कहानी- “हम सब बेघर”

कालू कुत्ता अपने टोले का सरदार था। वह बुजुर्ग होने के साथ अनुभवी और सबके सुख-दुःख का सहकारी था। उसकी बिरादरी मे यदि कोई भी छोटी- बड़ी समस्या आ जाए तो वह उसका तुरन्त समाधान निकलता । धान की कटाई शुरू हो गई थी, ठंड आने मे अभी कुछ ही दिन बाकी थे।
धन्नू,मन्नू मोनू कुत्ते और झुनिया, मुनिया, रूबिया कुत्तिया भी कटाई के समय चहलपहल किए हुए थे।सब मिलकर योजना बना रहे थे।इस बार ठंड से कैसे बचा जाए।पहले की तरह पुआल के गठ्ठर भी अब घर-घर नहीं मिलते,जिससे की हम ठंड से बचाव कर लेते।समस्या गंभीर थी,सब अपना-अपना दिमाग लगाए बैठे थे।
तभी मुन्निया ने कहा-कालू दादा के पास चलते है,वही कुछ उपाय सुझाए।सब कालू दादा से मिलने के लिए चल दिए।
रविवार का दिन था।कालू कुत्ता आराम से धूप मे सो रहा था क्योंकि रात को अपने टोले मे चौकीदार करना होता था। जैसे ही आहट मिला उसने अपना सर ऊपर किया, देखा सामने धन्नू-मन्नू ,झुनिया, रुबिया सब खड़े है।एकाएक वह अपने शरीर को झकटते हुए खड़ा हो गया।आश्चर्य भरी नजरों से सबको देखने लगा,कही कोई बात तो नही हो गई,जो सबके सब यहाँ चले आए।
कुछ देर बाद वह सहसा बोल पड़ा-सब खैर तो है। धन्नू-मन्नू का मुहं देख रहा था ,बात कहाँ से शुरू की जाए।तभी रुबिया ने कहा-अब ठंड आने वाली है। कालू दादा ने कहा-हां!आने वाली तो है।धन्नू ने आगे आते हुए कहा-आपको पता है अगले जाड़े में मुनिया के सारे बच्चे ठंड से मर गये थे,अपने बच्चों के लिए हम कितना रोये थे।
कालू दादा ने कहा-उस मनहूस रात को कैसे भूल सकता हूं।
मुनिया ने कालूदादा से कहा-अगर ऐसा ही रहेगा तो हमारा वंश बढेगा कैसे? कालू दादा के चहरे पर मानो काले बादल छा गये हो जैसे।कुछ देर गंभीर रहने के बाद कालू दादा ने कहा-तुम सब धैर्य रखो,हम जल्द ही कोई समाधान निकालते है।
कालू रात को चौकेदारी करते समय सोचता रहा,कैसे इस समस्या से निकाल जाए, कोई चारा भी नजर नही आता।तभी लक्ष्मण सेठ बाहर निकला और कालू को आवाज देने लगा।कालू लक्ष्मण सेठ के पास जा पहुंचा।सेठ ने बचा भोजन कालू के सामने रख दिया।रात को चौकेदारी करने से उसे कुछ ना कुछ खाने को मिल जाया करता था।आवारा कुत्ते की तरह उसे इधर-उधर डंडे नही खाने पड़ते।वह अपने काम की मजदूरी लेता था,ऐसे ना मुफ्त का खाता था।सेठ लक्ष्मण उसे भोजन दे तो गया था,पर भोजन उसे रास नही आई।उसे तो अपने सगे-संबन्धियों और उनके बच्चों के परवरिश की चिंता हो रही थी,कैसे हमारी वंश परम्परा बढ़ने से पहले काल के गाल मे चली जा रही है।
