
कोरबा। अंचल के लोकप्रिय विद्वान, अन्यतम बौद्धिक ल. न. कड़वे जी को शहर के आम और खास लोगों ने आत्मीयता से स्मरण किया वह भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। 22 मई की रात श्री ल न कड़वे जी का लंबी बीमारी के पश्चात देहावसान हो गया। जैसे ही यह खबर शहर में वायरल हुई लोग स्तब्ध रह गए क्योंकि कड़वे जी जन जन के प्रेरणा स्रोत थे सर का सपोर्ट एक अथवा आम आदमी नहीं जो उन्हें न जानता हो। हमने अंचल के कुछ महत्वपूर्ण लोगों से कड़वे जी के व्यक्तित्व के बारे में बातचीत की जो यहां संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत है-
छेदीलाल अग्रवाल, संपादक मितान, ने स्वर्गीय कड़वे जी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि श्री कड़वे एक श्रमिक नेता थे और श्रमिकों के हित के लिए उनके समस्याओं के लिए वे सतत लड़ते रहे, यही नहीं उन्होंने इसी तारतम्य में अपनी विद्युत मंडल की नौकरी भी खोयी। बाद में श्री कड़वे सामाजिक सेवा के क्षेत्र में आ गए मैंने उन्हें उनकी दिनचर्या को नजदीक से देखा वह हमेशा पैदल चलते हुए ही दिखाई देते थे सुबह घर से निकलते लोगों से मिलते बातचीत करते उनके दुख दर्द को महसूस करते और देर शाम को वापस घर पहुंचते थे। श्री कड़वे एक विचारक थे उनका अध्ययन हर क्षेत्र में था। एक समय में वे कोरबा अंचल के सिरमौर बन गए थे हर एक सभा सोसाइटी में उनका स्थान सुरक्षित रहता था मैं उन्हें शत-शत नमन करता हूं।
एमडी मखीजा, पूर्व अध्यक्ष सिंधी साहित्य अकादमी,
अंचल के लोकप्रिय समाजसेवी मुरलीधर मखीजा से कड़वे जी के संदर्भ में चर्चा की तो उन्होंने अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि कड़वे जी सच्चाई के लिए लड़ते थे प्रवेश जी हक के लिए लड़ाई लड़ते थे और हमेशा एक साहस और हिम्मत के साथ लड़ते रहे वे आजीवन पैदल और नंगे पाव चला करते थे। उन्होंने कभी किसी के आगे मदद के लिए हाथ नहीं फैलाया । वे एक आत्म अभिमानी शख्सियत के स्वामी थे माखीजा जी कहते हैं कि कड़वे जी समाज, जातिवाद, धर्मवाद, हिंदू-मुस्लिम से और सभी की मदद के लिए आगे आते थे।
राम सिंह अग्रवाल, अध्यक्ष चैंबर ऑफ कॉमर्स
हमने जब कड़वे जी की संदर्भ में श्री राम सिंह अग्रवाल से संवाद किया तो उन्होंने बताया कि लगभग 35 वर्ष पूर्व हमने कोरबा कल्याण समिति बनाई थी। जिसका उद्देश्य था कोरबा जिला बने, कोरबा दर्री मार्ग में जो टोल प्लाजा है वह हट जाए फर्टिलाइजर का निर्माण हो, कोरबा चांपा रोड निर्माण अच्छे से हो इन मुद्दों को लेकर के संस्था संघर्ष कर रही थी। इसी दरमियान श्री कड़वे जी का आगमन संस्था में हुआ और उन्होंने माइक ले कर जब अपनी बात शुरू की तो भीड़ इकट्ठी हो गई तब मैंने जाना कि कड़वे जी का व्यक्तित्व कितना संघर्ष कारी है। बाद में मेरे संबंध से बहुत मधुर हो गए और मैंने कड़वे जी की दो पुस्तकें भी प्रकाशित कराई थी। वे मेरे लायंस क्लब के चुनाव में भी भागीदारी लेकर मार्गदर्शन देते रहते थे। उनके जैसा कोरबा में न कोई हुआ है और न ही होगा।
रमेश शर्मा ,गायक
