कोरबा के रहोइया मन, झन कोईला ल बारा ग l
कुहरा रहित सहर बना के, जिनगी ल संवारा ग l

उडीहा के ये कुहरा ह, भरथे महूरा हवा म l
जेकर नी ऐ कोनो इलाज, कसनो दारू, दवा म l
जान बुच के टांगी ल, अपने गोड झन मारा ग l
कुहरा रहित..
“बाचें पइसा ऐला बारे म, अऊ फोकट म मिल जाथे l
तेमा हमर काम चलत हे, बऊरे म का जाथे “l
बड दिन ले रोखियाय सोच के, भुतवा ल उतारा ग l
कुहरा रहित..
नी लगाम ऐमा कसबो, ईहा ले भागे परही l
चूकचूक ले दिखत कोरबा, मरघट्टी सही बनही l
सुधरा नी तो मान लेवा, नी ऐ काहिं चारा ग l
कुहरा रहित..
कथें सहर म रईथे, पडहे लिखे मनखे मन l
जेमन बूता करथे, रहे, हली भली सबके जीवन l
फेर इंहा तो अडहा -ड़डहा, हर गली हर पारा ग l
कुहरा रहित..
प्रभात कटगीहा
कटगी







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