आपात स्थिति में पहुंचने लगी वायु प्रदूषण की समस्या!

देश की राजधानी दिल्ली में हम लोग सांस भी नहीं ले सकते हैं। शहर की हवा में प्रदूषक तत्वों की मात्रा हद से ज्यादा विषाक्तता तक पहुंच चुकी है और यह जन स्वास्थ्य के लिए आपात स्थिति की तरह है। प्रत्येक साल की तरह इस साल भी साथियों अक्टूबर के अंत और नवंबर के आरंभ में देश की राजधानी दिल्ली के साथ ही अन्य शहरों की हालात आपात स्थिति में पहुंचने लगी है।
जबकि हम सभी ने देखा कि कोविड 19 से उपजी वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण जब देशव्यापी लॉकडाउन लगाया गया तो देश के राजधानी सहित लगभग सभी शहरों में कायापलट जैसी दृश्य सभी ने देखा , यमुना और गंगा नदी को साफ करने के लिए ना जाने कितने करोड़ की बजट कितने सरकारों ने लाया सभी धरा के धरा रह गए थे, लेकिन लॉकडाउन के कारण बिल्कुल देश की राजधानी सहित सभी शहर और नदियां प्रदूषण मुक्त और स्वच्छ हो गए थे । लेकिन फिर जैसे ही अनलॉक किया गया गाड़ियां और फैक्ट्रियां चलने लगी तो धीरे-धीरे प्रदूषण बढ़ने लगा है, और वैसे भी प्रत्येक वर्ष अक्टूबर के अंत और नवंबर के आरंभ में देश की राजधानी दिल्ली तो गैस चेंबर में तब्दील हो ही जाती है।
मैं यहां चर्चा यह करना चाहता हूं कि हम बिना शोर-शराबे और राजनीति के ऐसा क्या कर सकते हैं, जिससे कि हवा की गुणवत्ता नियंत्रित रखी जा सके । हम सभी देखते हैं कि विभिन्न राजनैतिक दल और सामाजिक कार्यकर्ता एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं और तो और अन्नदाता को भी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन साथियों इसका स्थाई तौर पर कोई भी राजनीतिक दल समाधान करने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति नहीं दिखाता बल्कि दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से प्रत्येक वर्ष राजनीतिक दल केवल और केवल अपना राजनीतिक हित साधने का ही प्रयास करते रहते हैं ।
जैसा कि हमने देखा पिछले वर्ष ही दिवाली की दोपहर तक दिल्ली में हवा की गुणवत्ता खराब थी, लेकिन फिर भी वह सांस लेने लायक थी । फिर उसके बाद शाम को पटाखे फोड़े जाने के बाद हालात और ज्यादा बिगड़ने लगी और दिल्ली गैस चेंबर में तब्दील हो गई। इस बार दोस्तों दिवाली से बहुत पहले दिल्ली की हवा जहरीली बन चुकी है, इसीलिए साथियों इस बार आप सभी से विनम्र निवेदन है कि पटाखे आप नहीं फोड़े, क्योंकि इस बार हवा पहले ही विषाक्त हो चुकी है और वैश्विक महामारी कोरोना वायरस का कहर भी हम सभी को सता ही रहा है ।
हमारे यहां एक गलत धारणा यह भी है कि प्रदूषण केवल ठंड के दिनों में ही बढ़ता है, क्योंकि इसी समय फसल अवशेष जलाया जाता है । यह तथ्य है दोस्तों की हम किसान 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच फसल अवशेष जलाते हैं। हमें यह भी पता है कि इससे उत्पन्न हुआ इस क्षेत्र के प्रदूषण में बढ़ोतरी करता है, परंतु साथियों यह ध्यान देने वाली बात है कि यह प्रदूषण की प्रमुख वजह नहीं है। प्रदूषण के वास्तविक कारक देखा जाए तो यह साल भर हवा में एकत्रित होते रहते हैं, आम दिनों में हमें स्वच्छता नजर आती है, क्योंकि हवा प्रदूषको को समान रूप से वितरित करती है और वातावरण में हवा बहती रहती है। यानी कि प्रदूषण का स्रोत कभी कम नहीं होता, बस वह नजर नहीं आता है।
जबकि साथियों ठंड के समय में यह माहौल बदल जाता है, क्योंकि हवा का बहना धीमा हो जाता है। यही कारण है कि दिल्ली में ठंड की प्रदूषण की कई घटनाएं नजर आती है , दिसंबर और जनवरी में स्मॉग की समस्या ज्यादा आती है , जबकि उस वक्त फसल ही नहीं जलाई जाती है । इसकी वजह स्थानीय प्रदूषण और खराब मौसम है, यह अहम है कि हम इसे पहचाने , क्योंकि इसके बिना पूरा ध्यान बाहरी कारकों पर ही केंद्रित रहेगा। याद रखना साथियों दूसरे राज्यों को दोष देना राजनीतिक दृष्टि से बेहतर हो सकता है, लेकिन प्रदूषण प्रबंधन के लिहाज से यह अच्छा नहीं है। वास्तविक और दीर्घकालिक उत्तर तो साथियों यही होगा कि हम कोयले तथा अन्य खराब इधनों से अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन की दिशा में बढ़े। कारो की जगह हमें बेहतर सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना होगा, यह व्यवस्था साथियों सस्ती और सुलभ होने के साथ-साथ ही आधुनिक और सुरक्षित भी होनी चाहिए, परंतु इस दिशा में देखा जाए तो हम आज कुछ खास प्रगति नहीं कर रहे हैं। हमारी आज हर सांस विषाक्त हो गई है , हमारे बच्चों के अभी विकसित हो रहे हैं फेफड़ों को देखते हुए हालात ऐसी ही नहीं रहने दिया जा सकता। अब हमें व्यापक पैमाने पर पहल करने की जरूरत है, साथियों यहां मैं पूरे दृढ़ता और आत्मविश्वास के साथ कह रहा हूं कि जुनून के साथ जरूरी कदम उठाने से बदलाव अवश्य आएगा।

विक्रम चौरसिया

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