इन थके हुए निढाल दिनों को
सोने दो
चलो लौट आए मुसाफिर से सुनते हैं
दास्तां
राह के पेच ओ खम की
चलो आज रात चाँद को देखते हैं
सितारों से आगे जहाँ ढूँढ़ते हैं
किसी कमजोर बीमार बुज़ुर्ग की
तन्हाई से बात करते हैँ
बच्चों को सुनाते हैं बातें पुरानी
मिट्टी का घर मिट्टी की हांडी और मिट्टी के खिलौने
गर्द आलूद जूतों की सोंधी महक
से भर उठा है घर आंगन
चलो आगोश में भर लाते है तमाम रिश्ते
और इत्मीनान से सुनते है सारे गिले- शिकवे
खामोश वक़्त से पूछते है गुजर जाने की हक़ीक़त
चलो सफर से पहले
बांध लेते हैं अनमोल लम्हों की पोटली
गुना -भाग में शायद
भूल गए थे जोड़ना खुद को
चलो बचे हुए हिस्सो से पूरा करते हैं हिसाब
चलो फुर्सत से खोलते हैं किताब
हर्फ़ दर हर्फ़ फिर जीते हैं ज़िन्दगी—–

असलम हसन






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