बता दूँ आपको इक राज सुन लो
कटेगी फिर अचानक प्याज सुन लो
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इलेक्शन हो तो जाएँ ख़ामशी से
लुटेगी फिर सभी की लाज सुन लो
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अभी मौक़ा है फिर मत रोइएगा
गरीबों की जरा आवाज सुन लो
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चिरागों की जरूरत है किसे अब
नहीं होगा नया आगाज सुन लो
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भले ही रामजी का राज आये
नहीं छोड़ेगा चिड़िया बाज सुन लो
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ये मौसम का इशारा देखते हो
गिरेगी झोपड़ी पर गाज सुन लो
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बहुत ही साफ़ है परिदृश्य देखो
उभर आएगा फिर कोलाज सुन लो
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नहीं मालूम कल का ,हों न हों हम
सुनाना चाहते हैं,आज सुन लो
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@ राकेश अचल
टांय-टांय फिस्स
चुनावी रैलियों में कोविद प्रोटोकॉल का पालन न करने पर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा लगाईं गयी रोक को देश की सबसे बड़ी अदालत ने हटा दिया .हम चाहे,अनचाहे सबसे बड़ी अदालत के सबसे लोकहितकारी फैसले का स्वागत करते हैं. हमने हाईकोर्ट के फैसले का भी स्वागत किया था और अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी स्वागत करना हमारी विधिक और नैतिक जम्मेदारी है .हम आदतन स्वागतकर्ता हैं .
राजनीतिक दलों का ये जन्मसिद्ध अधिकार है कि वे रैलियां करें,इसलिए किसी नेता या पार्टी को रैली करने से रोका जाना उनके मौलिक एकदम मौलिक अधिकारों का हनन है.चुनाव में रैली कैसी और कैसे हो ये अधिकार तो केवल केंचुआ का है,इसमें कोई अदालत दखल क्यों कर दे ?मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने रैलियों पर रोक लगाकर केंचुआ के अधिकारों में भी मदाखलत की थी .सुप्रीम कोर्ट ने अब इसे दुरुस्त कर दिया है .अब कोई भी चुनवाई रैलियां कर सकता है .हाईकोर्ट की रोक से नेताओं को सांप सूंघ गया था,पहले रैलियों की वजह से जनता को कोरोना सूंघ रहा था .
आपको याद होगा कि केंचुआ ने राजनीतिक दलों को रैलियों में सौ लोग बुलाने की इजाजत दी थी ,लेकिन केंचुआ को नहीं पता कि सौ आदमी तो नेताओं की हवाई अड्डे पर अगवानी करने और उन्हें विदाई देने के लिए जुट जाती है. रैली में तो जब तक भीड़ का रेला न आये तब तक क्या अर्थ रैली का ? नेता और दल रैलियों पर पानी की तरह पैसा बहते हैं.अब तो बेचारे वातानुकूलित पंडाल बनवाने लगे हैं फिर भी अगर कोई भीड़ को आने से रोकता है है तो इसे अन्याय ही कहा जाएगा .गनीमत है कि हमारे यहां अन्याय के खिलाफ सुनवाई के लिए एक से बढ़कर एक अदालतें हैं,जहां हर सूरत में न्याय मिलता है .अब ये बात अलग है कि नया कभी जल्दी यानि फटाफट मिल जाता है तो कभी युग लग जाते हैं .
आज के वर्चुअल जमाने में हालांकि भीड़भाड़ वाली रैलियों के खिलाफ हम भी शुरू से हैं लेकिन हमारी मुखालफत को मानता कौन है. आज के जमाने में मुखालफत घोषित रूप से राष्ट्रद्रोह है .आप हाँ में हाँ मिलाते चलिए ,आपसे कोई कुछ नहीं कहेगा ,आप जरा से बेपटरी हुए नहीं कि आपकी शामत आई नहीं. बन्दे से ये गलती अक्सर होती है .आदत जो पड़ी है.जैसे लोग स्वागत के आदी हैं वैसे ही हम मुखालफत के .आखिर मुखालफत भी तो करने के लिए ही बनाई गयी है ?
देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले से नेता खुश हैं,राजनीतिक दल खुश हैं,और तो और केंचुआ खुश है,इसलिए हमें भी मजबूरन खुशी का इजहार करना ही है ,आप मान लीजिये कि हम भी खुश हैं .अगर रैलियां नहीं होंगीं तो हम रिपोर्टिंग काहे की करेंगे ! रैलियां राजनीति की प्राणवायु हैं .बिना रैली के आप राजनीति की कल्पना ही नहीं कर सकते.रैली के बिना भाषण देना जंगल में मोर के नाचने जैसा है. कहा जाता है न ‘जंगल में मोर नाचा तो किसने देखा ?’ जब किसी ने देखा ही नहीं तो नाचने का फायदा क्या ?
आपको शायद पता नहीं है कि हमारे नेता जंगल के शेर हैं,जंगल के मोर नहीं. मोर नाचता है और शेर दहाड़ता है. दहाड़ना पुरषार्थ की अभिव्यक्ति है जबकि नाचना एक ललित कला है.नाचना जनता के लिए आरक्षित है.नेता नचाते हैं और जनता नाचती है. बीते सात-आठ दशक से नाच रही है.नाचती सरकार भी है लेकिन उसका नाच नग्न होता है और हम हैं कि हमें नग्न नाच पसंद नहीं आता .लेकिन दुर्भाग्य ये है कि कोई इस नग्न नाचके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाता ही नहीं है .जनता को महंगाई,भ्र्ष्टाचार,भाई-भतीजावाद का नंगा नाच देखने की आदत पड़ चुकी है .
हमारे पुरखे शुरू से बताते आये हैं कि सच नंगा होता है ,सच की नग्नता ढांपने के लिए उसे झूठ के आभूषण पहनाने पड़ते हैं बाबा तुलसीदास जी ने भी कहा है कि-‘नारि न सोहे बिभूषन हीना ‘मतलब आप समझ गए न ! नग्नता को लेकर हमारे अपने मापदंड हैं. हम जहां नग्नता देखना चाहते हैं उसे मान्यता प्रदान कर देते हैं और जहाँ नग्नता हमें चुभती है वहां उसे पाबन्द कर दिया जाता है. इसके लिए क़ानून भी हैं और अदालतें भी .नग्नता को लेकर इतनी फुलप्रूफ व्यवस्था शायद ही दुनिया के किसी और मुल्क में हो?अगर हो तो जरूर बताइये .
बहरहाल देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा रैलियों पर लगाईं गयी रोक हटाने के बाद आज हम भी रैलियों के रैली में शामिल होने का मूड बना रहे हैं,आखिर देखें तो इस देश की जनता जनार्दन कितनी दुस्साहसी है जो जान हथेली पर रखकर भी नेताओं के झूठे भाषण सुनने जमा हो जाती है ? जनता को कोई नहीं समझा सकता,क्योंकि हमारी जनता शुरू से समझदार .हमारे नेता कहते भी हैं कि देश में लोकतंत्र जनता कि समझदारी से ही ज़िंदा है .समझदार जनता कभी नहीं देखती कि उसके सामने चुनाव मैदान में खड़ा प्रत्याशी कैसा है ? इसी वजह से देश की आधी संसद और ज्यादातर विधानसभाएं जरायम पेशा नेताओं से बाहरी पड़ीं हैं .
विषयांतर करने कामरा कोई इरादा नहीं है,इसलिए आइये रैलियों पर हाईकोर्ट द्वारा लगाईं गयी रोक हटाए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हम सब तहेदिल से इस्तकबाल करें ,न कि बाल की खाल निकालें .बाल की खाल निकालना छुद्रता माना जाता है .ये डबल छुद्र काम है.पहले तो खाल निकालना ही छुद्र काम है फिर उसमें से भी बाल की खाल निकालना डबल छुद्रता हुई कि नहीं !तो छुद्रता से दूर रहिये,रैलयां कीजिये और राजनीति के मजे लीजिये.खुदा हाफिज ,जय श्रीराम
@ राकेश अचल








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