नंदन, कादम्बिनी: संपूर्ण हिंदी जगत को आघात

हिन्दी पत्रिकाएँ सामाजिक व्यवस्था के लिए चतुर्थ स्तम्भ का कार्य करती है और अपनी बात को मनवाने के लिए एवं अपने पक्ष में साफ-सुथरा वातावरण
तैयार करने में सदैव अमोघ अस्त्र का कार्य करती है। हिन्दी के विविध आन्दोलन और साहित्यक प्रवृत्तियाँ एवं अन्य साहित्यिक गतिविधियों को सक्रिय करने में हिन्दी पत्रिकाओं का अग्रणी भूमिका रही है। उन्ही मे से एक कादम्बिनी पत्रिका भी थी। जो पाठकों और श्रोताओं को मंनोरंजन के साथ जीवन के वास्तविक से परिचय कराती थी।
आज उसका साहित्य जगत से जाना किसी विराने से कम नही है।
जो एक सीख/सबक के साथ नवयुवकों में जोश और जिज्ञासा को प्रोत्साहित करती थी और उन्हें एक नयी दिशा देती थी।
नंदन तो इतना प्यार नाम,
करना मंनोरंजन उसका काम।
बाल मनोहारो के शब्दों का खेल।
एक-एक अक्षरों के साथ ,
टूटी-फूटी शब्दों का मेल-मिलाप।
धीरे-धीरे पढ़ना सीखा, शब्दों के
मायाजाल में खुद को हुनरमंद
बनाना सीखा।
कभी परियों की दुनिया, कभी
नभचर तो कभी जलचर प्राणियो
मीठी-मीठी वाणियां,
कभी चीटू-नीटू की चटोरी बातें।
मन को हर्षोउल्लास से भर देती
थी।
हर महीने पढ़ने की जिज्ञासा
बनी रहती थी।
आज उसका हम सब के बीच से
यूँ चला जाना मानों अपने से दूर हो जाना जैसा है।

नंदन पत्रिका की शुरूआत 1964 पं जवाहरलाल नेहरू की स्मृति में की गयी थी। जब नंदन प्रकाशित हुई तो उसका पहला अंक नेहरू जी को समर्पित था। प्रमुख रूप से नंदन की कहानियाँ पौराणिक और परी कथाएं होती थी। पत्रिका में छपने वाली ‘सुशील कालरा’ द्वारा बनायी गयी काॅमिक चित्रकथा चीटू-नीटू काफी लोकप्रिय थी।
जयप्रकाश भारती हिन्दी के लेखक और नंदन के पूर्व संपादक थे।भारती जी हिन्दी बालसाहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया इसलिए उन्हें हिन्दी बाल साहित्यकार का निर्माता कहा जाता है।
आज बढ़ते टेक्नोलॉजी ने जहाँ लेखन की कुशलता, व्यवहारिकता ,पत्र-पत्रिकाओं से मिलने वाले ज्ञान, अनुभव और जिज्ञासा को कही ना कही कम कर दिया। यहां कहना उचित होगा कि आज नेटवर्किंग की दुनिया मे विविध प्रकार के ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है पर क्या हम उचित और अनुचित निर्णय ले पा रहा रहे कि हमे किस तरह का ज्ञान चाहिए।
बच्चों के मन पर तमाम तरह के दबाव प्रेषित किए जा रहे हैं। जिसका कही न कहीं परिणाम देखने को मिल रहा है।

(ज्योति सिंह) उत्तर प्रदेश जिला-देवरिया

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