मूलतः बिहार के मुजफ्फरनगर में सपरिवार निवास करने वाले स्व.अधिवक्ता पद्मकुमार अग्रवाल जी के पिताश्री स्व.मदनलाल बजाज(अग्रवाल) का विवाह कोरबा नगर के नगर सेठ धनराज मोदी की पुत्री से हुआ था।
वैसे,भले उनका जन्म मुजफ्फरनगर में हुआ था लेकिन मध्यप्रदेश के कटनी में अग्रवाल साहब का परिवार आ गया था।मुझे उन्होंने बड़ी ही साफगोई के साथ बताया था कि कटनी में जिस धर्मशाला का निर्माण उनके दादाजी ने करवाया था, बुरे समय में उस धर्मशाला के सामने उन्होंने बर्फ तक बेची है! समय के उतार चढ़ाव का सामना करते स्व.मदनलाल बजाज अपने पुत्र-पुत्रियों सहित कोरबा आ गये।तीन भाइयों में मंझले स्व.पी.के.अग्रवाल जी ने अपनी शिक्षा को कोरबा आने के बाद कभी न रुकने वाली गति के क्रम से जोड़ दिया। बिलासा देवी की नगरी बिलासपुर से एलएलबी स्नातक करने के साथ साथ 7 विषयों में उन्होंने एम.ए. किया।
उन्होंने, मध्यप्रदेश विधुतमण्डल में क्लर्क की नॉकरी
भी की और शिक्षा पूरी होने पर, वकालत के व्यवसाय में नॉकरी से त्यागपत्र,स्थायी रूप से इसे अपना लिया। मेरा आपसे परिचय 1970 के दशक में हुआ जब वे पीथमपुर में रेडीमेड कपड़े और हमारी सायकल दुकानें होती थी उस दरम्यान हुई थी।1970 से प्रारंभ उनसे मेरी मित्रता उनके अंतिम सांस चलने तक बनी रही।
पहले तहसील कटघोरा हुआ करता था।अनुविभागीय अधिकारी का कार्यालय भी कोरबा में नहीं था। पुराने बजरंग टाकीज के सामने अनुविभागीय अधिकारी का लिंक कोर्ट लगता था।
छत्तीसगढ़ के उप मुख्यमंत्री रहे स्व.प्यारेलाल कंवर,श्री ननकीराम कंवर,स्व.चिंतामणि महतो, स्व.एम.डी.मोदी जी जैसे गिने चुने वकीलों के साथ अग्रवाल साहब ने अपनी वकालत का श्री गणेश किया था। यह बहुत कम लोगों को जानकारी में होगा कि कोरबा
ग्राम पंचायत के बाद कोरबा विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण बना तो अग्रवाल साहब ने कोरबा में उप कोषालय कार्यालय एवम कोरबा में सिविल कोर्ट के लिंक कोर्ट की मांग को लेकर भूख हड़ताल कर दी।
कोरबा के विकास की गति का पहिया निरन्तर गति से आगे बढ़ते और न्यायिक क्षेत्र में इसका नेतृत्व स्व.पी.के.अग्रवाल साहब करने में जुटे ।उनके घर से प्रतिदिन 500 पत्र कोरबा में शासकीय कार्यालय ,महाविद्यालय तथा न्यायालय खोले जाने के लिए प्रेषित किया जाता था।एक समय रेडियो में जिस तरह से झुमरीतिलैया प्रसिद्ध हुआ करता था ,ठीक स्व.अग्रवाल साहब के पत्रव्यवहार के कारण कोरबा सरकार और न्यायिक छेत्र में लोगों की जुबान पर आ चुका था।
लगन और मेहनत के लिये समर्पित व्यक्तित्व के धनी स्व.पी.के.अग्रवाल साहब ने कोरबा तहसील के 18 सदस्यों की संख्या वाले बार से अविभाजित मध्यप्रदेश के 45 जिलों में स्थापित बार के सदस्यों के मतों से चुनाव लड़ा और पूरे मध्यप्रदेश में सर्वाधिक मतो से विजयी हुए थे।मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद वे छत्तीसगढ़ विधान परिषद में निर्वाचित होते रहे ।
कोरबा के इतिहास में स्व.पी.के.अग्रवाल अपना अमिट छाप छोड़ गये हैं।कोरबा में विधि महाविद्यालय की स्थापना और जिला बनाये जाने के लिए उनका प्रयास उल्लेखनीय है । आप
मेरे से उम्र में बड़े थे लेकिन हमारे बीच,सम्बन्ध सदैव मित्रता का रहा।वे मेरे सुख-दुख के साथी थे।मेरे पिताजी के निधन के बाद,उन्होंने मित्रता के साथ साथ अभिभावक का दायित्व निभाते हुए मुझे पिता की कमी कभी महसूस नहीं होने दी।
उनके बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है जो आने वाली पीढ़ी के लिए उच्चकोटि का प्रमाणित पथप्रदर्शक दस्तावेज होगा।मैं उनके इतने करीब रहा,शायद ये अवसर उनके परिवार के सदस्यों को भी नहीं मिला।
उनका आकस्मिक रूप से शरीर त्यागना,संसारिक व प्रकृति का अपरिवर्तनीय नियम है लेकिन वे आज भी विद्यमान हैं जो मुझे महसूस होता है और वे मार्गदर्शन करते हैं।








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