चश्में के भीतर से – घनश्याम तिवारी —- क्या ही कर लेगा कानून साला …… ?

मोबाइल पर लाॅकडाउन खुलने की खबर आई तो बडा़ ही अटपटा लगा। अटपटा इसलिए कि इस तरह का लाॅकडाउन और अनलाॅक का दंश कई कई बार मन झेल चुका था। शटर के बाहर से लाॅकडाउन और अंदर तो सब कुछ खुला ही खुला … ।बहर हाल अनलाॅक के पहले ही दिन नहाधोकर बढ़िया तैयार होकर हमने एक थैला उठाया और निकल पडे़ बाजा़र की ओर। बमुश्किल तीस चालीस मीटर ही आगे बढे़ होंगे अचानक स्कूटी के पीछे बैठी श्रीमती जी ने टोका … बडा़ गज़ब करते हो यार .. ये माना कि महामारी का असर ज़रा कम हो गया है, सरकार ने लाॅकडाउन हटा लिया है मगर इसका यह तो मतलब नहीं कि सेफ्टी मेजर्स लेना ही भूल जाएं। बनते तो हो पता नहीं कहाँ के बड़के कवि , साहित्यकार , बुद्धिजीवी .. अगर तम लोग ही इन सब चीजों की परवाह नहीं करेंगे तो कौन करेगा … ? इतना सब सुनने के बाद मेरी मजा़ल थी कि आगे बढ़ जाता ….. फौरन हमने स्कूटी घुमाई और वापस हो लिए घर की ओर …. ।
घर के करीब पहुँचा ही था कि बाउंड्री गेट के पास ही इंतज़ार करता मेरा बेटा मिल गया। अरे ज़रा आगे पीछे की सुन भी लिया करो पिताश्री … इस बार फिर आप माॅस्क पहनना भूल गये … हम लोगों ने बहुत आवाज दी मगर आप सुनो तब न … । अरे कुछ नहीं होता यार … । अगर तुम्हारी माताश्री ने जोर नहीं दिया होता तो मैं लौटकर क़तई वापस नहीं आता .. और वह भी माॅस्क पहनने के लिए .. । मेरा जवाब सुनकर मेरा बेटा तुनक गया – इतने दिनों तक ईमानदारी से प्रोटोकॉल का पालन किया है तो अब ये आखरी समय चल रहा है सारी मेहनत पर पानी मत फेर देना और हाँ इस बार के अनलाॅक को ज़रा सा भी हल्के में मत लेना … बीमारी पकडे़गी या नहीं ये तो देखा जायेगा लेकिन पिछवाड़े पर जो डंडा पडे़गा वो कभी नहीं भूल पाओगे । पास ही खडा़ बेटे का दोस्त बोल पडा़ – खुद तो वाट्सअप , एफबी चलाते और गपियाते किनारे पर लाठी पकडे़ खडे़ रहते हैं ट्रैफिक पुलिस वाले .. खुद न तो कभी सेनेटाइजर लगाए और न ही माॅस्क पहने , इतना ही नहीं चौराहे वाली गुमटिओं पर खुले में चाय नाश्ता करें … वो भला क्या किसी को पकडे़गे … बनने से पहले ही जो हजा़र हजा़र बार टूटता है वो क्या ही कर लेगा कानून साला …… ? बेटे और उसकी बातों में जबरदस्त विरोधाभास था। दोनों की ही बात सुन मैं कुछ पलों के लिए सुन्न सा हो गया। हर बार की तरह श्रीमती जी ने झिंझोर कर उठाया .. यहाँ मूर्ती बने सोचते ही रहोगे या बाजा़र भी चलोगे .. । श्रीमती जी की आवाज़ सुनकर मेरी तंद्रा टूटी और मैने झट से माॅस्क लगा लिया । मेरा मस्तिष्क दोनों बच्चों की बाँतों के उधेड़बुन में लगा हुआ था … मैं इस मसले पर गहराई में डूबकर मंथन करना चाहता था … मुझसे रहा नहीं गया .. घर के अंदर घुसा और ले आया अपने चश्मे महाराज को , स्कूटी स्टार्ट की और नाक पर चढ़ा लगा झाँकने चश्में के भीतर से ….. ।
