
कुछ सच्चाईयां सिर्फ सर पर चढ़कर ही नहीं बोलतीं, स्थायी रूप से सर पर सवार भी हो जाती हैं। जितना उन्हें झटकार कर अलग करने की कोशिश की जाती है, इनकी पकड़ उतनी ही मजबूत होती जाती है। विज्ञान की नई-नई खोजों के लिए हर साल दिए जाने वाले नोबल अवार्ड ऐसे ही सम्मान हैं। नोबल सम्मानों के दृढ पूर्वाग्रहों के बारे में किसी को भी, किसी भी तरह का भ्रम या मुगालता नहीं है। इसके आलोचक, यहां तक कि प्रशंसक भी, जानते हैं कि नोबल के नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कार खासतौर से शान्ति, साहित्य और अर्थशास्त्र के सम्मान सामान्यतः राजनीतिक आधार पर तय होते हैं। इस राजनीति का आधार मूलतः कम्युनिस्ट विरोध रहा है। इन दिनों इसका दायरा थोड़ा और व्यापक हो गया है। अब इसमें टीना (अब कोई विकल्प नहीं है) कारक भी जुड़ गया है : मतलब जो कार्पोरेटी वैश्वीकरण के विकल्प की तनिक भी संभावना की तरफ इशारा करते हों, उनको इन तीनो में से कोई नोबल पुरस्कार नहीं देना है। ज्यां पॉल सार्त्र और ली डक थो नोबल चयन समिति के पाखण्ड और पक्षधरता को उजागर करते हुए इसे लेने से इंकार भी कर चुके हैं। मगर नोबल वाले कुलीन अपनी इस इग्नोबल (नीच) हरकत से आज तक बाज नहीं आये।
मगर जब विज्ञान के नोबल सम्मानों का सवाल आता है, तो इसमें चुनिंदा होने की गुंजाइशें कम होने के चलते उनकी मजबूरी हो जाती है। नतीजा यह निकलता है कि 1901 से, जब से नोबल पुरूस्कार शुरू हुए हैं, तब से विज्ञान के सारे नोबल (फिजिक्स में 186, कैमिस्ट्री में 216, चिकित्सा में 222 — कुल जमा 624) घोषित करते हुए अपरोक्ष रूप में रॉयल स्वीडिश अकादमी ऑफ़ साईंसेज का एलान होता है कि “इस साल के विज्ञान का नोबल जाता है सिटीज़न कार्ल मार्क्स और सिटीज़न फ्रेडरिक ऐंगेल्स को!!” (मार्क्स और एंगेल्स के जमाने में आपस में संबोधन के लिए आज की तरह कॉमरेड या साथी की जगह सिटीज़न – नागरिक – का संबोधन इस्तेमाल में लाया जाता था।)
क्या सचमुच? हाथ कंगन को आरसी क्या!! … चलिए 2020 के विज्ञान के तीनो नोबल देख लेते हैं।
भौतिक विज्ञान -फिजिक्स- में इस बार इसे रॉजर पेनरोज, सुश्री एंड्रिया हेज़ तथा जर्मनी के रेनहार्ड गेन्ज़ेल को इस बात के लिए दिया गया है कि उन्होंने मिलकर आकाशगंगा के ठीक बीचों बीच एक ऐसे विराट वजनी अनोखे ब्लैकहोल की खोज की, जो सारे ग्रहो-उपग्रहों-सितारों की गति और स्थिति दोनों को नियंत्रित करता है।
ब्रह्माण्ड और इस प्रकार जीवन के अस्तित्व की पहेली को हल करने की दिशा में ब्लैक होल एक विस्मयकारी वैज्ञानिक खोज थी। यूं इसकी भविष्यवाणी अल्बर्ट आईन्स्टीन ने अपनी जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी के साथ 1916 में ही कर दी थी – मगर पहले ब्लैकहोल को 1971 में ही “खोजा” जा सका था। इसकी सबसे सुव्यवस्थित व्याख्या स्टीफन हॉकिंग ने की थी और अपने काव्यात्मक अंदाज में उन्होंने कहा था कि “अगर हमें इन सवालों का जवाब मिल गया, तो हम ईश्वर के दिमाग़ को समझ पाएंगे।” (थ्यौरी ऑफ़ एवरीथिंग)
संक्षेप में कहें तो सितारों, ग्रहों की एक उम्र होती है। उसके बाद वे सिकुड़ते हुए एक ऐसे पिण्ड में बदल जाते हैं, जहाँ बस गुरुत्वाकर्षण और अन्धकार है और उसके बाद कुछ – फकत कुछ – अरब-ख़रब वर्षों के बाद यह ब्लैकहोल फूटता है और फैलने लगता है, नए-नए ग्रह और सितारे बनाते हुए आखिर में फिर एक बार ब्लैक होल में बदल जाने के लिए।
इसने एक बार फिर सृष्टि के निर्माण की गुत्थी सुलझाई, इसके निर्माण और संचालन की जबरिया जिम्मेदारी से गॉड, भगवानों और खुदाओं को आजाद कर दिया और एक बार फिर मार्क्स की कही बात कि “पदार्थ मूल है बाकी सब पदार्थ के अलग अलग रूप हैं, कि यह पदार्थ हमेशा गतिमान है और इसकी गति के अपने नियम है।” को प्रमाणित कर दिया।
