कलियां खिलीं हों बाग़ में रंगे बहार दे
खुशबू उड़ेगी हर तरफ ऐसी खुमार दे
जोशे जुनून अब मेरा हद पार हो गया
पैनी नज़र दे और… कलम धारदार दे
बरसेगी घटा खुल के कहे मेघ घनेरे
कागद का तेरे तन से ये पैरहन उतार दे
मिट्टी का बदन ले के भला तू चलेगा क्या
फौलाद से बदन को तू ऊँचा मेयार दे
तन्हाईयों में चीख के बोले है ख़मोशी
सूखें हैं मेरे ज़ख्म नये कुछ उधार दे
भूखा रहे न अब कोई भारत में मेरी जान
डिग्री है जिनके पास उन्हें रोज़गार दे
विशाखापत्तनम
काँधा मिला न अब तलक़ रोने को ज़िन्दगी
हँस कर करूँ मैं बात कोई ऐसा यार दे
शुहरत की सिढ़ियां मैं चढूँ मीर दाग़ सी
मग़रूर हूँ अग़र तो मुझे….. तू उतार दे
आशिक़ मिज़ाज दिल की रहे शान तभी तक
जो रंज की घड़ी भी ……खुशी से गुज़ार दे

भारती शर्मा






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