डॉ मंजुला साहू

आज “अन्तर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस “है और बहुत कम पोस्ट ऐसी दिखी कि पुरूषों को बधाई दी गयी हो या उनकी शान मे दो शब्द लिखे गये हो ।बल्कि पुरुष भी आपस मे बधाई देते नही दिखते। जबकि मै मानती हूँ कि कोई एक खास दिन मनाना आपके महत्व को नही दर्शाता पर अब है तो कुछ लिखने का बहाना ही सही ।काफी कुछ पहले का लिखा भी जोड़ रही हूँ ।बस मन किया कि आज आप सभी को बधाई देना तो बनता है। आजकल समय कुछ ऐसा हो गया हैं कि पुरूष निरीह सा दिखने लगा है कुछ गन्दी मानसिकता के चलते पूरा पुरूष कुटुम्ब कही खो गया सा लगता है लड़कियों पर ही सारे विज्ञापन ,लड़कियों को पढ़ाये जैसे नारे पुरूष को कभी कभी हो सकता है सोचने पर मजबूर करते होगें।कम से कम छोटी उमर के किशोरों को तो गाहै बगाहै यही व्यवहार समाज में पुरूष को और कुंठाग्रस्त बना रहा है ।
लड़कियों पर बुरी नज़र रखने वाले पुरूष तो वास्तव में गलत है। पर इसका यह तात्पर्य नही कि पूरी पुरूष जाति ही इसकी अपराधी है ।जितनी बुराई है। उतनी अच्छाई भी है तभी दुनिया क़ायम है मेरा यह लेख उन सभी पुरूषों को समर्पित है जो भाई है किसी बहन के जो प्यारे पति है । जोअच्छे सखा है जो स्त्रियों को उसी रूप में देखते है जो उनका प्यारा रिश्ता है ,कभी कभी बहुत अच्छे मार्गदर्शक भी है ।
सदियो से पुरूष सत्ता सम्हालता आया हैं ।कर्ता धर्ता इस धरती का ब्रहमा स्वरूप,परम शक्ति का परिचायक ,दम्भ त्याज्य हैं उसे ।फिर तो कोहिनूर हैं पहले पुरूष के रूप में मैने अपने पिता को जाना “पिता” यानि जीवन दायक इस धरती पर साक्षात ईश्वर …………।
“नीलाम्बुजश्यामलकोमलागंम् सीतासमारोपितवामभागम्!
पाणौ महासायक चारूचापं
नमामि रामं रघुवंशनाथम्”!
सुबह उठते ही मंत्रों की सुमधुर आवाज कानो में पड़ने लगती । उसके बाद ठाकुर जी को नहलाते धुलाते भोग लगाते हम बच्चो को चरणामृत पिलाते ।ऐसे पिता की पुत्री होना सौभाग्य की बात हैं ।भारत में अब भी ऐसी सुबह बहुतायत में मिल जायेगी और ऐसे पिता व भाई के रूप में वह कृष्ण स्वरूप है ,छोटा है तो दुलारा,आँखों का तारा,बड़ा है तो बाल सखा से लेकर रक्षक के रूप में रेशमी धागे के बन्धन से बन्धा पुरूष हमेशा सम्बन्ध निभाता है। कितना मधुर है ये सम्बन्ध ।
सात जन्म का ,सात फेराे का कस्मे वादो का,गठबंन्धन निभाता है पुरूष ।
साक्षात् विष्णु स्वरूप हो जाता है सबसे खूबसूरत रिश्ता संसार चलाने वाला ही जब संसार मे मां की गोद में आता है तो अपने बाल स्वरूप में कन्हैया के रूप में मां को यशोदा स्वरूप कर देता है उसे देखकर मां सारे दुखदर्द भूल जाती है ।पुत्र प्रेम में पगी सारी उम्र उसे देख निहाल होती रहती है एक दोस्त एक प्रेमी के रूप में एक पति के रूप में ,कभी राम है, कभी श्याम है ।
मामा ,चाचा ,बहनोई , देवर सभी प्यारे रिश्ते है।
माना है कि दम्भी है पर प्रेमी भी हैं ।माना कि वह बन्धन है ,उन्मुक्त भी,पुरूष नही तो सृष्टि नही।नदियाँ कितनी भी चंचल हो जाकर सागर में ही मिलती हैं ।
मोर, कबूतर ,हिरन सब सुन्दरता में मादा से सुन्दर हैं ।पुरूष का श्रंगार भी प्रकृति ही करती है नौ महीने बच्चे को अपने अस्तित्व में पालने वाली मां की संतान पिता का भी प्रतिरूप होती है पिता रूप में पुरूष महान है ,पूजनीय है ।







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