हरे भरे जंगलों से गुजरती रेलगाड़ी,
हमारे शहर के अतीत का दर्पण है।
एहसास कराती है यह हरियाली ,
अंतर हरे-भरे वन और काॅन्क्रीट के वन का ।
निस्तब्ध खड़े ये पेड़ , नहीं मांगते कोई हिसाब ,
पर समय आने पर दिखाते हैं प्रलय का रूप ।
अपनी जगह दृढ़ता से खड़े ये पेड़
इतरा सकते हैं अपने अहम पर ,
लेकिन पूछते हैं ये वृक्ष ,
मेरे शहर में हरीतिमा का हाल ।
मैं मौन हूं,भला क्या कह सकता हूं
शहर के पेड़ हैं बड़े अभागे
जो लगातार कतर दिए जाते हैं
बिजली के खंभों को बचाने में ।
लगातार आगे बढ़ती रेलगाड़ी
पीछे छोड़ रही है हरे भरे वन को ,
जैसे हम मानव छोड़ चुके हैं ,
काॅन्क्रीट के जंगल बनाने में ।
एक साथ कई बहुमंजिली इमारतें,
प्रवेश में गंदगी से सनी झुग्गियां
और विचित्र गंदे पानी की बदबू ,
आहट है….. एक और बड़े जंगल का !
यह है रंगीन काॅन्क्रीट का जंगल ।

जय प्रकाश झा
विशाखापट्टनम
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