पोस्टर से भयभीत लोकतंत्र


दुनिया के बस्बे बड़े लोकतंत्र के शीर्ष नेतृत्व को क्या सचमुच अपने खिलाफ जारी एक पोस्टर से भय लगता है ?अगर नहीं लगता तो इस मामले में दो दर्जन से अधिक लोगों के खिलाफ पुलिस द्वारा दर्ज किये गए मामलों और गिरफ्तारियों की किया जरूरत थी ? और अगर सचमुच लोकतंत्र के नायक एक अड़ने से पोस्टर से आतंकित हैं तो ये बेहद गंभीर बात है .
दुनिया जानती है इसलिए मुमकिन है कि आप भी जानते होंगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ पोस्टर लगाने के मामले में दिल्ली पुलिस ने 25 एफआईआर )दर्ज करते हुए 25 लोगों को गिरफ्तार किया है. ये पोस्टर कोरोना टीकाकरण के संबंध में लगाए गए थे. इन पोस्टरों में लिखा था, ‘मोदी जी हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दिया.’ ऐसे पोस्टर शहर में कई स्थानों पर लगाए गए थे.मैंने भी ये पोस्टर देखे,मुझे बिलकुल नहीं लगा कि इन पोस्टरों में एक शब्द भी ऐसा है जो आपत्तिजनक हो.ये पोस्टर न तो समाज में घृणा फ़ैलाने वाले हैं और न इन पोस्टरों से समाज में शान्ति भंग होने की आशंका है .लेकिन पुलिस को ऐसा लगा .पुलिस को ऐसा इसलिए लगा क्योंकि जिसकी पुलिस है उसके मुखिया को इन पोस्टरों ने आतंकित किया होगा या उनके मन की शांति भंग की होगी.
इस विवादास्पद पोस्टर को लेकर ‘आप’ ने आक्रामक रुख अपना लिया है। पार्टी ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर कहा है कि यह पोस्टर आम आदमी पार्टी ने लगाए हैं, और अब तो पूरे देश में लगाएंगे।अगर आपको गिरफ्तार करना है तो हमें करिए उन बेचारे गरीब पोस्टर लगाने वालों को नहीं। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद ये पोस्टर एक सियासी मुहिम बन गए हैं इस बीच इसी घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर पीएम नरेंद्र मोदी को चुनौती देते हुए कहा कि, ‘मोदी जी आपने बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेजी, मुझे भी गिरफ्तार करो’..सोशल मीडिया पर तो इस पोस्टर के समर्थन में जैसे एक सुनामी सी आ गयी है
पोस्टर में केवल एक सवाल किया गया था,जिसका जबाब कोई भी सरकारी प्रवक्ता दे सकता था,न भी देता तो ये पोस्टर दो-चार दिन में अपने आप फट जाते .लेकिन सरकार और सरकार का सिस्टम जैसे अब प्रश्नों से घबड़ाने लगा है और जहां भी सवाल करते हुए देखता है आक्रामक हो जाता है. सिस्टम की ये आक्रामकता दो बातें दर्शाती है.पहली ये कि या तो चोर की दाढ़ी में तिनका है या फिर सिस्टम अलोकतांत्रिक हो चुका है .अन्यथा एक पोस्टर इतना कमाल नहीं कर सकता कि सरकार कांपने लगे,हांफने लगे .
कोरोना महामारी में देश में जितने लोग मारे गए वे सिस्टम के शिकार ज्यादा हुए महामामारी के कम .अगर यही लोग अस्पताल में दवाएं,बिस्तर और आक्सीजन तथा वेंटिलेटर पाने के बाद मरते तो शायद लोगों को उतना असंतोष न होता जितना लोगों के अस्पताल में प्रवेश न मिलने,ऑक्सीजन और दवाएं न मिलने के कारण हुई मौतों के कारण हुआ है .अब तक दुनिया के किसी देश से ऐसी खबरें नहीं आयीं कि कोरोना का कोई मरीज अस्पताल में बिस्तर न मिलने या दवा और आक्सीजन न मिलने के कारण मरा हो .
