कब तक बंद रखेंगे घर के दरवाजे ?


ये किसी गजल का मिसरा नहीं है,ये एक सवाल है .सवाल सरकार से है,कि क्या उसके पास महामारी कोरोना -19 की वजह से ‘लाकडाउन’ जैसे इलाज का कोई और विकल्प है भी या नहीं ? देश की सरकार कोरोना के खात्मे को लेकर आजतक अपनी कटिबद्धता प्रमाणित नहीं करा सकी है. मध्यप्रदेश की सरकार बिना किसी ख़ास फार्मूले के प्रदेश में ‘ किल कोरोना ‘ अभियान चला रही है .कोरोना से न मौतें रुक रहीं हैं और न संक्रमण .कोरोना के आंकड़े पहले दिन से भारमक स्थितियां निर्मित कर रहे हैं
कोरोना से जूझते हुए देश को 15 माह हो चुके हैं .इन पंद्रह महीने में दूसरे देश कोरोना के साथ लड़ते-लड़ते कहाँ से कहाँ तक पहुँच गए हैं और एक हम हैं जो अब तक न टीकाकरण की पुख्ता व्यवस्था कर पाए हैं और न ही जनता को आश्वस्त कर पा रहे हैं कि आने वाले दिनों में कोरोना को किल करने में हमें कामयाबी मिल ही जाएगी ?अब ये कोई शिकायत नहीं रह गयी है कि हमारी केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारें भी कोरोना का मुकाबला करने में नाकाम रहीं हैं.इस नाकामी को बलायेताक रखते हुए अब सीधा सा सवाल ये है कि -‘ क्या सरकार अपनी पूरी आबादी को निशुल्क टीके लगवा सकेगी या नहीं ?सवाल ये भी है कि क्या सरकार की नाकामियों के चलते निजी क्षेत्र में मुनाफ़ा वसूली के लिए टीके उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है ?यदि नहीं तो फिर हकीकत क्या है ?
मै और मेरे जैसे हजारों लोग इस समय विदेश में हैं हुए स्वदेश वापस लौटना चाहते हैं लेकिन हमारे प्रियजन हमसे कह रहे हैं कि -‘ हमें अपनी यात्रा फ़िलहाल मुल्तबी कर देना चाहिए क्योंकि भारत में स्थितियां नाजुक हैं और सरकार की और से इस मामले में हकीकत छुपाई जा रही है.आंकड़े जुटाना सरकार का काम है,सो सरकार जब चाहती है तब जांच बढ़ा देती है और जब चाहे जांच को घटा देती है .यदि इन आंकड़ों से कॉरनॉना आपके साथ धोखा कर जाये तो कहा नहीं जा सकता .सरकार की नाकामी को छिपाने के लिए दुनिया के तमाम देशों कीआबादी की सूची आभासी दुनिया में प्रसारित हो रही है ताकि आप समझ सकें कि सरकार सचमुच कितना महत्वपूर्ण काम कर रही है ?
भारत पिछले पंद्रह महीनों में 325998 लोग कोरोना की वजह से पीड़ित हुए और 27893472 मारे जा चुके हैं .आज भी 174041 लोग संक्रमित निकले हैं ,आज ही 3614 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं .ये सभी सरकारी आंकड़े हैं .अशासकीय आंकड़ों का न कोई पुख्ता संकलन हुआ है और न प्रमाणीकरण .जैसे-जैसे अवधि बीतती जी रही है.लोगों का अविश्वास बढ़ता जा रहा है.सरकार के सामने दोहरी चुनौती है .दवा-दारू के इंतजाम सरकार को .करना ही है और अपनी विश्वस्नीयता भी प्रमाणित करना है .
देश का दुर्भाग्य है कि इस समय देश का मुखिया तो समर्थ है लेकिन उसका चरित्र मुंह के समान नहीं है जो की खान पान में एक जैसा हो,सबका पालन-पोषण करने में एक जैसा व्यवहार करने वाला हो .केंद्र सरकार की तो छोड़िये हमारे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री राज्य सरकारों के साथ सौहार्दपूर्ण रिश्ते कायम करने में नाकाम रहे हैं. सत्ता में भाजपा का ये सातवां साल है फिर भी जनता में सरकार को लेकर जो विश्वास का संकट है वो दुर्भाग्यपूर्ण है .जो दिल्ली की चाकरी नहीं करता उसके साथ उपेक्षापूर्ण या सौतेला व्यवहार किया जा रहा है .बजट के मामले में ही नहीं अपितु दवा-दारू,खाद्यान्न और राहत के आवंटन के मामले में भी..
