भोली पर नादान नहीं हैं
फितरत सूरत से पहचानें
निपट गाँव की सुगढ़ औरतें
बोझ लकडिय़ों का सिर पे धर,
चली हाट को सभी चहकतीं
बतियातीं इक दूजे से वह
निर्भय होकर सहज महकतीं
बिना थके अनवरत कर्मरत,
काम किया करतीं मनमानें
निपट गाँव की सुगढ़ औरतें ।
चुल्हा चौका बर्तन कपड़ा
झाड़ू कटका और मजूरी
घर के बाहर घर के अंदर
करतीं सबकी रोज हुजूरी
कहना मत की ज्ञान नहीं है
गातीं लोक गीत के गानें
निपट गाँव की सुगढ़ औरतें ।

चटक रंग की साड़ी भाती
लाल गुलाबी फूलों वाली
साधारण सज्जा होतीं हैं
पर पैजन हों भारी वाली
करधन ककनी पैरी बिछुआ
रहन सहन का मतलब जानें
निपट गाँव की सुगढ़ औरतें ।
मर्यादा सर पे आँचल रख
पुरुषों के सँग हाथ बँटाती
कमा रहीं पैसे थोड़े पर
खुश रहतीं हैं नेह लुटाती
चंचल चितवन बोली मीठी
निश्छल होतीं हैं मुस्कानें
निपट गाँव की सुगढ़ औरतें ।
सब्जी बेचें फसलें रोपें
मनिहारिन सी गाँव घूमतीं
हर उलझन झटपट सुलझाकर
मस्ती का ले छाँव झूमतीं
छाजन छातीं खपरैलों से
आती घर को साज सजानें
निपट गाँव की सुगढ़ औरतें ।
गीता विश्वकर्मा नेह







Comments are closed.