
दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं है. दिल्ली सत्ता का केंद्र भी है और आजकल देश के अन्नदाता की हुंकार से भयभीत्त है. दिल्ली में दस्तक देने पहुँच रहे अन्नदाता को रोकने के लिए भयभीत दिल्ली ने दिल्ली के बाहर पुलिस की जो भीतें खड़ी की थीं वे भरभराकर अपने आप गिर रहीं हैं .सवाल ये है कि दिल्ली अन्नदाता की बात सुनने के लिए तैयार क्यों नहीं है ?
भारत कृषि प्रधान देश था और आज भी है. देश में कोई दस करोड़ से अधिक कृषक परिवार हैं जो देश की आधी आबादी के बराबर हैं,क्या कोई सरकार इतनी बड़ी आबादी को अनसुना,अनदेखा कर सत्ता में बनी रह सकती है ,या उसे सत्ता में बने रहना चाहिए ? भारत में किसानों को अन्नदाता कहा जाता है.अन्नदाता यानि ईश्वर .और इसी ईश्वर को अपनी बात मनवाने के लिए हड्डियां कंपा देने वाली सर्दी में मार्च करते हुए दिल्ली पहुँचने के लिए विवश होना पड़ा है .इस पर दुर्भाग्य ये है कि केंद्र की सरकार इन किसानों को दिल्ली में घुसने नहीं देना चाहती .दिल्ली की और बढ़ रहे किसानों पर जलप्रहार और आंसू गैस छोड़ी जा रही है , कल को उनपर लाठी और गोली भी चलाई जा सकती है .
देश के किसान केंद्र सरकार द्वारा बनाये गए कानूनों के खिलाफ है .केंद्र ने संसद में अपने बहुमत का दुरूपयोग कर इन कानूनों को पिछले दिनों पारित कराया था. इन कानूनों के विरोध में सरकार के सहयोगी अकाली दल ने एनडीए गठबंधन से नाता भी तोड़ा लेकिन सरकार ने उनकी भी परवाह नहीं की .कांग्रेस समेत अनेक दल इन कानूनों के खिलाफ हैं लेकिन सरकार ने अपने कानों में तेल डाल लिया है .उसे प्रतिरोध की कोई भी आवाज सुनना ही नहीं है.न सड़क पर और न संसद में .और इसी का नतीजा ये है कि किसानों के सब्र का बाँध टूट गया है और वे दिल्ली पर चढ़ाई कर रहे हैं .
देश में बीते छह दशकों में किसानों की दशा-दुर्दशा सुधरने के लिए क्या कुछ हुआ या नहीं हुआ ,इस पर बहस का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि देश में बीते छह साल से भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन की एक मजबूत सरकार है .इन छह सालों में किसानों की दशा पर बात की जाएगी ,क्योंकि हालात इन्हीं बीते सालों में बिगड़े हैं .नाबार्ड के हालिया अध्ययन के मुताबिक भारत में 10.07 करोड़ किसानों में से 52.5 प्रतिशत क़र्ज़ में दबे हुए हैं. वर्ष 2017 में एक किसान परिवार की कुल मासिक आय 8,931 रुपये थी.मेरे हिसाब से खेती और किसान के लिए यह वक्त जितना संघर्ष से भरा हुआ है, उससे ज्यादा संघर्ष से भरा हुआ भविष्य व्यापक समाज और माध्यम वर्ग के लिए होने वाला है. यह जरूरी ही नहीं अनिवार्यता है कि कृषि और कृषक के जीवन में आ रहे बदलावों से सक्रिय जुड़ाव रखा जाए.
केंद्र सरकार पर आरोप है कि उसने किसानों से जुड़े जो क़ानून हाल ही में बनाये हैं वे धनपशुओं के दबाब में बनाये हैं और इनसे किसानों का कोई भला होने वाला नहीं है. मुमकिन है कि ये आरोप सौ फीसदी सही न हों ,लेकिन सरकार की ये जिम्मेदारी बनती है कि वो किसानों को समझाये,उन्हें संतुष्ट करे,उनकी आपत्तियों का निराकारण करे .सरकार ऐसा करने के बजाय किसानों के विरोध को राजनीति से प्रेरित ही नहीं बता रही बल्कि किसान आंदोलन की तुलना एक बदनाम और राष्ट्रविरोधी आंदोलन से कर रही है ,जो दुर्भाग्यपूर्ण है .
