
(1)
इस नवरात्रि देवी पधारो
हमारे द्वार
रक्तबीज का करो संहार
पर ना बनने दो उसको अवतार
रुकते नहीं उसके नए संस्करण
नित होता नया अंकुरण
आता नित नए रूप में
मनमोहक परिवेश में
आत्ममुग्ध होते मंत्रमुग्ध
शेष कहलाते संदिग्ध
नये रक्तबीजों का करो संहार
मानवता का करो उद्धार
(2)
इस नवरात्रि देवी पधारो
हमारे द्वार
पर उनके घर ज्यादा जहां बच्चियां जलाई जाती हैं
उनके घर भी जहां बलात्कारी आतंक फैलाते हैं
उनके घर भी जहां भूखे बच्चे बिलबिलाते हैं
उनके घर भी जहां पूजन सामग्री नहीं खरीद सकते
देवी पधारो
उनके घर भी जहां लाचारी ही पसरी रहती है
उनके घर भी जिनकी बीमारी के अस्पताल नहीं
उनके घर में जिनको स्कूलों का प्रकाश नहीं
उनके घर भी जिनकी आंखों में अब आस नहीं
(3)
देवी पधारो
संबल दो
जो लड़ते हैं अन्याय से
भूख और बेईमानी से
धोखेबाजों और जमाखोरों से
हिंसा और अपराध से
घृणा और विद्वेष से
क्षूठे सपने दिखलाने वालों से
धर्म को अधर्म बनाने वालों से
गरीब पर लाठी बरसाने वालों से
उनकी बच्चियों को मारने वालों से
देवी संबल दो
न्याय की अलख जगाने वालों को
जुगनू बन प्रकाश फैलाने वालों को
आशा का संचार करने वालों को
नैराश्य भगाने वालों को
राकेश श्रीवास्तव






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