अनलाॅक के पहले दिन का नजा़रा बडा़ ही साफ साफ और स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था ….. । ये क्या आज तो शहर का पूरा नजा़रा ही बदला बदला सा लग रहा था। जगह जगह की गई नाकेबंदी खोल दी गई थी। पोंऽऽऽ पोऽऽऽ हाॅर्न देते हुए दनदनाते फर्राटा भरने वाली पुलिसिया गाड़ियाँ जगह जगह खडी़ मिलीं लग रहा था मानों लंबे अरसे तक चौबीसों घंटे लगातार काम कर कर के थक चुकीं ये पुलिस वाली गाड़ियाँ अपनी थकान मिटा रहीं हों। चौराहों पर तैनात हमारे ट्रैफिक वाले जवान भी सड़क किनारे खडी़ मोटर साईकिल पर बैठे फोन पर उँगलियाँ फिराते अपनी थकान मिटाने के जतन में लगे हुए थे। हरी लाल बत्ती की परवाह किए बगैर वहाँ से आने जाने वालों से उनका क्या वास्ता …. । जो खुद ही माॅस्क नहीं पहने हुए थे वो जनता को रोकेंगे कैसे .. और जनता उनकी सुनेगी भला कैसे …. ? यह एक सोचनीय स्थिति नज़र आ रही थी।
पहले दिन का बाजा़र और दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही गुलजार था। न खरीदने वाले और न ही बेचने वाले किसी का भी चेहरा माॅस्क से ढँका हुआ नहीं था। इस बीच कुछ पढ़े लिखे और बुद्धिजीवी किस्म के लोग भी मिले जिन्होंने माॅस्क तो लगाया था लेकिन डेढ़ होशियारी में नाक के नीचे खिसकाकर माॅस्क पहनने का उनका तरीका अपनी सामाजिक जवाबदेही के प्रति गंभीर होने की दास्ता बयान कर रहा था । बाजा़र के नुक्कड़ में सोशल डिस्टेंसिंग के पालन करने की मुनादी करने वाले नगर निगम के स्वच्छता प्रहरी ( कोरोनावारियर्स ) इस महामारी के काल में भी सरकार द्वारा बैन किये गये गुटका पान मसाला पाॅउचों को खा खाकर थूकते हुए नज़र आ रहे थे । भला मुनादी करते हुए उनकी अपील कौन मानने वाला था।
बाजा़र से निकलकर हमने अपनी स्कूटी शहर के सबसे व्यस्त और आभिजात्य कहे जाने वाले इलाके की सड़क की ओर बढा़ दी। रास्ते में पडे़ एक तीन मंजिला बँग्ले के अंदर से डिस्को म्यूजिक की आवाज़ आ रही थी। हमने थोडा़ आगे बढ़ जाने के कारण एक बार फिर से अपनी स्कूटी को बैक किया और पहुँच गए उस बँग्ले के पास … दस बारह की संख्या में गाड़ियाँ खडी़ं थी गेट पर लगी नेम प्लेट से तो पता चल ही गया कि यह किसे बडे़ अबसर का किराये पर लिया हुआ बँग्ला है और सामने खडे़ गाॅर्ड ने बता ही दिया कि बडे़ साहब का हुक्म है कोई भी अंदर आने न पाए.. अंदर बर्थडे की पार्टी चल रही है।
