कांच की लुगदी लगे
पतंग के मांझे को पैरों में उलझाए
खून से लथपथ
पंखों को फड़फड़ाते
उल्टे लटके कबूतर को
बंधन मुक्त कर लेकर हाथों में
प्रेम से सिर सहलाते समय
मैं सिद्धार्थ होता हूं

घूमते हुए बाग में
हर पौधे से बतियाते हुए
जानते हुए हर फूल की कुशलता
खरपतवार निकाल नए पौधे रोपकर
जड़ों में पानी देने पर
अंकुरों का आभारी हो सिर नवाते वक्त
मैं वनमाली होता हूं
मेरे घर के सिलबट्टे पर
सारे घर में खुशबू फैलाता
गरम मसाला पीस
देसी मुर्गा पका कर
गाढ़े नारियल के दूध का तड़का लगा
नारियल भात पकाते समय
मैं नल महाराज होता हूँ
इधर अंधेरा हुआ नहीं
उधर रात रानी की लताएं
फूलों की आंखें खोले
नशीले सुगंध पाश को
ऊपर डालने पर
मेरे शयनागार के खिड़की पर से
जाता हुआ चंद्रमा उफ कह
फूंक मारने पर भी
देर तक कमरे की बत्ती न बुझाने वाली
अर्धांगिनी को देख मैं
सरस शृंगारी होता हूं
दिन भर काम से थक कर
बच्चे का रुदन भी ना सुन पाने की
गहरी नींद में लिप्त पत्नी को देख
बच्चे की करवट बदल कर
मुंह में स्तन देते समय
मैं मां होता हूं
एकाकी रहूं या समूह में
जागता रहूं या नींद में भी
जब कविता मेरी झीनी उंगली पकड़कर
मुझे चलाती है
मैं कवि होता हूं






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