बलात्कार .सत्ता और सियासत


हाथरस काण्ड को लेकर पीड़ित परिवार हतप्रभ है और सत्ता सुरक्षात्मक मुद्रा में .विपक्ष को ऐसे मुद्दों पर राजनीति करना होती है सो उसने की.यानि सबने अपना-अपना काम किया ,लेकिन बलात्कार अपनी जगह मुदित है.उसकी मौजूदगी केवल हाथरस में नहीं बल्कि सब दूर है .अब सवाल ये है कि आखिर इस जघन्य अपराधवृत्ति के खिलाफ हम सब एकजुट कब होंगे ? यूपी सरकार ने दूसरे मामलों की तरह हाथरस के बूंदगढ़ी बलात्कार कांड की जांच सीबीआई को सौंपकर मामले पर धूल डाल ही दी है .
दुर्भाग्य है कि देश में बलात्कार की वारदातें तमाम कानूनों और सजाओं की व्यवस्थाओं के बावजूद कम नहीं हुईं,उनकी प्रकृति नहीं बदली है.इसके साथ नहीं बदली है सत्ता और समाज की मानसिकता. जब भी,जहां भी बलात्कार होता है सरकारें अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए आरोपियों को संरक्षण और पीड़ितों को रिश्वत देने की कोशिशों में जुट जाती है .और इन्हीं कोशिशों के बाद शुरू होती है राजनीति जो इतने चरम तक जाती है कि उसे तमाशा बना दिया जाता है .क्या पीड़ितों को रिश्वत से ज्यादा न्याय की जरूरत नहीं है ?
हाथरस काण्ड में यूपी की सरकार ने यही सब किया .बलात्कार की वारदातें भाजपा शासित यूपी में ही नहीं बल्कि कांग्रेस और दीगर दलों शासित राज्यों में भी लगातार हो रही हैं. हाथरस के साथ ही राजस्थान और मध्यप्रदेश तथा कर्नाटक में हुईं हैं.लेकिन दूसरी जगह इन वारदातों को लेकर राजनीति नहीं हुई,क्योंकि दूसरी जगह सरकारों ने इन वारदातों में लिप्त आरोपियों को बचाने के साथ वारदातों को सत्ता की प्रतिष्ठा से नहीं जोड़ा .ये सब चूंकि यूपी में ही हो रहा है ,इसलिए राजनीति भी वहीं हो रही है और होना भी चाहिए .
भारतीय समाज और सियासत में परम्परा है कि जब कहीं ऐसी वारदातें होती हैं तो सब लोग पीड़ितों के आंसू पौंछने जाते हैं.ये सामाजिक और राजनीतिक रस्म है,इसका विरोध नहीं होना चाहिए लेकिन यूपी सरकार ने कांग्रेस के नेताओं को ऐसा करने से रोककर लगातार दो दिन तमाशा किया .सड़कों और रास्तों को ही नहीं बूंदगढ़ी को भी पुलिस छावनी में तब्दील किया.कांग्रेस के शीर्ष नेताओं पर लाठियां भांजी,धक्का-मुक्की की और अंत में उन्हें पीड़ितों से मिलने की इजाजत भी दी .सरकार की नाक इन घटनाओं से कटी या बची ?आकलन आप खुद कर लीजिये.
बूंदगढ़ी को लेकर यूपी सरकार के इस प्रहसन को एक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है. लोग कह रहे हैं कि किसान आंदोलन को फुस्स करने के लिए जानबूझकर यूपी में ये नाटक किया गया .मुमकिन है कि इसमें सच्चाई हो और मुमकिन है कि ये अनुमान गलत भी हों .लेकिन हकीकत ये है कि यूपी सरकार को बूंदगढ़ी बलात्कार काण्ड के बाद स्थानीय पुलिस और प्रशासन की बेवकूफी के बाद लगातार अपना बचाव करते हुए पीछे हटना पड़ा .सवाल ये है कि क्या जरूरत थी आधी रात को पीड़िता का शवदाह करने की? क्या जरूरत थी अंत्येष्टि क्रिया से पीड़िता के परिजनों को दूर रखने की ? पुलिस और प्रशासन को किसने ऐसा करने के लिए कहा था ?
