अब सबके लिए ढाल बन गया है .पहले मीडिया ने इसे भुनाया,फिर राजनीतिक दलों ने और अब यूपी की सरकार इसे भुना रही है ये कहकर की हाथरस काण्ड के बहाने राज्य में दंगे करने की साजिश रची जा रही है .
दुनिया जानती है कि देश में दंगों की साजिश रचने और उन्हें भड़काने,फ़ैलाने में कौन लोग सिद्धहस्त हैं ? हालात बदले हैं तो कुछ लोग जेल के सीखंचों के पीछे हैं और कुछ सत्ता में यहां-वहां बैठे हैं .ऐसे में दंगों की साजिश आखिर कौन कर रहा है .यूपी के मठाधीश रहे मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ ने इस सिलसिले में एमेनेस्टी इंटरनेशनल का नाम लिया है ,जबकि ये संस्था भारत से अपना कामकाज समेट चुकी है .सवाल ये है कि जिस विषय पर एक दल विशेष का सर्वाधिकार है उसे कोई दूसरा कैसी हड़प सकता है ?
हाथरस काण्ड के बाद जिस तरह से सत्तारूढ़ दल के पूर्व विधायक के बंगले पर बलात्कार के आरोपियों के पक्ष में पंचायत हुई और प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा ,इससे साफ़ जाहिर है कि दंगों की साजिश कौन कर रहा है ? हाथरस पुलिस और प्रशासन ने तो पीड़ितों से मिलने आने वालों का स्वागत लाठी-डंडों से किया ही है .स्थानीय प्रशासन एक तरफ दंगों की साजिश रचने के लिए आरोपियों के पक्ष में पंचायत होने देती है और दूसरी तरफ पीड़ितों के शुभचिंतकों को धुनती है .आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या प्रशासन नहीं चाहता कि हाथरस की आग सुलगती रहे और बाक़ी के जिले भी इसकी चपेट में आ जाएँ .
यूपी में दंगों का एक घनघोर काला इतिहास रहा है .सत्ता पाने से लेकर सत्ता उखाड़ने तक के लिए यूपी में दंगे एक औजार की तरह इस्तेमाल किये जाते रहे हैं. दुर्भाग्य से यूपी में ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं है जो दंगों की साजिश में शामिल न रहा हो या जिसने दंगे न कराये हों ?
हकीकत तो ये है कि योगी आदित्यनाथ से यूपी सम्हल नहीं रही है .ये अलग बात है कि उन्हें प्रधानमंत्री जी का संरक्षण प्राप्त है .लेकिन प्रधानमंत्री जी भी कब तक योगी जी को धक्का लगाएंगे ? अगर जनता में उनकी साख गिर रही है तो उन्हें भी एक न एक दिन सोचना ही पडेगा. प्रधानमंत्री जी स्वयं यूपी से चुनकर संसद तक पहुँचते हैं ,इसलिए उनका ये नैतिक दायित्व है कि वे यूपी को अशांत न होने दें और यदि वहां नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत है तो वे ऐसा करें .
मुझे लगता है कि हाथरस काण्ड भी दिल्ली के निर्भयाकांड के तरह लंबा खिंचेगा या इसे लंबा खींचा जाएगा .मुमकिन है कि मामला खींचते हुए सर्वोच्च न्यायालय तक जाये और वहां भी पता नहीं कितने सालों में इसका निराकरण हो पाए .हमारे देश की न्याय व्यवस्था कछुआ चल से चलती है. हमारी जांच एजेंसियां खुद चींटी की चाल चलती हैं .बाबरी मस्जिद ढहाने का मामला 28 साल बाद भी ‘ढाक के तीन पत्ते’ साबित हुआ .इस अविश्सनीय माहौल में दंगों की बात करना खतरनाक संकेत है .बलात्कार जैसी घृणित वारदातें यूपी ही नहीं बल्कि देश के अधिकाँश हिस्सों में हो रही हैं .लेकिन उनका सियासी इस्तेमाल देश के हर हिस्से में किया जा रहा है .
राजनीतिक दलों की आखिर क्या विवशता है कि वे ऐसी वारदातों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करने लगते हैं .कोई उन्हें रोकता भी नहीं .आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस सूबे में बलात्कार का राजनीति इस्तेमाल सत्ता बचाने या सत्ता में आने लिए किया जा रहा हो वे सूबे आखिर जायेंगे ,लोग क्यों नहीं मानते कि बलात्कार का राजनीतिक इस्तेमाल घातक है .बलात्कार जैसी जघन्य हत्या के मामले अगर दंगों की जमीन बनने लगेंगे तो समाज और देश जाएगा कहां ? सबसे ज्यादा आपत्तिजनक बात तो ये है कि लोग इसकी गंभीरता को समझ नहीं रहे हैं .
लोकतंत्र में कोई भी सरकार लाठी-गोली के बूते पर नहीं चल नहीं सकी है ,लेकिन यूपी में ये कोशिश जारी है. जो वहां जा रहा है पुलिस की बर्बर लाठियों का शिकार हो रहा है .आखिर यूपी सरकार चाहती क्या है ?क्या उसका व्यवहार लोकतांत्रिक है ?क्या अतीत में भाजपा ने ये सब टोटके इस्तेमाल नहीं किये ? एक तरफ आरोपियों के समर्थकों को संरक्षण और दूसरी तरफ पीड़ितों के समर्थकों की ठुकाई से तो जाहिर है कि प्रदेश में दंगों की भूमिका प्रतिपक्ष नहीं बल्कि दूसरे लोग रच रहे हैं .कुर्सी बचाये रखने के लिए इतनी बेहयाई ठीक नहीं है .
बलात्कार कोई राजनीतिक घटना नहीं है. ये एक अपराधवृत्ति है ,इसे क़ानून के जरिये ही शून्य किया जा सकता है .जाती या धर्म से जोड़कर नहीं ,जो लोग ये कोशिश कर रहे हैं वे गलती पर हैं और बाद में पछतायेंगे .ऐसी घृणित वारदातों को यदि राजनीती के चश्मे से देखा जाएगा तो लोकतंत्र का बहुत नुक्सान होगा .क़ानून और व्यवस्था का तो सत्यानाश होगा सो होगा ही .अपराद्धों के लिए सरकारें जिम्मेदार नहीं हो सकतीं लेकिन वे इन्हें रोकने के लिए जिम्मेदार हो सकती हैं .पुलिस और अदालतों का तौर-तरीका इन वार्दाओं को कम या ज्यादा कर सकता है .जघन्य वारदातों के पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने के लिए ईमानदारी से काम करना ही एकमात्र विकल्प है और इस विकल्प पर सबको काम किया जाना चाहिए .
अपराध और राजनीति का गठबंधन जैसे-जैसे प्रगाढ़ होता जा रहा है वैसे-वैसे स्थिति और भयावह होती जा रही है .दुर्भाग्य से इस गठबंधन को हम तोड़ नहीं पा रहे हैं .इसमें पुलिस और प्रशासन का शामिल होना और ज्यादा नुकसानदेह साबित हो रहा है .बेहतर हो कि इस मामले में हम हाथरस से बाहर निकल कर पूरे देश को देखें .हाथरस को हाथरस में ही न्याय की प्रतीक्षा में छोड़ देना चाहिए .हाथरस राजनीति का औजार न बने सो ही ठीक है .
@ राकेश अचल






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