नर्सिज ड़े स्पेशल- सेवा ही बन गया है जीवन – नेहा ऐडे डेढ़ वर्ष का बच्चा है और संयुक्त परिवार के बीच जीना होता है नर्स का किरदार नर्स के साथ साथ निभाना होता है कभी मां, कभी बेटी तो कभी बहू का किरदार


रायपुर । अस्पताल में नर्स का किरदार निभाना और घर को चलाना काफी संघर्ष पूर्ण रहता है । कभी मां कभी बेटी तो कभी बहू बनना पड़ता है । जिला अस्पताल, कालीबाड़ी की नर्स नेहा ऐडे का डेढ़ वर्ष का बच्चा है और वह संयुक्त परिवार में रहती है ।
कोविड-19 के शिविर जांच में एक माह तक लगातार सेवा देकर प्रतिदिन 40 से 50 लोगों का टेस्ट कर वह घर पहुँचती थी जहां वह मां, बेटी और एक बहू का रोल निभाती है जो किसी संघर्ष से कम न था । लेकिन खुशी भी थी की कम से कम कोविड-19 के प्रसार को खत्म करने के लिए लगातार लगे हुए है ।
विभाग ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी है लोगों की सेवा करने में । लोगों से निवेदन है की वह सरकार द्वारा समय समय पर जारी निर्देशों का पालन करें जिस प्रकार आप अपने परिवार की सुरक्षा चाहते है उसी प्रकार हम भी अपने घर सुरक्षित जाना चाहते है,’’ नेहा कहती है । डेढ़ वर्ष से ज्यादा समय कोविड-19 को प्रदेश में आये हो चुका है। नियमित रूप से प्रिकॉशन लेने से कोविड-19 से बचा जा सकता है । भगवान की दया यह रही है कि मुझे अभी तक कोविड-19 नहीं हुआ है,’’ नेहा कहती है।
वर्तमान में न्यू बोर्न बेबी के टीकाकरण की जिम्मेदारी है कोविड-19 के दौर में इस जिम्मेदारी का निर्वाहन करना भी एक चुनौती से कम नहीं है । बच्चे को सुरक्षित रखना, उसकी मां को सुरक्षित रखना और अपने को भी सुरक्षित रखना है । यह एक बड़ा चैलेंज हमारे बीच है बस हर समय भगवान से यही प्रार्थना रहती है “सब सुरक्षित रहे जहां रहे। “
नर्स के तौर पर प्रथम बार 2017 में ज़िला अस्पताल कालीबाड़ी में नेहा ने नौकरी की शुरुआत की थी। जब वह एनआरसी (न्यूट्रिशन रिहैबिलिटेशन सेंटर) यानि पोषण पुनर्वास केंद्र में सेवा दे रही थी तब एक बच्ची ने उसके जीवन को एक नया मोड दिया।
नेहा बताती है:“जब पोषण पुनर्वास केंद्र में सेवा देना शुरू किया वहाँ एक अति गंभीर कुपोषित 2 वर्षीय बालिका को लाया गया। उस समय लगा उसका बचना मुश्किल है क्योंकि उसका वजन बहुत ही कम था । उसको विशेष देखभाल की जरुरत थी । मैंने सोच लिया मेहनत करके मैं इसको नया जीवन दूंगी ।‘’
बस फिर क्या था नेहा उसकी सेवा में लग गई और उसकी मां को भी पोषक आहार के बारे में बताया । वह बच्ची बच गई । “उस समय लगा कि मैंने जीवन में सही सेवा की है और उसी दिन से सेवा को ही जीवन बना लिया है ।“

डीईआईसी विभाग (डिस्ट्रिक अर्ली इंटरवेंशन सेंटर)में एक वर्ष सेवा दी यहां पर जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई| लोगों को यह समझने की जरूरत है कि उनके बच्चे में भी एक विशेष बच्चा छुपा है । यहां पर ऑटिज्म के मानसिक विकार बच्चों के लिए काम किया और जीवन को एक जबरदस्त अनुभव भी मिला ।

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