आप तय मानिये कि यदि स्थानीय पुलिस और प्रशासन ने हिकमत अमली से काम लिया होता तो आज बूंदगढ़ी का नाम सुर्ख़ियों में न होता .स्थानीय प्रशासन की बेवकूफियों को छिपाने के लिए यूपी सरकार को पहले मामले की जांच एसआईटी से करने की घोषणा करना पड़ी और जब बाजी हाथ से निकल गयी तब मामला सीबीआई को सौंपने का ऐलान करना पड़ा ,लेकिन इससे बात बनी नहीं .सीबीआई पहले से अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है. बाबरी मस्जिद से लेकर सुशांत सिंह राजपूत के मामले में सीबीआई की नाकामियों की लम्बी फेहरिस्त है और हर ऐसे मामले की न्यायिक जांच न संभव है और न व्यावहारिक .
बूंदगढ़ी ने यूपी में अंतिम साँसे गिन रही कांग्रेस को प्राणवायु दी है .कांग्रेस ने इस वारदात को लेकर प्रतिपक्ष की भूमिका का निर्वाह भी मुस्तैदी से किया है. दलितों की मसीहानी बसपा की सुश्री मायावती और समाजवादी अखिलेश इस मामले में गच्चा खा गए .लगता है कि दोनों की दुम पर केंद्र सरकार ने अपना पांव कुछ ज्यादा ही वजन के साथ रख दिया है .केंद्र ने पांव तो कांग्रेस की दुम पर भी रखा है लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली.प्रियंका बाड्रा तमाम भयादोहन की कोशिशों के बावजूद लाम पर बनी रहीं और उन्होंने अपने भाई राहुल को भी इसमें अपने साथ खड़ा किया .प्रियंका की कोशिशों से देश को एक बार फिर बेलछी और इंदिरा गांधी याद आईं .
इस समय देश में असहमति को लेकर जो सरकारी मानसिकता है ,उसे देखते हुए दबी,कुचली,शोषित जनता को प्रियंका का सड़क पर मौजूद दिखाई देना शायद अच्छा लगा है .पूरी तरह से बदनाम हो चुके दृश्य मीडिया को भी प्रियंका ने एक अवसर दिया है अपना मुंह धोने का .हालांकि गोदी मीडिया के निशाने पर प्रियंका पहले की तरह ही हैं.उनसे सवाल पूछे जा रहे हैं कि वे बलात्कार की वारदातों को लेकर पक्षपाती क्यों हैं ? क्यों नहीं कांग्रेस शासित राजस्थान जातीं ? मीडिया पाना काम कर रहा है और कांग्रेस अपना.सरकार तो काम पर है ही,किन्तु इन सभी कमेरों से न देश में सुरक्षा का वातावरण बन रहा है और न लड़कियां अपने आप को सुरक्षित अनुभव कर रहीं हैं .
घूम-फिर कर सवाल वही है कि क्या देश में हासिये पर खड़ा प्रतिपक्ष एक बार फिर मुस्तैदी से किसानों और मजदूरों के मसलों पर भी इतनी ही उग्रता दिखा पायेगा जितना उसने बूंदगढ़ी बलात्कार काण्ड को लेकर दिखाई है .देश को प्रतिपक्ष कि जरूरत है .दुर्भाग्य से प्रतिपक्ष लम्बे समय से अनुपस्थित है.सड़क से भी संसद से भी. संसद के सत्र में विपक्ष की अनुपस्थिति रेखांकित की गयी .राज्य सभा में हंगामा और लोकसभा में बहिष्कार से बात नहीं बनती.सड़क पर भी प्रतिपक्ष दिखना चाहिए .क्योंकि संयोग से इस समय देश की सरकार जिस बहुमत के वाहन पर सवार है उसमें कोई ब्रेक नहीं है .न पांव वाला और न हाथ वाला .इसलिए हादसों की आशंका लगातार बनी हुई है .
देश की राजनीति को पटरी पर लाने के लिए केंद्र सरकार और विपक्ष के पास अभी काफी समय है .जनता के पास भी समय ही समय है.जनता अपने वोट की ताकत का इस्तेमाल किश्तों में कर सकती है .अभी बिहार अवसर दे रहा है,कल बंगाल देगा,परसों उत्तर प्रदेश में उसे अपना मत व्यक्त करने का अवसर मिलेगा .हम जैसे लोग दर्शक दीर्घा में बैठकर देखेंगे कि जनता अपना जनादेश का इस्तेमाल कैसे करती है ?उसका समर्थन किन शक्तियों और नेताओं को मिलता है .हम जैसे लोग तो आश्रम के साथ रहते आये हैं,सो रहेंगे सत्ता हमारे लिए निषिद्ध क्षेत्र है ,सो रहेगा .हमारी भूमिका बदलने वाली नहीं है.
@ राकेश अचल

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