पौड़ी खुर्द के आश्रित ग्राम बड़खा बाहर मैं उजागर हुआ मामला

कोरबा। वन अधिकार कानून के तहत ग्राम बरखा बहार में 33 परिवार निवासरत है जिसमें 23 परिवार को वन अधिकार कानून के तहत अधिकार पत्र प्राप्त हुआ। जिसमें महिलाओं को भी उनके नाम से अधिकार पत्र मिला है। अधिकार पत्र मिला खुशी की बात है, लेकिन इनकी खुशी तब काफूर हो गयी जब इनको अधिकार पत्र देते समय वहां के ग्राम कोटवार के द्वारा ₹1000 वसूली कर कर ली गई। कुल छह सात लोगों से ₹1000 वसूला गया।
आज एकता परिषद के साथी वहां पहुंचकर उक्त प्रकरण की लोगों की जुबान से और उनके हुए अवैध वसूली का समाचार में प्रकाशित करने का लोगों का बात जानकर पता चला। इस प्रकार गांव में भी उनकी पुश्तैनी जमीन का अधिकार पत्र मिलने पर लोग उनसे पैसा वसूल करने में गुरेज नहीं कर रहे हैं। शासन की महत्वकांक्षी ,वन अधिकार कानून का पतीला लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं कहीं ना कहीं राजस्व विभाग के ग्रामीण स्तर के कर्मचारी शामिल है। इसमें जब तक पटवारी नहीं कहेगा कोटवार के द्वारा अवैध वसूल करने की हिम्मत नहीं हो सकती। यह तो पूरी विकासखंड का एक ही गांव का प्रकरण है अगर गहराई से जांच किया जाए तो कई जगह सीधे-साधे आदिवासियों से अवैध पैसा वसूल करने में कोई भी कर्मचारी नहीं डरता। गांव वालों ने कहा कि हमें हमें हमारा पैसा वापस चाहिए नहीं तो हम आने वाले समय में इसकी शिकायत जिला स्तर के अधिकारी से करने में करेंगे । वन अधिकार कानून के तहत अधिकार पत्र को ग्राम सभा के द्वारा और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के द्वारा बंटवाया जाता है लेकिन राजस्व विभाग के कर्मचारियों के अधीन कर देने के कारण यह समस्या क्षेत्र में प्राप्त अधिकार पत्र के साथियों के साथ हो रहा है अगर समय रहते यह समस्या का हल या निदान नहीं किया गया तो लोगों में गुस्सा एवं वन अधिकार को लेकर के क्रियान्वयन पर पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाएगा।क्षेत्र में हो रहे वन अधिकार में खामियां भी देखने को मिल रही हैं व्यक्तिगत प्राप्त अधिकार में एक ही कट से लेकर 10 एकड़ तक प्राप्त करने का अधिकार है लेकिन किसी को 15 डिसमिल 20 डिसमिल ज्यादा ज्यादा 50 डिसमिल वर्तमान में उनके अधिकार पत्र में दिखा रहे हैं जो वन अधिकार कानून का खुला उल्लंघन है।कोई भी आदिवासी 2 एकड़ 3 एकड़ से कम जमीन का बीज नहीं किया है। 15 डिसमिल दर्ज इस मेले में कैसा खेती करेगा अपने आने वाली पीढ़ी को कैसे बटवारा देगा यह सोचने की बात है? वन अधिकार कानून का क्रियान्वयन आदिवासी विभाग का है जो अपने उत्तर दायित्व का निर्वाह नहीं कर रहा है।
अब चुनौती और आगे हैं प्राप्त अधिकार पत्र को ऋण पुस्तिका में बदलना है ताकि उनको शासन की विभिन्न योजनाओं का उस प्राप्त अधिकारों से प्राप्त हो सके आज एकता परिषद के कार्यकर्ता इंदिरा यादव एवं मुरली द्वारा उक्त घटना का जानकारी जनपद पंचायत के अध्यक्ष श्रीमती संतोषी राज पेंद्रो को भी अवगत कराया गया । उक्त ग्राम बडखाबहरा हाथी प्रभावित बहुत ज्यादा है कई बार इन की फसल एवं बाड़ी में लगे हुए सब्जियों को भी नष्ट कर चुका है फिर भी वन विभाग के द्वारा आज तक इनका फसल मुआवजा का प्रकरण नहीं बन पाया इसी प्रकार ग्राम पचायत अड़सरा के आश्रित ग्राम घाघरा विशेष जनजाति पंडो़ समाज के लोग निवासरत है जिनका विगत डेढ़ वर्ष से राशन कार्ड नहीं होने के कारण अपने खाद्यान्न योजना से वंचित है कुल 8 परिवार हैं जिनको सत्यापन के समय सचिव के द्वारा राशन कार्ड अभी तक प्रदान नहीं किया गया कई बार शासन प्रशासन से निवेदन कर चुके हैं। उनका राशन सामान अभी तक नहीं प्राप्त हो पा रहा है। जबकि छत्तीसगढ़ शासन का विशेष जनजातियों को राशन से वंचित करना कानूनी तौर से अपराध माना गया है वर्तमान में कोरोना का प्रभाव के कारण रोजगार मूलक कार्य संपूर्ण रूप से बंद है अपने पारंपरिक कार्य बांस का बर्तन बनाने से पूर्ण रूप से अभी उनका धंधा नहीं चल पा रहा है ऐसी हालत में राशन से वंचित करना कहां तक न्याय संगत है ग्राम अड़सरा के उपसरपंच समारू राम पंडों ने बताया कि घाघरा के पंडो समाज के लोगों को राशन से वंचित किया गया है एक दूसरे से बात करने पर अधिकारी अपना अपना पल्ला झाड़ रहे हैं।






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