कोरोना के खिलाफ जंग में सरकार की नाकामी टीकाकरण के मामले में भी उजागर हुयी. सरकार ने देश में टीकाकरण शुरू करने से पहले टीकों का दान-पुण्य शुरू कर दिया.दुनिया के 78 देशों को टीके भेज दिए,कहीं दान में दिए तो कहीं पैसे लेकर दिए .ऐसा करना बिलकुल बुरा न होता यदि सरकार पहले अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद करती .आज की स्थिति में न तो 45 वर्ष की आयु वर्ग को पूरी तरह से पहली खुराक मिली है और न 18 वर्ष की आयु तक की आबादी के लिए 1 मई से किया जाने वाला टीकाकरण शुरू हो पाया है
सरकार की इस नाकामी को लेकर पोस्टर जारी करने वाली आप के सांसद संजय सिंह नेयही तो कहा है कि ,’ , पूरा देश पूछ रहा है विदेशियों को क्यो बेच दी 6.5 करोड़ वैक्सीन ? अपने देश के लोगों का जीवन खतरे में क्यों डाल दिया जो उनपर भरोसा करते थे ।’ ये सवाल न तो गैरकानूनी हैं और न राष्ट्रद्रोही .ये सवाल किये जायेंगे और इनके जबाब आने भी चाहिए ,लेकिन हो उलटा रहा है.जबाब तो आ नहीं रहे उलटे सवाल करने वाले पोस्टर चस्पा करने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है .
पिछले कुछ वर्षों में हमारी सरकार नाक पर मख्खी तक नहीं बैठने देती .जो कोई सवाल करता है उसे येन-केन किसी न किसी तरह गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता है .फिर चाहे सवाल करने वाले डिगाड़ी मजदूर हों या तीन बार के सांसद पप्पू यादव .यानि सवाल करने वाला कोई भी हो काबिले बर्दाश्त नहीं है .
मेरी धारणा थी कि कोरोनाकाल में जिस तरिके से माननीय प्रधानमंत्री जी का कायाकल्प हुआ है उसी तरह से उनका मन भी संतों जैसा हो गया होगा .कहते भी हैं न -संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना॥
निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर सुख द्रवहिं संत सुपुनीता ..
लेकिन यहाँ उलटा हो रहा है .संत का हृदय लगातार संगदिल होता जा रहा है .कोरोना से मरे लोगों के अंतिम संस्कार न करने में असमर्थ लोग गंगा और दूसरी नदियों में मृतकों के शव प्रवाहित कर रहे हैं किन्तु संत मौन हैं. .जनता को संतों का मौन खलता ही है .दुर्भाग्य से देश में इतना बड़ा संत समाज है लेकिन कोई भी प्रश्नाकुला के समर्थन में खड़ा होने का साहस नहीं कर पा रहा है .यही कायरता समाज के लिए,लोकतंत्र के लिए घातक है .हमारे दादा कहते थे कि जब सीना ५६ का हो तब दिल भी समानदर जैसा होना चाहिए.जरा-ज़रा सी बात पर जनता को क़ानून के शिकंजे में डालकर आतंकित करना लोकतंत्र की सेहत के लिए तो ठीक नहीं है .
कोरोनाकाल में सरकार की उपलब्धियों और नाकामियों पर लगातार कलम चलने के बावजूद मैंने एक बार भी माननीय प्रधानमंत्री या उनकी कैबिनेट के किसी सदस्य के इस्तीफे की मांग नहीं की .ऐसे संक्रमणकाल में इस्तीफों से दशा सुधरने वाली नहीं है. पूर्ण बहुमत से चुनी सरकार से इस्तीफा मांगना अलोकतांत्रिक भी है किन्तु ऐसी सरकार से सवाल करना कभी गुनाह नहीं होता ,न ही होना चाहिए .मुझे उम्मीद है कि सरकार पोस्टरकाण्ड में अपने सिस्टम की गलती को स्वीकार करते हुए सरकार खेद जतायेगी और गिरफ्तार लोगों को फौरन रिहा करेगी .हम उम्मीद ही कर सकते हैं ,क्योंकि लोकतंत्र में हमें इसकी इजाजत तो है .
@ राकेश अचल .

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