लोकप्रिय गायक रमेश शर्मा कुमार के नाम से अंचल में जाना जाता है और महान पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के स्वर के पर्याय माने जाते हैं उन्होंने स्वर्गीय कड़वे को याद करते हुए कहा कि गीतांजलि भवन में लगभग 30 वर्ष पूर्व एक कार्यक्रम उन्होंने उनका आयोजित किया था जिसमें मुझे श्री कड़वे जी ने मंच दिया था जिसमें शहर की गणमान्य विभूतियों उपस्थित थी। इसके बाद मेरा कड़वे जी के साथ आत्मीय संबंध बनता चला गया और जब भी मैं उनसे मिलता उनका पित्र व स्नेह मुझे मिलता रहा मुझसे अक्सर वे कहा करते थे मुझे एक गीत सुनाओ हरिश्चंद्र तारामति फिल्म का गीत -“जगत भर की रोशनी के लिए करो कि जिंदगी के लिए सूरज रे जलते रहना चलते रहना”
कड़वे जी एक नेता थे और मजदूरों के लिए उन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी एक समय में मध्य प्रदेश विद्युत मंडल जब वे वहां कार्यरत थे तब श्रमिकों के लिए कई आंदोलन किए परिणाम स्वरूप उन्हें विद्युत मंडल से बर्खास्त कर दिया गया मगर उन्होंने अपनी लड़ाई जारी रखी।
ऐसे ही सन 77 में जब आपातकाल लगा तो उन्होंने इंदिरा गांधी के शासन के खिलाफ जेल जाना पसंद किया।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वह सच्चाई के लिए लड़ते थे हक की लड़ाई लड़ते थे और हमेशा पक्के इरादों के साथ हिम्मत से अपनी आवाज बुलंद करते जाते थे चरेवेति चरेवेति सिद्धांत के तहत पैदल चला करते थे और पैरों में चप्पल भी नहीं पहना सकते थे…. यह उनकी अपनी विशेज्ञता थी जो उन्हें सबसे अलग और विलक्षण बनाती थी। विद्युत मंडल से बर्खास्त होने के पश्चात जब फाके के दिन थे गरीबी के दिन थे उन्होंने कभी भी हाथ नहीं फैलाया किसी से मदद नहीं मांगी आत्मसम्मान उनके लिए सर्वोपरि था अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में कभी भी चर्चा करना पसंद नहीं करते थे।
सच्चे अर्थों में एक विचारक थे उनका अपना एक गहन अध्ययन था अंग्रेजी हिंदी के साथ अन्य भाषाओं पर भी उनका अपना एकाधिकार था वे सदा अध्यनरत रहा करते थे और देश दुनिया के हालात से हमेशा वाकिफ रहते थे। यही कारण है कि प्रारंभिक दिनों में जब वे मंच पर आया करते थे तो उनकी विद्वता के आतंक से सभी वक्ता बौने हो जाते थे। अक्सर कठोर शब्दों का प्रयोग करते थे जो लोगों को नागवार गुजरता था मगर जो कहते थे वह सच हुआ करता था। वह हमेशा अपने भाषण में सच की अग्नि उगला करते थे। हां यह भी सच है कि धीरे धीरे उम्र के साथ उन्होंने नम्रता के साथ अपनी बात कहने शुरू की थी। मगर जब सच को कोई झूठ लाया करता तो क्रोधित हो जाया करते। उनका आकलन एक महान पत्र लेखक के रूप में भी समय को करना होगा उनकी अपनी एक सुंदर राइटिंग के कारण और जवाब देने की तत्परता के कारण उनके हजारों पत्र लोगों के पास एक धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं जिनका प्रकाशन होना चाहिए जिससे उनके व्यक्तित्व और उनके ज्ञान की समझ का लोगों को पता चल सकता है। यह भी सच है कि वह एक समय में प्रतिदिन अनेक लोगों को पत्र लिखा करते थे और आए हुए पशुओं का जवाब भी पोस्ट कार्ड के माध्यम से दिया करते थे मेरे पास भी उनके अनेक पोस्टकार्ड सुंदर राइटिंग के रखे हुए हैं। राष्ट्रवादी विचारधारा के महानायक संभवामि आश्रम के प्रणेता रचनात्मकता के पुरोधा एक ऐसे स्नेहिल वाणी के अमर नायक को हमारा बारंबार नमन।








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