रसायन विज्ञान (कैमिस्ट्री) में 2020 का नोबल सम्मान एक ही खोज के लिए दो महिला वैज्ञानिकों इमैनुएल कारपेंतिए (अमरीका) और जेनिफर डौडना (मूलतः फ्रांसीसी) को प्रदान किया गया। रूपक में कहे तो इन दोनों ने एक कमाल की छोटी कैंची खोजी हैं — शरीर के सबसे छोटे, किन्तु सबसे निर्णायक कण डीएनए में मौजूद ज़ीनोम की काट-छांट कर उसे सही तरीके से बदलने वाली कैंची।
गहरी डुबकी लगाने की बजाय सतह पर ही तैरें, तो यह कि हम जो होते, दीखते और करते हैं उनका काफी हिस्सा ये छोटे-छोटे जीन तय करते हैं। इनका निर्धारण कोई सृष्टा, रचयिता या ऊपर वाला नहीं करता। ये हमें माँ-पिता से 23-23 जीन से बने गुणसूत्र वाले जोड़े में मिले होते हैं। औसतन मनुष्यों में, प्रत्येक गुणसूत्र (क्रोमोसोम) में लगभग तेरह करोड़ जोड़े होते हैं और पूरे जीनोम में लगभग तीन सौ करोड़ जोड़े पाये जाते हैं।
जीन वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि एक बार मानव जाति के समस्त जीनों की संरचना का पता लग जाये, तो मनुष्य की जीन-कुण्डली के आधार पर, उसके जीवन की समस्त जैविक घटनाओं और दैहिक लक्षणों की भविष्यवाणी करना संभव हो जायेगा और समस्याग्रस्त हिस्से का पता लगाकर यदि ढंग से एडिटिंग कर दी जाए, तो आनुवंशिक बीमारियां थामी जा सकती हैं, कैंसर को हराया जा सकता है और क्या पता कि एक दिन जरा-व्याधि के साथ आयु के असर और देह के क्षरण को भी थाम लिया जाए। कारपेंतिए और जेनिफर ने इस सम्पादन की कैंची खोजी है।
डार्विन अपनी कालजयी खोज मार्क्स के जीवन काल में ही कर चुके थे। यह ताज़ी खोज भी प्रकृति के साथ संघर्ष करते हुए क्रमबद्ध परिवर्तनों का हासिल योग है, जो उत्तरोत्तर विकसित होती जाती है और यह भी कि विज्ञान इसके नियमों को जानकर जरूरी सुधार कर सकता है। चिकित्सा विज्ञान में हेपेटाइटिस-सी के वायरस की खोज के लिए मिला नोबल भी इसी तरह का विस्तार है।
विज्ञान मनुष्य की मेधा और कौशल की उपज है, इसलिए पूरे मनुष्य समाज की सम्पदा है। मगर यह खोज अंततः तकनीक का रूप लेकर इस्तेमाल के लायक बनती है और वर्ग-विभाजित समाज में तकनीक अक्ल के अन्धों और गाँठ के भरपूरों के कब्जे में होती है। वे इसका उपयोग कम, दुरुपयोग ज्यादा करते हैं। मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाने की बजाय अपनी कमाई – छप्परफाड़ मुनाफे – के लिए करते हैं। जैसे किडनी ट्रांसप्लांटेशन की विधा मनुष्य जीवन को बचाने की दिशा में बड़ा कदम थी — कुछ किडनी चोरों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया। पिछले दशक में आई जीएम क्रॉप (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलें भी इसी खतरे की अभिव्यक्ति थी। ठीक यही बात तो कह गए थे मार्क्स और एंगेल्स वर्गीय समाज में विज्ञान की उपलब्धियों के अपहरण के बारे में।
2020 के विज्ञान के नोबल प्रफुल्लित और गर्वित होने का अवसर देने के साथ ही एक बार फिर उस बात को मुखरता से दोहराते है, जिसे कुछ साल पहले फिदेल कास्त्रो ने दर्ज करते हुए कहा था कि “दुनिया की वैज्ञानिक खोजें उत्पादक शक्तियों का इतना तीव्र विकास कर चुकी है कि पृथ्वी पर हरेक का पेट भरा जा सकता है, हरेक को स्वस्थ रखा जा सकता है, लगभग हरेक बीमारी को हराया जा सकता है (फिदेल के क्यूबा में पोलियो को भी ठीक कर लिया गया था), हरेक को घर दिया जा सकता है। उत्पादन क्षमता इतनी है कि मात्र 5 वर्षों में हरेक घर के आगे एक चार पहिया वाहन खड़ा किया जा सकता है। मगर … और इस मगर का नाम है पूँजीवाद, जिसे खत्म किये बिना विज्ञान का लाभ मानवता को नहीं मिल सकता !!”
अब समाज को बदलने का काम भी वैज्ञानिक ही करेंगे, यह अपेक्षा करना अव्यवहारिक होगा। इसे किसे और कैसे करना है, यह भी विश्व नागरिक मार्क्स और एंगेल्स सविस्तार बताकर गए हैं।

(डिस्क्लेमर : लेखक किसान-मजदूर आंदोलन के मैदानी कार्यकर्ता है। विज्ञान के साथ उनका संबंध स्कूल और कालेज की पढ़ाई में विज्ञान के छात्र के रूप में जितना हो सकता था, उतना ही रहा है।)






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