पिता की पुण्यतिथि पर आज उनके सेवा कार्यों का स्मरण कर रहा हूं। वे विध्यार्थी जीवन से संघ से जुड़े रहे। साथ ही विश्व विध्यालय में रहते एन सी सी संगठन से संबद्ध रहे। एन सी सी से जुड़ा एक किस्सा और पिता के अन्य सेवा प्रकल्पों के बारे में मित्रों को बताना प्रासंगिक होगा।

पिता सागर विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में प्राध्यापक थे।अनुशासन पर उनका जोर रहता था। संस्कार सिखाने का ये हाल था कि हमारी कॉलोनी जिसे सिविल लाइंस या नई सिंधी कॉलोनी भी कहते हैं ,छोटे हों या बड़े, सभी शर्ट का ऊपरी बटन खोल कर नहीं चल सकते थे। पिता ऐसा करते किसी व्यक्ति को देखते तो उन्हें नसीहत देते, साथ में यह कहते कि यह बटन खोल कर चलना कौन सी सभ्यता है ? उन्होंने कॉलोनी के बच्चों को अपनी ओर से क्रिकेट किट प्रदान कर खेलों की ओर आकर्षित किया।बहुत से सामाजिक संगठनों को समय दिया। युवाओं के साथ शहर के रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के सार्वजनिक शौचालयों की सामूहिक सफाई और स्वच्छता का कार्य अपने नेतृत्व में करवाया ।अनेक लोग उनकी इस बात के लिए आलोचना भी करते थे कि हमारे बच्चों से यह कैसा कार्य करवा रहे लेकिन वे तो एक पूरी पीढ़ी को राष्ट्र सेवी और राष्ट्र प्रेमी नागरिक बनाने का बोध करवा रहे थे। आने वाले वर्षों में उनके इन सेवा कार्यों को स्वीकार किया गया और सराहना भी की गई ।समय के साथ लोगों के विचार बदलते ही हैं। मेरे पिता में समाज का नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता थी। स्वास्थ्य की कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने निरंतर इसका उपयोग किया और अनूठे कार्य कर दिखाए। उनके निजी संग्रह की हजारों किताबें मध्य प्रदेश के करीब 10 पुस्तकालयों में विद्यमान हैं। सप्रे संग्रहालय, भोपाल में तो एक पूरा पुस्तक खंड प्रोफ़ेसर मनवानी के नाम से है।
बात हो रही थी , एन सी सी संगठन की।पिता तो एन सी सी अधिकारी थे ही,उनसे प्रेरणा लेकर मैं स्वयं इस संगठन से जुड़ गया गया था । जो वाक्या याद आता है वो गुजरात के मोरवी नगर से जुड़ा है। वर्ष 1979 में मोरवी में अगस्त का महीना भारी तबाही लेकर आया था। मोरवी नगर के नज़दीक बने एक बांध के बंधान भारी वर्षा और पानी के दबाव की वजह से टूट गए थे और बस्ती में भारी बाढ़ की वजह से जीवन तहस-नहस हो गया। ऐसे कठिन समय में गुजरात के साथ ही अन्य प्रदेशों के संगठनों ने भी मानवता प्रदर्शित कर राहत कार्यों में सहायता की थी। तब मध्यप्रदेश के नगरों से अनेक संगठन सेवा के लिए मोरवी पहुँच गए थे। मध्यप्रदेश के सागर नगर से गुजरात तक मदद पहुंची थी,यह उस युग की बड़ी उपलब्धि थी। एन.सी.सी कैडेट्स का वो जज्बा भुलाए नहीं भूलता। सागर में तब सेवा कार्यों के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का बड़ा नाम था। इसके साथ ही एन सी सी संगठन भी एक सक्रिय सामाजिक संगठन के रूप में कार्य करता था। पिता ने अनेक कैडेटस को मोरवी जाने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया। ये कैडेट्स निरंतर दो-तीन हफ्ते गुजरात में रहे और त्रासदी के कारण जान-माल की हानि उठा चुके पीड़ित नागरिकों की भरपूर मदद की। चाहे जल प्लावन का शिकार हुए लोगों के घरौंदे फिर से बसाने का काम हो या फिर उनकी जीविका का साधन फिर शुरू हो जाए, इस दिशा में ठोस प्रयास हो, सागर के युवाओं ने जिस ज़ज्बे और जुनून से काम किया वो राहत कार्य के क्षेत्र में एक अनोखा उदाहरण माना जा सकता है। सागर के संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी मामा आठले, प्रो. वाखले और प्रो.