सेठ लक्ष्मण सुबह बाहर निकलता है तो देखता क्या है, सारा भोजन ज्यों का त्यों पड़ा है।वह कालू के नजदीक गया और पुचकारते हुए ,उसका सर सहलाने लगा।पूछा-तूने!रात को भोजन क्यों नही किया?कालू अपनी लाचारी कैसे बताता वश दीनभाव से सेठ को देखता रहा।तभी दो-चार मजदूर पुआल से लदे बैलगाड़ी के साथ आए।सेठ लक्ष्मण गेहूं, धान के गल्लो का व्यापारी था।एक गाँव से दूसरे गाँव मे अनाजो को इकट्ठा करता और शहर मे ऊंचे दामो मे बेच देता।इस बार लक्ष्मण सेठ ने पुआल भी खरीदें थे,जिसको जरूरत हो उसके काम भी आ जाए और प्रकृति को प्रदूषण से बचाने के लिए इसका उपयोग जैविक खाद के रूप मे किया जा सके।
पुआल के गट्ठर लक्ष्मण सेठ के बागीचे मे रख दिए गये।कालू ने बागीचे मे पुआल के गट्ठर देखा तो उसके मन मे उम्मीद की किरण जाग गयी।सोचने लगा मेरी समस्या का समाधान तो मिल गया ,वश खरा उतरना बाकी है।रात हुआ कालू नित्य की तरह अपनी चौकेदारी मे लग गया।सेठ लक्ष्मण आज फिर उसे भोजन देकर चला गया,फिर वही हुआ जो कल हुआ था।।सेठ सुबह देखता है कि भोजन ज्यों का त्यों पड़ा है।वह असमंजस मे पड़ गया।आखिर कालू दो-चार दिन से खा क्यों नहीं रहा है?ढ़ूंढते-ढ़ूंढते वह बागीचे मे पहुंचा,देखा तो कालू पुआल के आस-पास मंडरा रहा था।उसे कुछ समझ में नहीं आया,कालू ऐसा कर क्यों रहा?इसे क्या जरूरत है पुआल की।खाने -पीने के अलावा ठंड से बचने के लिए इसके पास अलाव भी तो जलता है।सेठ अभी सोच -विचार कर ही रहा था कि कालू अपने मुंह से पुआल को खिंचने लगा।उसको ऐसा करते देख सेठ को आश्चर्य हुआ, पर सेठ को समझने मे देर नहीं हुआ।हो ना हो कालू को पुआल की जरूरत तभी वह ऐसा कर रहा है।
सेठ ने कालू से कहा-तुझे पुआल चाहिए क्या?कालू ने सर को हिला दिया।सेठ ने चार-पांच पुआल के गट्ठर सामने रख वहां से चला गया।कालू ने धन्नू, मन्नू,मोनू,रुविया,धनिया, मुनिया सबको बुलाकर पुआल का बंटवारा कर दिया।सबने अपने रहने की व्यवस्था बना ली।झुनिया ने छः बच्चों को जन्म दिया।सबने मिलकर खुशियां मनाई।झुनिया जहां रहती थी,उससे कुछ ही दूर पर गोपाल ग्वालवाला का घर था।वही से उसे कुछ खाने-पीने को मिल जाया करता था।गोपाल जितना ही दयालु था उसकी पत्नी मैना उतनी ही कठोर।क्या मजाल उसके मुंडेर पर कोई कौआ बैठ जाए।दिन पर बड़बड़ाते रहती है। गोपाल जैसे ही कुछ खाने को झुनिया के सामने रखता ,मैना डंडा ले कर दौड़ पड़ती।बड़बड़ाते हुए कहती-आदमी को खाने को जहर नही मिल रहा ,इन महारानी को रोज दूध -दही खिलाया जा रहा है।अब मैं मुफ्त का खाने ना दूंगी।मैना सारा पुआल उठा लाई।झुनिया डबडबाई आंखों से अपने बच्चों को छाती से लगाकर सबकुछ देखती रह गयी।अन्त मे यही कहा- हम फिर से बेघर हो गए।

ज्योति सिंह (देवरिया) उत्तर प्रदेश

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