
महानवमी का दिन … हम सभी सुबह तड़के ही उठ गए ….. काम वाली बाई तिहारिन भी जल्दी आ गई । सब लोग घर की साफ सफाई में लगे हुए थे … आज श्रीमती जी के नवरात्रि व्रत का समापन और हवन पूजन का कार्यक्रम जो होना है। बहरहाल घर की झाड़ू बुहारु चौका चूल्हा धो माँजकर जब तिहारिन वापस जाने लगी तो श्रीमती जी ने आवाज लगाई … थोरकिन रुक के जाबे ओ ऽऽऽ अपन पैसा कौडी़ ला ले लेबे .. कालि तिहार हे ना ……. तिहारिन मुडी़ और मेरे पास ही आकर खडी़ हो गई । मैंने उसके घर का हाल चाल पूछा और बाँतों ही बाँतों में बोल पडा़ – कैसे ओ तिहारिन ए दारी रावण मारे बर कहाँ जाबे ….. मेरी बात सुनकर तिहारिन तुनक उठी – का करिहा जी रावण ला मार के .. आजकल त ओखर ले जादा खतरनाक विभीषण ह होगे हे ….. तेखर सेति ए दारी हमन रावण ला नहीं विभीषण ला मारबो मास्टर जी … । मैं तिहारिन की बात सुनकर दंग रह गया और तब तक एकटक उसकी ओर देखता रहा जब तक कि वह आँगन वाला गेट उढ़काकर आँखों से ओझल नहीं हो गई …. । मै अब भी तिहारिन की कही गई बाँतों में उलझा हुआ था… मेरी उलझन को श्रीमती जी आसानी से ताड़ गईं और बोलीं – जब तक तुम्हारे दिमाग की गुत्थियाँ शांत नहीं होंगी तब तक तुम्हारा मन पूजापाठ में नहीं लगेगा .. इसलिए पहले ये लो पकडो़ अपने अनोखेलाल जी को और हो जाओ शुरू.. फिर क्या था फौरन मैने अपने चश्में महाराज को चढा़ लिया नाक पर और लगा झाँकने चश्में के भीतर से …….
हर साल हम दशहरा मनाते हैं छोटे बडे़ अलग अलग आकार प्रकार के अनेकों रावण जलाते हैं । लेकिन साल भर बाद रावण वैसा ही जस का तस । लोग कहते हैं रावण बाहर कहीं नहीं बल्कि हम सबके अंदर ही रहता है बुराइयों के रूप में । हर बार दशहरे पर रावण के पुतले को जलाना बुराइयों को नष्ट कर अच्छाइयों की तरफ अग्रसर होने का हमारे संकल्प को व्यक्त करता है ।
वैसे देखा जाय तो बुराइयों रुपी रावण तो समाज में हमारे चारों तरफ घूमते ही रहते हैं । उनसे उतना नुकसान हमें ,समाज को या देश को नहीं हो रहा है क्योंकि सीधे सीधे सामने आने के कारण उनका अंत हम आसानी से कर सकते हैं लेकिन असली खतरा तो उन विभीषणों से है जो तथाकथित सत्यवादी ,ईमानदार , समाजवादी और राष्ट्रवादी होने का दिखावा करते नहीं थकते ।
ऐसे विभीषण हमें घर से लेकर समाज तक , किसानी से लेकर व्यापार तक और शासन प्रशासन से लेकर सरकारी महकमों तक अलग अलग वेश धारण किये हुए मिल जाएंगे जो सामने से तो आपका हितैषी बनने का दावा करेंगे और पीठ पीछे खंजर घोपने से भी गुरेज़ नहीं करेंगे ।
अपने देश का खाकर दूसरों की चापलूसी करने वाले विभिषणों की नस्ल भी हमारे देश में बहुतायत से मिलती है । एक से बढ़कर एक उपाधीधारी , बुद्धिजीवी और समाजसेवी किस्म के विभीषण मिल जाएंगे जो अपने आप को सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए अपनी जमीन खिसकाने वाले विचार व्यक्त करने में पीछे नहीं रहेंगे ।
घुन की तरह सिस्टम को खोखला करने वाले विभीषणों की भी कमी नहीं है हमारे देश में । ऊपर से तो कर्तव्यनिष्ठ , ईमानदार होने का दावा करते हैं लेकिन भरपूर दक्षिणा मिलने के अभाव में अपने टेबल पर पडी़ पब्लिक वेलफेयर की फाईलों को कई कई महीनों लटकाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते ।
धर्मनिरपेक्षता का आवरण ओढे़ कुछ ऐसे विभीषण भी देखने को मिलते हैं जो गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए सिर्फ और सिर्फ अपनी राजनीती चमकाने के नाम पर मंदिर मस्जिद गिरिजा गुरुद्वारों में जाते हैं और पूजा अर्चना का नाटक कर सभी धर्मों में आस्था प्रगट करते हैं और रात के अँधेरों में सभी घिनौने कुकृत्य करने से बाज नहीं आते हैं ।
एक बात तो ज़रूर समझ आती है कि इंसान अगर अपने सामने आने वाले खतरे को पहचान लेगा तो उसका सामना कर ही लेगा किसी तरह लेकिन अगर उसे पता ही नहीं चलेगा जिसे वो खिला पिला कर पाल पोष रहा है वही आस्तीन का साँप निकलेगा तो वह क्या ही कर लेगा । ठीक यही बात लागू होती है रावण और विभीषण के कैरेक्टर्स के साथ । जब हम इन सामाजिक रावणों को देख कर पहचान लेंगे तो किसी तरह इनका सामना भी कर लेंगे और इनका खात्मा भी कर देंगे । असली समस्या तो हमारे इर्दगिर्द घूम रहे तरह तरह के मुखौटे लगाए भ्रमण करते उन विभीषणों से है जो सामने से नहीं बल्कि पीछे से या परोक्ष रूप से वार करते हैं और हमारा तथा समाज का अहित करते रहते हैं ।
इतिहास भले ही राम जी की सहायता करने के खातिर अपने कुल , देश और समाज से विश्वासघात करने वाले विभीषण को माफ कर दे लेकिन अपने परिवार ,समाज तथा देश से गद्दारी करने वाली विभीषणवादी सोच को आज की समझदार युवा पीढी़ किसी हाल में माफ नहीं कर सकती ।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम हर साल रावण मारने के पीछे भागने के बजाय अपने आस पास और बीच में छुपे हुए विभीषणों को ढूँढ़ निकालें और उसके संहार का उपाय करें क्योंकि आज के दौर में रावण से कई गुना ज्यादा खतरनाक हो गया है हम सभी के अंदर घर कर गया विभीषण जो सामने से नहीं बल्कि पीठ पीछे से वार करता है और हमारे सारे किए धरे पर पानी फेरते रहता हैं ।
मेरे मन की सारी उधेड़बुन समाप्त हो चुकी थी । हर साल रावण मारने की जुगत में दशहरे के मेले में जाने वाले मुझ जैसे पढे़ लिखे इंसान को घरों में झाडू़ – पोंछा कर जीवन यापन करने वाली अनपढ़ महिला ने बडी़ ही आसानी से रावण मारने के मेरे मन के आडंबर और विभीषण को खत्म करने की महती ज़रूरत को समझा दिया था । चश्मा अभी भी मेरी नाक पर चढा़ हुआ है लेकिन काम वाली बाई तिहारिन की बात अब भी मेरे कानों में गूँज रही है – ए दारी रावण ला नहीं विभीषण ला मारबो हमन मास्टर जी ।







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