अग्रलेख /रोहित राज-गिरिडीह (झारखंड)-भाई-बहन के प्रेम एवं स्वच्छता का प्रतीक प्रकृति पर्व “करमा”

अगस्त माह में तीज के पावन पर्व जब सावन की बूंदों में धीरे धीरे अपनी करवट समेत रहा होता है, तब भादो माह (भाद्रपद) के शुक्ल पक्ष की एकादशी को एक और प्रकृति पर्व “करमा” मनुष्य को प्रकृति से जोड़ रहा होता है।
खेतों के धान की बालियां हरे वस्त्र सा तथा सफेद कांसे की बालियां आभूषण सा पूरे धरती को श्रृंगारित कर रही होती है।
कहते हैं लोकपर्व का सीधा संबंध कृषि और पर्यावरण से है। इनमें से प्रकृति पर्व करमा एक ऐसा लोकपर्व है जो मध्यवर्ती भारत की जनजातियों द्वारा मनाए जाने वाला सर्वाधिक प्रिय लोकपर्व है।
झारखंड के साथ-साथ छत्तीसगढ़, उड़ीसा, मध्य प्रदेश इत्यादि राज्यों में करम पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

इस त्यौहार का प्रमुख संदेश ‘जीवन में कर्म की प्रधानता’ है जो आदिवासियों के साथ-साथ सदानों (गैर आदिवासी) में भी समान रूप से प्रचलित है।
करम पर्व मूल रूप से भैया दूज की भांति “भाई-बहन के प्रेम का पर्व” है। इसमें बहन द्वारा भाई के जीवन की कामना हेतु उपवास रखा जाता है।
यूं तो कर्म परब विशेष तौर पर महिलाओं की नेगाचारी‌ प्रधान निर्जला व्रत त्यौहार है। महिला प्रधान इस त्यौहार में प्रमुख उपासक छोटी-छोटी बाल कन्या होती हैं, जो बालू में जावा रोक कर कर्म पर्व का शुभारंभ करती है।
इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष पवित्रता होता है,जिसे रस्म के अनुसार अविवाहित छोटी कन्या पूजा पद्धति कर पूर्ण करती है।
कर्म पर्व रखने वाली बच्चियों एवं युवतियां को करमअतिन कहा जाता है।
कर्म पर्व करमतिया प्रधान जरूर होता है, लेकिन महिलाओं के सहयोग के लिए पुरुष भी उपासना करते हैं।
महिलाएं सारी नेगाचारी के साथ कर्म आराधना जरूर करती हैं, लेकिन कर्म डाली अखरा में काटने व गाड़ने का काम पुरुषों के द्वारा करने की संस्कृति रही है।
किसी अखरा या आंगन में कर्म डाली को स्थापित किया जाता है, महिलाएं कर्म डाली सजाती है,उसके बाद या अविवाहित युवतियों द्वारा विभिन्न तरह के अंकुरित बीजों से युक्त “जावा”को करम डाली में स्थापित किया जाता है और फिर फूल अर्पण कर पूजा पद्धति के साथ नृत्य संगीत का कार्यक्रम किया जाता है।
एवं कुंवारी कन्याओं द्वारा अपने इष्ट देव से मनचाहा वरदान की कामना करती है।
यह अंकुरित करम जावा स्वच्छता और नए जीवन का प्रतीक है। बाद में पूजा संपन्न होने पर इसी जावा और अंकुरित अनाज को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
प्रत्येक पर्व के पीछे उसका एक इतिहास जरूर होता है, करमा पर्व के संबंध में भी कई किंवदंतियां है।
एक प्रसंग के अनुसार छत्तीसगढ़ के कोरबा, रायगढ़ आदि जिले में जनजातियों के अनुसार राजा कर्मसेन अपने ऊपर पड़े विपत्तियों को दूर करने के लिए अपने इष्ट देव को मनाने हेतु रात भर नृत्य किए तब से उनके नाम पर करमा पर्व या करमा नृत्य प्रचलित है।
झारखंड प्रांत के जनजातियों के अनुसार कर्मा धर्मा नाम के दो भाई थे जिसमें कर्मा ने कर्म की महत्ता और धर्मा ने शुद्ध आचरण का मार्ग दिखा कर प्रकृति पूजा की।
एक अन्य प्रसंग के अनुसार उरांव जनजातियों में खेतों में परिश्रम करके कर्म देवता से अच्छे फसल की कामना की जाती है।

यानि इस पूरे पर्व में प्रकृति की पूजा उसका संरक्षण का ध्यान रखा जाता है। इस प्रकार कर्मा भाई-बहन के प्रेम के पर्व के साथ-साथ जीवन में कर्म की प्रधानता का संदेश लिए एक बहुत सुंदर प्रकृति संबंधित त्यौहार है, जिसका सीधा संबंध कृषि और पर्यावरण संरक्षण से भी है।
वैसे भी भारत की जनजातियां भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाती रही है।
हमें आगे भी इस प्रकार के प्रकृति पूजक लोक पर्व को अस्मिता को अक्षुण्ण बनाए रखने की जरूरत है।

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