प्रतिबंधों मे जीती ,
सिकुड़ती जा रही है, खुद मे जिंदगी
उधर कितने लोग थे, इधर कितना अकेलापन ।
अब तो बंद शीशे और दीवारों के भीतर से ही दिखती है,
बाहर की दुनिया ।
पर इसे ‘अकेलापन’ का नाम क्यों दूँ ?
यह तो मेरा एकांत है – जो मेरा और सिर्फ मेरा है ।
मन के अकेलेपन से क्यों घबराऊँ ;
जब चाहूँ , बिना रोक-टोक इसके आर-पार जाऊँ ।
जब छाया था सन्नाटा , पसरा था अकेलापन ,
ऊबी हुई थी छत , देर से पड़ी दिखती थी समय की उतरन ।
कभी लगा था कि फासला सिर्फ एक हाथ का है , और मंजिल सामने ।
शायद तब स्वच्छंद हो उड़ सकूँगी ।
जिसने हमे सिखाना चाहा था जीना जग मे ,
और बेड़ी डाली थी हमने जिनके पग मे ।
कह सकती हूँ उनसे कि
मैं अब बदल गई हूँ ।
मुझे अब पिंजर बद्ध होकर गाना भी भाता है,
अलबत्ता , उन्मुक्त गगन मे उड़ान कहाँ हो पाता है ?
पुलकित पंख भी अब टूटेंगे नहीं, हो चुके हैं सख्त ,
क्योंकि अब फड़फड़ाने की न चाह है , न जरूरत ।
अब तो यही अकेलापन जी को भाता है ,
क्योंकि ‘अकेलापन’ से मेरा ‘अपनापन’ का नाता है ।







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