हमने अपनी स्कूटी को एक बार फिर से घुमाया और निकल पडे़ शहर के सबसे भीड़भाड़ वाले इलाके चौपाटी की ओर … । यहाँ ही असल में देखने को मिली हमें सोशल डिस्टेंसिंग की पूरी तरह से ऐसी की तैसी …. । सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखने के लिए जिन सिपाहियों को तैनात किया गया था वे ही भकाभक गुपचुप और चाट पेलने में लगे हुए थे । जनता के लिए तो यह किसी सुनहरे अवसर से कम नहीं था, जहाँ देखो वहीं खाओ … जहाँ मन चाहे वहीं धोओ, डिस्पोजल फेंको और चाहे जहाँ मन करे वहीं थूको .. ।
अब हम गुज़र रहे थे एक पाॅश इलाके वाले बाजा़र में सड़क के बीचो बीच … । हमने अपनी स्कूटी शहर के एक सबसे बडे़ और ख्यातिलब्ध मेडिकल स्टोर के सामने खडी़ कर दी । सोशल डिस्टेंसिंग और सेनेटाइजेशन के लिए बडे़ बडे़ स्लोगनों अटे पडे़ इस मेडिकल स्टोर में सोशल डिस्टेंसिंग नाम की कोई चीज़ ही नहीं थी । हम तो अपनी सुरक्षा अपने हाथ की तर्ज पर सबसे पीछे प्राॅपर डिस्टेंस बनाकर खडे़ हो गये लेकिन न लोगों को नहीं स्टोर वालों को … किसी को भी इसकी परवाह थी । थोडी़ देर में प्रशासन की गाड़ी आकर खडी़ हुई। गाडी़ का सायरन सुनकर स्टोर मालिक का भोंपू भी शुरू हो गया … आप सभी लोग माॅस्क लगा लो भाई … थोड़ी दूर दूर खडे़ हो जाओ .. नहीं हो दवा नहीं मिलेगी … । थोडी़ ही देर में स्टोर का एक बंदा दवाइयों के लिए बनाया गया सबसे बडा़ वाला लिफाफा लेकर गया और गाडी़ के अंदर दे आया … उसके आने के बाद स्टोर मालिक ने कहा … वो तो मैने ऐसे ही कह दिया था … आप लोग आराम से दवाइयाँ लो । माॅस्क वास्क का कोई चक्कर नहीं है… उनको जो दवाई चाहिए थी वो मिल गई … अब वो पलटकर भी इधर देखेंगे नहीं। मुझे अपने बेटे के दोस्त की बाँतें लगातार याद आ नहीं थीं और सच होते हुए भी दिखाई पड़ रही थी।
अब हम लौट रहे थे घर की ओर आसमान हल्के हल्के अँधेरे के आगोश में समाते जा रहा था । मैं लचर प्रशासनिक व्यवस्था और पुलिसिया कार्यप्रणाली पर लगातार सोचता हुआ स्कूटी बढा़ए जा रहा था। अचानक एक बार फिर मेरी श्रीमती जी ने मुझे झिंझोडा़ और गाडी रोकने के लिए आवाज़ लगाई – अरे रोको .. रोको … स्कूटी रोको .. देख नहीं रहे हो पुलिस वाले छोटे छोटे बच्चों को पीट रहे हैं … मैंने कहा – अरे पीट रहे हैं तो पीटने दो .. ये तो उनका काम ही है.. करने दो… मग़र मेरी इतनी सी बात से श्रीमती जी कहाँ संतुष्ट होने वालीं थी आखिरकार हमने अपनी स्कूटी में ब्रेक लगा ही दिया ।
हम बीच में पड़ने वाले नाले की पुलिया के पास खडे़ थे। एक बार फिर .. सोशल डिस्टेंसिंग की ऐसी तैसी … इस बार सोशल डिस्टेंसिंग की बखिया उधेड़ रही थी तमाशबीन बनी मजमा लगाए खडी़ जनता । पुलिस के ठोल्ले लगातार छोकरों के पीटते जा रहे थे। फटे पुराने कपड़े पहने कचरा बीनने वाले या छोटामोटा काम कर गुजा़रा करने वाले बच्चे मालूम पड़ रहे थे। उनकी अकड़ और हर बात में जवाब देने की बात देखकर एक बात तो ठीक ठीक समझ आ रही थी कि लगता है इनको कानून – व्यवस्था और पुलिस प्रशासन