नेता जैसा चाहें करते जा रहे l
जैसे छले थे पहले छलते जा रहे l
हो चुनाव का मौसम नफ़रत को फैलाते l
उछाल भावुक मसले आपस मे लड़वाते l
हम भी मूर्खों जैसा लड़ते जा रहे l
आम लोगों के हित कर्ज लेना पड़ता
संवेदनशील बनने का सुन्दर मौका मिलता
कोष वेतन पेंशन पे लुटते जा रहे l
हम तोड़ें नियम तो अपराधी हो जाते l
खाकी वर्दी पकड़ के दस डंडे लगाते l
क़ानून को रखैल वो समझते जा रहे l

सात पीढ़ी के हित धन को वो संजोते l
एक जून की रोटी पाने अकिंचन रोते l
कृषक लटक के फांसी पे मरते जा रहे l
तंत्र नाचे उनके आगे ज्यूँ नचनिया l
सच कहते है रूपये पैसे वालों की दुनिया l
जम्हूरियत हम उसको कहते जा रहे l
क्या बनाने के हित आज़ादी हम पाए l
वीर वीरांगनाओ ने निज प्राण गंवाए l
और क्या से क्या हम बनते जा रहे l
प्रभात कटगीहा
कटगी






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