गाँधीवादी आदर्शों पर चलने वाले महान लेखक रोहरानंद (सुरेशचंद्र रोहरा) – विवेक सिन्हा

रोहरानंद
विवेक सिन्हा

इस बात पर प्राय: कम ही लोगों का ध्यान गया होगा कि संपादक-लेखक रोहरानंद न केवल गांधीवादी आदर्शों का प्रचार – प्रसार करते हैं बल्कि उनकी शिक्षाओं और आदर्शों को अपने जीवन में भी उतारते हैं। गांधीजी के बारे में एक बात कही जाती है कि अगर वे राष्ट्रवादी आंदोलन के अगुआ न होते तो इस शताब्दी के महानतम भारतीय संपादक होते। जिस तरह गाँधी जी को अपने छात्र जीवन से ही लिखने व ऐतिहासिक, साहित्यिक व अन्य विषयों से संबंधित पुस्तकें पढ़ने का चाव था उसी तरह रोहरा साहब भी अपने छात्र जीवन से ही विभिन्न मुद्दों पर पुस्तकें पढ़ने और लेखन की शुरुआत कर दी थी।
रोहरा साहब के लेखन का स्तर उनकी रचनाओं से मिलता है। समझ में नहीं आता कि यह लेखक पता नहीं कहां-कहां से शब्द ढूंढ कर लाता है और अपनी रचनाओं में पिरो देता है। आज के दौर में शायद ही कोई ऐसा लेखक हो जो अपने शब्दों को सीधे पाठक के दिल में उतार दे ।
रोहरानंद की रचनाएँ, उनकी लिखी पंक्तियां अपने आप में कुछ कहती है ! गांधी जी की तरह ही रोहरा जी का लेखन समाज के दलित, वंचित और पिछड़े समुदायों का प्रतिनिधित्व करता है।
रोहरानंद लिखते हैं – गरीबी के बारे में , विवशता के बारे में, क़ानून के बारे में , अधिकार के बारे में , जमीन – जायदाद के बारे में , भ्रष्ट अफसरों के बारे में और कोयला खदान के बारे में ! जी हाँ। कोयला भई न राख उनका धारावाहिक उपन्यास। यही तो विशेषता है रोहरा जी की लेखनी की ! जिस तरह से सुरेश चन्द्र रोहरा जी के धारावाहिक उपन्यास की चंद लाइनों में व्यापकता का अथाह सागर छुपा है उसी तरह साधारण सा दिखने वाला यह मुखमंडल अनंत गहराइयों एवं विराट व्यक्तित्व का स्वामी है! इनके कलम की कलाकारी का तो हर कोई कायल है लेकिन अगर आप इनकी रचनाओं में स्तंभ ‘रोहरानंद चन्दन घिस्से’ और ‘कोयला भई न राख’ पढने से वंचित रह गये तो समझ लीजिये आप इनके कलम की अदाकारी देखने से चूक गये ! इनकी संपादित मासिक ‘ गाँधीश्वर’ और सरस सलिल में नियमित रूप से आने वाले इनके राजनीतिक आलेख पाठकों का दिल जीत लेते हैं।

आज के फेसबुकिया और अन्य सोशल मीडिया के जमाने में जहाँ कुछ भारतीय लेखकों के लेखन स्तर को देखते हुए लेखन क्षेत्र में आने वाला भविष्य उज्जवल नहीं दिखता वहीँ रोहरा जी द्वारा लिखित और सर्वाधिक पसंद किया जानेवाला उपन्यास “कोयला भई न राख“ यह एहसास कराता है कि भारत में अभी रोहरा जी जैसे लेखक भी हैं जिन्होंने लेखन की गरिमा को बनाये रखा है।

रोहरा जी की खूबियों के बारे में मैं जितना भी लिखूं कम ही होगा ! वह एक महान गांधीवादी,महान संपादक, महान पत्रकार, महान लेखक और महान समाज सेवी भी हैं । इन्होंने संवाददाता के रूप में भी एक अलग पहचान बनाई है । नवोदित लेखकों को सही प्लेटफ़ॉर्म प्रदान करने का भी आपने जो बीड़ा उठाया है वह भी एक महान कार्य है । आपका धारावाहिक उपन्यास जो हमेशा से ही लोकसदन का श्रृंगार रहा है “कोयला भई न राख“ निश्चित रूप से कालजयी रचना है । वर्तमान दौर में जब लोगों में दिखावे की होड़ मची है तथा हर कोई विज्ञानं – तकनीक एवं विकास की बात करता है ऐसे समय में कोयलांचल क्षेत्र का स्याह पक्ष लोगों के सामने लाने का साहस जो आपने किया है वह निश्चित तौर पर काबिले तारीफ़ है ।आपकी अन्य रचनाएँ भी गाँधी के आदर्शों से ओत प्रोत है। आज के दौर में गाँधी जी के मूल्यों व आदर्शों का अनुसरण करने वाला व जन – जन में भी उन आदर्शों के पालन हेतु निरंतर प्रयास करने वाला शायद ही ऐसा कोई लेखक होगा। बस इतना ही कह सकता हूँ कि रोहरा जी ने अपनी लेखनी से आम लोगों को जागरूक करने का जो कार्य किया है वह काबिले तारीफ है। हम उनकी लंबी उम्र की कामना करते हैं ताकि समाज को लम्बे समय तक रोहरा जी का मार्गदर्शन मिलता रहे।
-“जन्म दिन के अवसर पर छत्तीसगढ़ के इस महान सपूत को बहुत – बहुत बधाई .”

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