का कोई खौफ़ नहीं … ठोल्ले भी मानों पीट पीट कर उनको थक गए थे … वो छोकरे जो भी बोलते वे चुपचाप सुने जा रहे थे … हाँ .. बीच बीच में उनके ऊपर बेल्ट ज़रूर बरसा देते थे । पब्लिक तमाशबीन बने दीदें फाड़ फाड़ कर उन्हें देख भी रही थी और उनकी बातों पर हँस भी रही थी। मेरा भी मन किया कि मैं भी निकम्मी और लचर प्रशासनिक व्यवस्था की बखिया उधेड़ती इन छोकरों की बात पर भरपूर तालियाँ बजाऊँ और अपने मन को थोड़ी राहत पहुँचाऊँ … पर मेरी उत्तेजना को देख श्रीमती जी की बन आई भावभंगिमा को देख मैने अपने आप पर कंट्रोल कर लिया ।
उन छोकरों में से एक जिसने तनिक ज्यादा पी रखी थी उसकी एक एक बात मुझे सौ टके सही लग रही थी …. भाड़ में जाओ तुम कमीनों …. तुम लोगों को खाली हम लोगन ही दिखाई देते हैं जो लोग पिकनिक स्पाॅट पर जाकर पार्टी करते हैं दारु शारू पीते हैं उनका क्या..? खुद शासन के आफिसर लोग जो बिना माॅस्क सेनेटाइजर के अपने अपने बँग्लों में बिंदास पार्टी मनाते हैं उनका क्या .. ? जो बडा़ बडा़ सेठ अपने दुकान में भीड़ लगा लगाकर सामान बेचता है और जो पुलिस वाला ऐक्शन लेने के बदले उससे पैसा खाता है उसका क्या.. ? जो कैफ़े लाला चुपके चुपके हुक्का गाँजा पिलाता है और जो बडा़ पैसावाला जंगल झाडी़ में खुलेआम जूआ का फड़ लगवाता है और जुआ खिलाता है उसका क्या … ? साला .. हम लोग पुलिया के नीचे थोड़ा खा पी लिया .. थोड़ा पब्जी वब्जी खेल लिया तो हमको डंडा मारता है… अबे तुम लोगों के अंदर में सही का दम है तो इन बडा़ बडा़ लोगों को पकडो़ … और हाँ जो जिंदाबाद मुर्दाबाद करके पूरा रास्ता जाम कर देता है न .. वो नेता लोगन के चम्मच लोगों को पकडो़ .. हमको फालतू में पकड़ता है… असली कोरोना तो वो ही लोग फैला रहा है… बड़बडा़ते बड़बडा़ते वह छोकरा बेहोश हो गया।
बहरहाल लगभग आधे घंटे तक चले इस ड्रामें को देखकर हम घर लौट आए । अपने चश्में महाराज को उतारकर उनके उचित स्थान पर रख दिया । फ्रेश होकर स्टडी टेबल के सामने बैठा हुआ मोबाइल पर लोकसदन की खबरे पढ़ रहा था कि बिटिया रानी चाय की प्याली लेकर पहुँची। मुझे विचारों में खोया हुआ देखकर पूछ बैठी – कुछ हो गया क्या बाजा़र में.. हमने श्रीमती जी को देखा और बिटिया से रुबरू होते हुए कह तो दिया नहीं परंतु मेरे कानों में बार बार ऊस नसीडे़ छोकरे की आवाज़ ही गूँज रही थी ….. तुम सब नियम और कानून हम गरीब और मजबूर लोगों पर थोप सकते हो … बडे़ बडे़ लोगों से बात करने में तुम लोगों की पतलून गीली हो जाती है …. अब हम लोग भी किसी पुलिस वुलिस से नहीं डरता है जो कानून ससुरा बडा़ बडा़ लोगन के घर झाड़ू – पोंछा लगाता है हम लोगन का क्या ही कर लेगा वो कानून साला …… ?

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