चाय बेचते हुए सत्ता में पहुँचने वाले किसानों की पीड़ा को समझें ये आवश्यक नहीं है. केशराशि बढ़ाने से भी किसानों की समस्याओं को समझने की अक्ल नहीं आती ,इसे समझने के लिए हकीकत से रूबरू होना पड़ता है .आज की सरकार में बहुत से लोग हैं जो किसान परिवारों से आये हैं और वे किसानों की पीड़ा को समझते हैं लेकिन उनमें से किसी में भी मन की बात कहने का साहस नहीं है .किसानों के लिए बीते सत्तर साल में देश में बहुत काम हुआ ,लेकिन उसे हमारी मौजूदा सरकार खारिज कर चुकी है ,इसलिए अब जो कुछ है सब उसका है .
दुनिया से सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार भारत का यही असली चेहरा है. भारत को इस सच से शर्म नहीं आती है कि देश के एक प्रतिशत लोग 73 प्रतिशत संपदा पर कब्जा किए हुए हैं और इस कब्जे का दायरा ‘उपनिवेश’ की हद तक पहुंच चुका है.जब राज्यों की स्थिति पर नजर डाली जाती है तो हमें किसानों की आय में गंभीर असमानता नजर आती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में किसानों की सबसे कम मासिक आय मध्य प्रदेश (7,919 रुपये), बिहार (7,175 रुपये), आंध्र प्रदेश (6,920 रुपये), झारखंड (6,991 रुपये), ओडिशा (7,731 रुपये), त्रिपुरा (7,592 रुपये), उत्तर प्रदेश (6,668 रुपये) और पश्चिम बंगाल (7,756 रुपये) है. जबकि तुलनात्मक रूप से किसानों की ऊंची औसत मासिक आय पंजाब (23,133 रुपये), हरियाणा (18,496 रुपये) में दर्ज की गई.
सबसे बड़ा सवाल यही तो है कि क्या इस असमानता को देख कर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभर रहा है कि वर्ष 2022 तक किसानों की आय दो गुना करने का सूत्र, समीकरण और सिद्धांत क्या होगा? आज की स्थिति में ही जब किसानों की आय में उत्तर प्रदेश और पंजाब के बीच साढ़े तीन गुना का अंतर है, तब क्या यह अंतर वर्ष 2022 में बदला जा पायेगा?सरकार की नीतियां तो कम से कम ये उम्मीद बंधाती दिखाई नहीं देतीं .
एक लेखक के रूप में मई शायद उस पीढ़ी का आखरी व्यक्ति हो सकता हूँ जिसने कि हल की मूठ पकड़ी है और बिना मशीनों के खेती के कामकाज में हाथ बंटाया है .मुझे दुःख इसलिए भी होता है क्योंकि हम यानि हमारे भाग्यविधाता लगातार हकीकत से आँखें चुराकर निकल जाना चाहते हैं .बढ़ती भीड़ हिंसा, असुरक्षा और गैर-बराबरी के बीच इस तथ्य की तरफ हमारा ध्यान गया ही नहीं कि भारत में 10.07 करोड़ किसानों में से 52.5 प्रतिशत किसान कर्जे में दबे हुए हैं. देश में एक किसान के पास औसतन 1.1 हेक्टेयर जमीन हैं, जिसमें से 60 प्रतिशत सिंचित नहीं होती है. ऐसे में हर कर्जदार किसान पर 1.046 लाख रुपये का कर्ज है.
आप जानते हैं कि ये यह बीमा यानी इंश्योरेंस का जमाना है. यानी प्रत्यक्ष रूप से सहजता से किसान को संरक्षण नहीं मिलेगा और बीमे की व्यवस्था से जूझना किसान की अपनी निजी जिम्मेदारी है. केवल 26 प्रतिशत किसान के पास किसी भी तरह का बीमा है.17 प्रतिशत किसान ही ऐसे हैं, जिनके पास जीवन बीमा है. पिछले 20 सालों में यह बार-बार बताया गया है कि स्वास्थ्य सेवाएं हासिल करने के लिए सबसे ज्यादा कर्ज लिया जा रहा है और यह खर्च लाखों लोगों को गरीबी के जाल में धकेल रहा है.
भारत में केवल 5 प्रतिशत किसानों के पास स्वास्थ्य बीमा है. 66.8 प्रतिशत किसान कहते हैं कि उनके पास इतना धन भी नहीं बचता है कि वे बीमा करवा सकें. जबकि 32.3 प्रतिशत किसान नियमित आय न होने के कारण बीमा नहीं करवा पाते हैं.
इसलिए आइये इन संघर्षरत किसानों के साथ खड़े होने का साहस दिखाइए.इनका दिल्ली में स्वागत कीजिये .इन्हें सरकार के उत्पीड़न से बचाइए ,क्योंकि सरकार नहीं बल्कि असली अन्नदाता यही किसान हैं .अगर देश का किसान दुखी होगा तो शहरी आदमी भी सुख से नहीं रह पायेगा .लाठी,डंडे और गोलियां किसानों के मनोबल को नहीं तोड़ सकतीं .
@ राकेश अचल







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