
बापू जो आप न आये होते,
क्या हाल हमारा होता l
बर्बरता से दमन और,
करते गोरे हमपे l
आगे बढ़ न पाते ,
रह जाते सहम के l
बापू..
हिंसा भी थी जरूरी,
पर नही बात बनती l
अंजाम आने वाली,
पीढ़ियां भुगतती l
बापू..
जग को कौन पढ़ता,
पाठ अहिंसा का तब l
मार के मरते रहते,
एक दूजे को हम सब l
बापू..
छूत अछूत न मिटता,
भेद और गहराता l
देश को आगे बढ़ाने,
तबका एक न आता l
बापू..
बात स्वच्छता की,
केवल बात ही रहती l
कारण गंदगी के,
दुनिया हमपे हंसती l
बापू..
अपनाते न स्वदेशी,
परदेशी अपनाते l
लघु उद्योग वतन के,
गर्त में समाते l
बापू..
प्रभात कटगीहा
कटगी






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