देश के जिन राज्यों में डबल इंजिन की सरकारें नहीं हैं वहां हर तरह का संकट है. सरकार जनता की सोचती ही नहीं उसे नेताओं की ही फ़िक्र नहीं है. जो मुख्यमंत्री दिल्ली दरबार में कदमबोशी नहीं करते उनकी और देखा ही नहीं जाता. बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी जैसे स्वाभिमानी मुख्यमंत्री कम ही दिखाई देते हैं ,ऐसा मुख्यमंत्री शायद है ही नहीं जो प्रधानमंत्री जी की आँख में आँख डालकर बातचीत कर सके .प्रधानमंत्री का सम्मान करना एक निजी मामला हो सकता है ,इसे राजकाज से नहीं जोड़ा जाना चाहिए .
कुलजमा बात ये है कि कोरोना अभी न जा रहा है और न उसे कोई किल कर पा रहा है.कोरोना हमारे बीच है,हमारे साथ है हमें ही उससे बचाकर रहना है .सरकार हमारी मदद एक सीमा से आगे नहीं कर सकती आपको कोरोना की वैक्सीन से लेकर अस्पताल,दवा,दारू का इंतजाम खुद करना पडेगा .स्वयंसेवी संगठन या सोनू सूद जैसे गिने-चुने लोग भी आपकी सीमित मदद ही कर सकते हैं .देश बड़ा है,आबादी बड़ी है,मुसीबत बड़ी है और संसाधन जुटाना भी आसमान से तारे तोड़ने जैसा है ,लेकिन यदि हमें जीना है तो जीने के लिए तैयार भी रहना होगा .
कोरोना से लड़ने के लिए हमें अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को समृद्ध करने के साथ ही दवा-दारू का इंतजाम करना ही होगा .कोई जादू,टोना,की चमत्कार हमारी मदद नहीं कर सकता .लाकडाउन तो इस समस्या का स्थाई समाधान है ही नहीं ,आखिर कब तक हम मौत के भी से अपने घर के दरवाजे,बाजार,आवागमन के साधन बंद करके बैठे रह सकते हैं ? किसान घर बैठेगा तो अन्न का संकट पैदा हो जायेगा,मजदूर घर बैठेगा यो विकास की रफ्तार रुक जाएगी ,भुखमरी बढ़ेगी ,ऐसे में हमें सब कुछ सरकार पर नहीं छोड़ देना चाहिए ,खुद भी अपनी भूमिका सुनिश्चित करना चाहिए .
कोरोना से जैसे आप लाकडाउन के जरिये नहीं निबट सकते, वैसे ही नाक और मुंह ढंककर जिंदगी नहीं जी सकती.प्रकृति से मिलने वाली आक्सीजन मुंह ढकने की वजह से पूरी नहीं मिल पाती ऐसे में यदि अस्पताल जाने की नौबत आ जाएगीऔर अस्पतालों के पास आक्सीजन हो ही इसकी कोई गारंटी नहीं है ,यानि हमारे पास इस महामारी से निबटने के पारम्परिक साधनों के अलावा एक वैल्पिक इंतजाम तो हमें करना ही पडेगा .मुझे लगता है की जब तक सरकार पूरे देश में राष्ट्रीय चरित्र को राष्ट्रवादी लेकिन भक्तिभाव से मुक्त नहीं किया जाएगा तब तक देश को कोरोना से लड़ने के लिए तैयार नहीं कहा जा सकता .हमें अपनी नाकामियों के ‘ साइड इफेक्ट ‘ भी देखकर सरकार को आगाह करना होगा .सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकती .उसे भागना भी नहीं चाहिए .रहीम दास भी कह गए हैं की-
‘रहिमन विपदा हूँ भली,जो थोड़े दिन होय ,

@ राकेश अचल

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