
तिल्दा/ नेवरा/ पूरा देश कोरोना की भयावता से जूझ रहा है लोगों में भय का माहौल है और लगातार मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। आज तिल्दा नगर के खुशी अस्पताल का हाल देखे तो वहां पर भी स्टॉफ बिना मॉस्क लगाए काम कर रहे है तो सोशल डिस्टेंसिंग का तो कहीं भी पालन नहीं हो रहा है ।
खुशी हॉस्पिटल से निकलने वाला बायोमेट्रिक कचरा कोई उचित स्थान पर नहीं फेंका जा रहा है आज कचरा किसी भी रूप में हो, वह देश और दुनिया के लिये एक बहुत बड़ा पर्यावरणीय संकट बनता जा रहा है। हम जानते हैं कि हर शहर में कई निजी व सरकारी अस्पताल होते हैं, जिनसे प्रतिदिन सैकड़ों टन चिकित्सकीय कचरा निकलता है और यदि पूरे देश में इनकी संख्या की बात करें तो देश भर के अस्पतालों से निकलने वाला कचरा कई हजार टनों में होता है। उसी प्रकार खुशी हॉस्पिटल से निकलने वाला बायोमेट्रिक कचरा रैपर, कागज, रिर्पोट, एक्स-रे फिल्में और रसोई से निकलने वाला कूड़ा-कचरा आता है। यही नहीं, कुछ अन्य पदार्थ जैसे कि ग्लूकोज की बोतलें, सूइयाँ, दस्ताने आदि भी बायोमेडिकल कचरे में आते हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार तिल्दा नेवरा में प्रति महीने बायोमेट्रिक कचड़ा लेने रायपुर से टीम आती है परंतु खुशी हॉस्पिटल संचालक के द्वारा कचरा उन्हें ना देकर हॉस्पिटल के पीछे भूभाग में फेंक दिया जाता है व जलवा दिया जाता है इस भागम-भाग की जिंदगी में बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं, बीमारों की संख्या बढ़ रही है।
केंद्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के लिये बायोमेडिकल वेस्ट (प्रबंधन व संचालन) नियम, 1998 बनाया है। बायोमेडिकल वेस्ट अधिनियम 1998 के अनुसार निजी व सरकारी अस्पतालों को इस तरह के चिकित्सीय जैविक कचरे को खुले में या सड़कों पर नहीं फेंकना चाहिए। मीडिया कर्मियों के द्वारा खुसी हॉस्पिटल स्टाफ से बात करने पर हॉस्पिटल स्टाफ के द्वारा बोला गया कि आपको जो करना है कर लो हम तो यही अपना अपशिष्ट पदार्थ फेकेंगे और जल वायनगे सूत्रों ने बताया कि इस हॉस्पिटल में इस तरह की लापरवाही जनक घटनाएं आए दिन सामने आते रहते हैं।
जब स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोग इस प्रकार की लापरवाही करेंगे तो फिर आम जनता से नियम पालन की उम्मीद करना बेमानी होगा।







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