औद्योगिक नगरीकोरबा की पत्रकारिता के महत्वपूर्ण शख्सियतों में एक हैं वरिष्ठ पत्रकार मनोज शर्मा। आप लगभग 3 दशक से तरुण छत्तीसगढ़, नवभारत के पश्चात वर्तमान में भास्कर अखबार के स्थानीय कोरबा ब्यूरो चीफ है। 19 मई को जन्म जयंती के अवसर पर हमारे संपादक सुरेशचंद्र रोहरा ने आपसे यह खास बातचीत की।

? आज की पत्रकारिता को देखकर आप कैसा अनुभव करते हैं।
- * आज पत्रकारिता और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गई है। प्रारंभिक काल में, मैंने महसूस किया, उस दरमियां चुनौतियों अलग थी , आज नायकत्व की पत्रकारिता का दौर है।
? कोरोना कोविड-19 के समय की पत्रकारिता को कैसे देखते हैं।
**मैं यही कहना चाहता हूं कि हजारों ऐसे छोटे-छोटे अखबार नवीस है जो साहस के साथ काम कर रहे हैं। आज उदारीकरण का मार्केट बन गया है । मीडिया जगत भी प्रभावित है इसके बावजूद कोविड-19 समय में बहुत अच्छा काम पत्रकार कर रहे हैं।
? पत्रकारों को कोरोना वारियर्स के संदर्भ में मतभेद हैं क्या कहेंगे।
**हां, यह बात आज चर्चा का मुद्दा है मगर मेरा मानना है कि वह पत्रकार ही है, जो आज के समय में चुनौती का सामना करते हुए छोटी-बड़ी खामियां सामने ला रहे हैं और अपनी जान जोखिम में रखकर काम कर रहे हैं। यही कारण है कि सैकड़ों पत्रकार कोरोना काल में काल कवलित हो गए।
? आपकी दृष्टि में पत्रकारिता व्यवसाय है या मिशन।
** व्यवसायिकता अपनी जगह है। पत्रकारिता पहले भी मिशन थी आज भी एक मिशन है। यही कारण है कि हजारों क्षेत्रीय पत्रकार, बनिस्बत बड़े चैनलों के इमानदारी से अपना काम कर रहे हैं और क्षेत्रीय दुख दर्द, समस्याओं को उठा रहे हैं।
? आपके आदर्श कौन है पत्रकारिता में।
**पत्रकारिता की ककहरा मैंने यही कोरबा में वरिष्ठ पत्रकार स्व. केशव लाल मेहता, विजय शर्मा के संरक्षण में सीखी । वेदप्रकाश मित्तल, किशोर शर्मा , विशेश्वर शर्मा से बहुत कुछ जाना समझा। पंडित विद्याधर पांडेय को मैं याद करना चाहूंगा उनकी बेबाकी से सीखा। और हां सुभाष अग्रवाल तरूण छत्तीसगढ़ के संपादक मालिक मेरे अभिभावक रहे, उनका भरोसा मुझे हमेशा मिला।
? पत्रकारिता में आपका आगमन पदार्पण कैसे हुआ।
** कोरबा मेरा मामा गांव है मेरे नाना जी सीएसईबी में कार्यरत थे। पिताजी रायपुर में अकाउंटेंट थे मैं कांग्रेस की राजनीति में था और वो एक ऐसा दौर था जब हमारे आदर्श सनी देओल हुआ करते थे उनकी फिल्म अर्जुन के नायक और सह नायकों की भांति हमारी टीम भी लोगों के भले के लिए अपने ढंग से काम करते थी। जब मैं कोरबा आया तो पहले पहल पांच सौ रुपए वेतन से तरूण छत्तीसगढ़ से मैंने अपनी पत्रकारिता शुरू की।
? कोरबा की पत्रकारिता में क्या विशेष आप देखते हैं।
** मैं बिलासपुर और रायपुर की अपेक्षा कोरबा की पत्रकारिता को ज्यादा संवेदनशील और महत्वपूर्ण मानता हूं। बड़े शहरों की पत्रकारिता सिर्फ क्राइम और राजनीति में सिमट कर रह जाती है। मगर कोरबा की पत्रकारिता के लिए राष्ट्रीय स्तर की सूझबूझ की जरूरत पड़ती है। यहां शहरी करण है तो एलुमिनियम प्लांट भी है कोयला खदानें भी है ग्रामीण आदिवासी बेल्ट है पौने 10 हजार मेगावाट का पावर हब भी है।
? आज की पत्रकारिता की चुनौतियां क्या देखते हैं।
**अगर हम समाज को आईना दिखाते हैं तो हमारी शक्ल साफ होनी चाहिए । मैंने ट्रेडिल प्रिंटिंग मशीन से लेकर आफसेट और आज की इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति का दौर देखा है। आज पत्रकारिता बदल गई है सूचना देना और जागृत करना दोनों ही काम आज है। आज चुनौतियां अलग है आज पत्रकारिता विश्लेषण परक हो गई है।
? पीछे मुड़कर देखते हैं तो पत्रकारिता के क्या सबक आपको याद आते हैं।
**(हंस कर कहते हैं) हां, आज भी जब मैं कभी पुराना पहले का लिखा पढ़ता हूं तो हंसी आ जाती है और सोचता हूं कि क्या यह मैंने लिखा था।
पत्रकारिता में कदम कदम पर सबक मिलते हैं जैसे 90 के दशक में मैंने एक रिपोर्टिंग की थी हॉस्पिटल पहुंचकर देखा कुछ लोगों को उनके अनुसार पुलिस ने बहुत पीटा था ताब में मैंने लिखा -“गांधी के देश में, सुभाष की गुंडागर्दी”
दरअसल, वह लोग कबाड़ और कोयले का गलत काम करते थे तत्कालीन थाना प्रभारी सुभाष सिंह , कुसमुंडा द्वारा उन पर कड़ी कार्रवाई की गई थी। जिसका उन्होंने प्रोपेगेंडा बनाकर यह दर्शाया की मारपीट हुई है। उन दिनों वर्शन की पत्रकारिता नहीं हुआ करती थी। बाद में सुभाष सिंह साहब ने कहा-” कम से कम एक बार मुझसे तो बात कर लेते!”
सच सारी सच्चाई जानकर मुझे एहसास हुआ कि यह मेरे लिए एक बड़ा सबक था।








Comments are closed.