डॉ मंजुला साहू “निर्भीक की एक कविता- प्रकृति और विकास

दिनकर की स्वर्णिम रश्मियाँ,
अपनी स्निग्ध आभा से ,
जब जीवन का आग़ाज़ करें ।
तब आशाओं के सुनहले,
सुमन पल्लवों के आसपास,
मंडराते हुए भँवरों को देखो ।
उनके श्यामल सलोने रूप में,
मेरे रूप को निहारो ।
मैं पर्यावरण हूँ ।
मैं पर्यावरण हूँ ।

दूर वहाँ दृष्टि डालो जहाँ,
घने जंगल में कभी गूंजता था,
मोहक पक्षियों का मधुर कलरव ।
आज ,
आज काली पथरीली सड़कों पर,
वाहन शोर मचाते हैं ।
अश्रु बहाते मौन खड़े वृक्षों के ठूँठ,
बरखा की शबनम को ,
आवाज़ देने से कतराते हैं ।

अपने हाथों में कुल्हाड़ी लिये,
इन वृक्षों के पीछे मत भागो ।
वसुधा के धानी ऑंचल में,
धुआँ उगलते कारख़ाने मत टाँकों ।

सुन पर्यावरण की करुण पुकार,
ह्रदय पसीजा दामिनी का ।
हौले से मुस्कुरा बोली चंचला,
क्या समझ पाओगे इसका नतीजा!

चपला होती है निर्मित इन संयंत्रों में,
स्पंदन भरती है जो सब यंत्रों में ।
बोली चपला मुझसे अलग ,
मानव का अस्तित्व नही है ।
विद्युत मानव जीवन की,
पहली शर्त है ।

ना होगी बिजली,तो वातानुकूलन,
की शीतलता कहॉं से पायेंगे!
स्नान हेतु कड़कती ठंड में ,
ऊष्ण जल कहॉं से लाओगे!

उदरपूर्ति हेतु भी फिर ,
कोयला या काष्ठ जलाओगे ।
श्यामल धूम्र के इन मेघों में,
मित्र तुम सॉंस ना ले पाओगे ।

वृक्षों के कटने से ,
लकड़ी के जलने से ,
बिन प्राणवायु तुम
जीते जी मर जाओगे ।

विद्युत ना होगी तो ,
थम जायेगी लौह पथ गामिनी ।
विकास के पहिये थम जायेगें ,
जो थम जायेगी दामिनी ।

देख पर्यावरण का पीत मुख ,
दामिनी का हिय भर आया ।
बोली ,
हम दोनों के साथ में ही ,
मानव का भला है ।
दोनों का संतुलन बनाकर ,
चलना एक कला है ।

ये कला हम मानव को ,
समझायेंगे दोनों मिलकर ।
करें कर्म जो हों ,
हम सब के लिये हितकर ।

मापदंडों पर खरे उतरते ,
बिजली घरों का हो निर्माण ।
श्यामल धूम्र ना नीचे आये ,
उच्च चिमनी का रखें ध्यान ।

तपते प्रदूषित जल का ,
हो पूरा शुद्धीकरण ।
तभी तो रुक पायेगा ,
पुनीत सलिलाओं का प्रदूषण ।

हे मानव —-
सरिताओं के पावन जल को ,
निर्मल ही रहने दो ।
सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा,
के उपयोग को बढ़ने दो ।

हर ऑंगन में,राहों में,
गलियों में,चौराहों में,
वृक्षों की क़तार खड़ी कर दो ।
फिर देखो तुम महसूस करोगे ,

शीतल सुवासित मंद बयार ,
साँसों में रस घोल रही है ।
हरित तृणों के बिंदु पल्लव से ,
सुख की बॉंसूरी बोल रही है ।

सुन खिल उठा मुख पर्यावरण का ,
आल्हादित हो बोल उठा ।
स्निग्ध चॉंदनी की ठंडक ,
शीतल बयारों का निनाद हूँ मैं,
चंचला चपला विद्युत संग ,
मानव का सर्वस्व विकास हूँ मै ।
मानव का सर्वस्व विकास हूँ मैं ।

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