देश के मूर्धन्य लेखक पत्रकार राकेश अचल जी की कलम से- रायपुर के पत्रकारों मौन तोड़ो !


सुनिल नामदेव

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक नामचीन्ह पत्रकार बीते कुछ दिनों से जेल में है.पत्रकार की गिरफ्तारी से रायपुर प्रेस को या तो सांप सूंघ गया है या सबने गिरफ्तार पत्रकार को पहले से ही दोषी मानकर उससे किनारा कर लिया है.पत्रकार का नाम है सुनील नामदेव.सुनील ने एक लम्बे आरसे तक ‘ आजतक ‘ जैसे नामचीन्ह न्यूज चैनल के लिए काम किया था .
सुनील की ग्रिफ्तारी के पीछे पुलिस की कहानी सच्ची है या झूठी ? इस पर रायपुर प्रेस में कोई मंथन नहीं हुआ.सुनील की गिरफ्तारी की खबर भड़ास मीडिया ने जाहिर की. भड़ास ने ही बताया कि सुनील को एक आईपीएस अफसर के खिलाफ मोर्चा खोलने के कारण एक कूटरचित आपराधिक मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया .सुनील पर भयादोहन करने का आरोप है .भयादोहन यानि ‘ब्लैक मेलिंग ‘
सत्ता प्रतिष्ठान ,पुलिस और रसूखदार लोगों के खिलाफ लिखते हुए पत्रकारों पर ब्लेकमेलिंग के आरोप लगना नयी बात नहीं है. आरोप सही हैं या गलत ये तय करना अदालत का काम है लेकिन यहां तो सत्ता और स्थानीय प्रेस ही मौन साधकर बैठ गयी है.सबने शायद सुनील को ब्लेकमेलर मान लिया है. शायद सभी को लगता है कि पुलिस की कहानी सौ फीसदी सही ही होगी .हो भी सकता है लेकिन क्या किस वरिष्ठ पत्रकार की गिरफ्तारी पर राज्य की प्रेस का मौन उचित है ?
मुझे याद है कि 1986 में चंबल इलाके में तबके नामचीन्ह अखबार जनसत्ता के मुरैना संवाददाता को इसी तर्ज पर तबके प्रशासन ने जेल में ठूंस दिया था,जेल में ही नहीं ठूंसा था बल्कि उसकी एक पखवाड़े तक जमानत नहीं होने दी गयी थी. मामले की जाँच करनेआए जनसत्ता कार्यालय के एक नामचिन्ह पत्रकार ने भी अपने संवाददाता की मदद नहीं की थी .लेकिन मुरैना छोटा शहर था,रायपुर तो एक प्रदेश की राजधानी है .वहां अगर पुलिस किसी पत्रकार को जेल में ठूंस देती है तो कम से कम किसी को तो इसकी मुखालफत करना चाहिए .किसी को तो मामले पर सवाल करना चाहिए ?
किसी पत्रकार को ब्लेकमेलर कह देना बहुत आसान काम है .पत्रकार ब्लेकमेल करते भी होंगे ,लेकिन पुलिस किसी पत्रकार की कॉलर पर हाथ तभी डालती है जब आरोपी पक्ष को अपने ‘नग्न’ होने का भय सताने लगता है.बिना गुठली के आम नहीं जमता .ब्लेकमेलिंग के मामले में भी दाल में काला होता है .ऐसे मामले तब दर्ज किये जाते हैं जब पत्रकार बिरादरी ही दोफाड़ हो जाती है .सुनील के मामले में भी मुझे यही लगता है .इसलिए इस मामले की कम से कम जांच तो होना चाहिए थी .
रायपुर के पत्रकारों के बारे में मेरी धारणा बहुत अच्छी है. यहां के पत्रकार एक तरफ सत्ता प्रतिष्ठान से लोहा लेते हैं और दूसरी तरफ नक्सलवादियों से.हमरे शहर के वरिष्ठ आईएएस स्वर्गीय ब्रम्हदत्त शर्मा मुझसे छत्तीसगढ़ के पत्रकारों की बहुत तारीफ़ करते थे ,इसलिए मुझे हैरानी होती है कि छग के पत्रकार अपने ही एक साथी की गिरफ्तारी पर गुड़ खाकर क्यों बैठे हैं .मुमकिन है की सुनील दोषी हो लेकिन इसके लिए कम से कम अदालत में मामला तो पहुँचने दीजिये,जब तक वो दोषी साबित नहीं हो जाता तब तक तो उसके साथ खड़े होईये .
छत्तीसगढ़ प्रेस में मेरे अनेक मित्र हैं.कुछ ने दबी जुबान में मुझे सुनील की गिरफ्तारी का सच भी बताया,कुछ ने मौन साधा और कुछ ने उसे ब्लेकमेलर भी कहा .मुझे इसमें कोई हैरानी नहीं है .सुनील ने ब्लेकमेलिंग की होगी तो वो सजा भुगतेगा लेकिन एक क्षण के लिए मान लीजिये कि वो निर्दोष है और उसे पुलिस ने जानबूझकर जेल में ठूंसा है ?तब क्या होगा ?आज रायपुर प्रेस की चुप्पी कल सुनील जैसे ही अनेक पत्रकारों के लिए आफत बन सकती है .छत्तीसगढ़ में भी मोदीमीडिया की तर्ज पर एक वर्ग है जो सत्ता प्रतिष्टाह्न के साथ चलता है लेकिन एक ऐसा वर्ग भी है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा पत्रकारों की प्रताड़ना के खिलाफ लड़ने का हौसला रखता है.उसे आगे आना ही चाहिए .
सुनील नामदेव आजीवन तो जेल में रहने वाला नहीं है.उसे एक न एक दिन जमानत भी मिल सकती है और वो निर्दोष या दोषी भी साबित हो सकता है .पुलिस दरअसल रायपुर प्रेस को सबक सीखना चाहती है ,और दुर्भाग्य ये है कि रायपुर प्रेस पुलिस के झांसे में आ गयी है .मेरा छग के सबंसत जागरूक मित्रों से आग्रह है की वे इस माले का संज्ञान अवश्य लें ,अन्यथा मुसीबत ने आपका घर तो देख ही लिया है.ध्यान रहे कि सुनील नामदेव को मै तब से जनता हूँ जब वो केवल प्रशिक्षु था .मै उसे निर्दोष होने का सर्टिफिकेट फिर भी नहीं दे रहा लेकिन मै उसे फिलहाल प्रताड़ना का शिकार मानकर चल रहा हूँ. मुमकिन है कि मै गलत भी होऊं.लेकिन आज मुझे सुनील से सहानुभूति है .

राकेश अचल
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