पी.के.पाटनकर ने पिता प्रो. मनवानी को हर तरह की सहायता और मागदर्शन देने का कार्य किया। इससे बिना देर किए एक सक्षम दल गुजरात रवाना किया जा सका। चूंकि पिता शुरू से संघ से जुड़े रहे,राष्ट्र के प्रति हमेशा कुछ कर गुजरने का जज़्बा रहा,इसलिए ये कार्य हो सका।वे स्वयं को समाज, शहर एवं राष्ट्र सजग प्रहरी मानते थे। आकाशवाणी समाचार के माध्यम से देश की नब्ज़ टटोलना उनका शगल था। उन्होंने जब गुजरात के मोरवी शहर में बाढ़ आने का समाचार सुना, एन.सी.सी के लगभग करीब पचास केडेट्स को तुरंत भेजने का फैसला ले लिया। इस तरह इन जवानों के माध्यम से वहाँ राहत कार्य का संकल्प साकार भी हो गया । सिर्फ 24 घंटे में सागर से दल गुजरात रवाना हो गया था। तब न सीधी रेल थी न ही कोई अन्य परिवहन सुविधा। कुछ था तो बस ,सेवा और समर्पण का भाव। जब सागर से कैडेट्स का दल गुजरात के लिए रवाना हो रहा था, अनेक युवा,मित्र और परिजन केडेट्स का हौसला बढ़ाने रेलवे स्टेशन भी गए थे। निश्चित ही ये दृश्य किसी के लिए कुछ करने और मानवता के पक्ष में कार्य करने का हौसला देने वाला सागर शहर के इतिहास का एक ऐतिहासिक अध्याय रहा है। केडेट्स का दल गुजरात गया, कार्य कर लौट आया, नगर वासियों ने ऐसे सेवाभावियों का अभिनंदन भी किया। सागर के राजनेता और गीतकार विठ्ठल भाई पटेल ने भी स्वैच्छिक सहयोग प्रदान किया था। आज सागर नगर की ये विभूतियां इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके कृतित्व का स्मरण आज भी शिद्दत से किया जाता है। एक छोटे से कस्बे से बड़े नगर में तब्दील हुए सागर में आज़ादी के पहले स्थापित विश्वविद्यालय जिसे संविधान सभा के सदस्य ,प्रसिद्ध विधिवेत्ता डॉ. सर हरिसिंह गौर ने स्थापित किया था, इस शहर को प्रबुद्ध और सामाजिक दायित्व का बोध करने वाला केन्द्र बनाया है। सागर से वे युवक जो 42 बरस पहले मोरवी गए थे, उनमें से अधिकांश नगर से बाहर देश-प्रदेश में यहाँ भी सेवारत हैं अपनी सामाजिक भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं।
यह भी गौरतलब है कि चार दशक पहले मीडिया ऐसे कार्यों की हौसला अफजाई के लिए इस तरह उपलब्ध नहीं था जिस तरह आज लोग उंगली कटाकर सोशल मीडिया पर शहादत का श्रेय लेते हैं। इसलिए आज उस भूले बिसरे योगदान की याद कर गर्व का अनुभव किया जा सकता है।
यह पिता की ही प्रेरणा थी कि मैं भी एनसीसी संगठन से जुड़ गया। राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत भी हुआ।आज भी खुद को एक एन सी सी कैडेट मानता हूं। शौकिया उद्घोषक हूं और नाट्य जगत से भी सम्बद्ध हूं। मेरा विश्वास है कि पिता का आशीर्वाद जीवन में यश दिलाता है।गर्व है इस बात पर भी कि लेखक अशोक मनवानी का अनुज हूं। जिन पुस्तकालयों को पुस्तकें भेंट की गई उनमें माधव राव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय भोपाल, मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन भोपाल, रविंद्र ग्रंथालय सागर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय पुस्तकालय सागर ,जनसंपर्क विभाग पुस्तकालय भोपाल वल्लभ भवन पुस्तकालय,भोपाल, भोपाल हिंदी ज्ञान मंदिर बीएचईएल भोपाल ,पंडित शीतल प्रसाद तिवारी वाचनालय और पुस्तकालय शिवाजी नगर भोपाल जिला पुस्तकालय टीटी नगर भोपाल।
करीब दो हजार पुस्तकें परिवार द्वारा दान दी गईं हैं।
*विजय मनवानी,भोपाल







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