दर्द थपथपा के देता है,
एक तसल्ली ।
आदी हो चुका हूँ , इस थाप की ;
बुझते दीपक से जाते हुए , तम के पदचाप की ।
भूख को तो अब तसल्ली से
बहलने की आदत सी पड़ गई है ।
पर सांस चलती रहे,
इसी से देखता हूँ हवा की राह ;
और सिर्फ रखता हूँ ,
सूखे गले की प्यास बुझाने की चाह ।
जिजीविषा आज इतना ही तो मांग रही है ।
क्या गुनाह है उसका ? क्यों न मांगे ?

जमीन से जुड़ा रहा था मैं सदा,
मेरी छत से सटे आठ मंजिलों का मकान
मेरे हिस्से की धूप भी खा जाता था ।
तुम्हारी तसल्ली मेरे छत की ऊंचाई न बढ़ा पाई
चारों ओर से घिरा मैं और मेरा घूटता दम ।
मैंने हवा मांगी , तो तुमने हवा के लिए
हाँफती नदी की उम्मीद रख दी।
थोड़ा पानी मांगा, तो बदले मे
हालात मे इतनी नमी रख दी
कि आंखे भी धुंधली हो गई , कुछ देख ना पायी ।
हाँ, कानें सुन रही थीं , तुम्हारे तसल्ली के स्वर ।
जैसे नदियां उफन रही हों ,
पर उफनती नदियों से समुंदर बन नहीं सकता ।
वो तो वहीं की वहीं किनारे पर दम तोड़ती हैं।
क्या हम भी वैसे ही टूटेंगे जैसे रोज टूटते हैं ?
पार किया है हमने इस भूमंडल के साथ
उम्र का यह पड़ाव ।
उदासियों से लदी बाकी उम्र ,
शुकुन की तलाश मे क्या
कब्रें खोदती रह जाएंगी ?
ये कैसी उदासी है, पीछा छोडती नहीं ।
हजारों लम्हों के बाद क्या जिंदगी को यही हासिल है ?
तसल्ली से जी न सके ,
कम से कम तसल्ली से तो मर पाएँ ।
बोलो न, कब तक यूं ही बैठे रहें ?
दुआ मे हाथ उठाए ।






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