सिंधु घाटी से “वीर विक्रमादित्य” के गहरे नाते की पड़ताल

प्रेम तनवानी

वीर विक्रमादित्य भारत के एक बहुत ही प्रसिद्ध सम्राट थे । जिनकी राजधानी उज्जैन मध्यप्रदेश में थी । उज्जैन में भगवान शिव का बड़ा मंदिर है । वीर विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भरथरी थे, ये दोनों भाई शिव के भक्त थे ।

वीर विक्रमादित्य श्री राम और श्रीकृष्ण के बाद सबसे अधिक प्रसिद्ध सम्राट थे । उनके राज में प्रजा सुखी और संपन्न थी, उनके समय सोने के सिक्के चलते थे । उन्हींके समय भारत को “सोने की चिड़िया कहा गया । भारत में प्रचलित संवत को “विक्रमी” संवत कहा जाता है, जो ईसाई संवत से 57 वर्ष पूर्व से प्रचलित हुई । कुछ इतिहासकारों ने लिखा है कि विक्रमादित्य ने भारत का कुतुब मीनार बनवाया और मक्का मदीना में शिव मंदिर भी बनवाया था ।

सिन्ध में वीर विक्रमादित्य की एक भव्य समाधी और एक मन्दिर भी है, जो टन्डो फ़ज़ल गांव के पूर्व में लगभग 8 मील दूर और टन्डो मुहम्मद ख़ान के पच्छिम में 10 मील दूर, ज़िला हैदराबाद में है । इसमें एक हाल था, जिसके दोनों तरफ़ दो कमरे थे । एक में समाधी और दूसरे में मन्दिर था । मन्दिर और समाधी में अखंड ज्योति जलती थी । यहां हर वर्ष मेला लगता था । लोग दूर दूर से दर्शन करने आते थे। अाने वालों के मन की कामनाएं पूरी होती थीं ।

ये देखकर गांव के मुस्लिम शेखों ने समाधी वाले कमरे पर क़ब्ज़ा कर लिया और उसे क़ब्र का रूप देकर कहा कि ये हमारा पीर “शेख़ भिरकियो है । अंग्रेज़ों के राज में कोर्ट में केस चलाया गया । कोर्ट के फ़ैसले के बाद क़ब्र वाला कमरा शेखों को और मन्दिर
वाला कमरा सिन्धी हिन्दुओं को दिया गया ।

विक्रमादित्य के बड़े भाई राजा भरथरी वैराग्य जागने के कारण विक्रमादित्य को राजकार्य देकर, तपस्या करने के लिए वन में चले गए । राजा भरथरी की समाधि सिन्ध के ज़िले दादू के सेव्हण में थी । जो कि आज भी पीर लाल शहबाज़ क़लंदर (उस्मानशाह
मर वन्दी। की क़ब्र वाले क्षेत्र में है ।

सिन्ध के कराची ज़िले के प्राचीन नगर ठट्टा में “पीर पठो” के पास विक्रमादित्य के भांजे राजा गोपीचंद की राजधानी थी, जिसके खंडहर आज भी वहां हैं । गोपीचंद का दोहता “गोगल वीर” था । सिन्ध और भारत के सिन्धी “गोगल वीर” के नाम से “गोगड़ो- गोगियो” का त्यौंहार मनाते हैं, इस त्यौंहार को भारत में “नागपंचमी” कहा जाता है । सिंधी में “गूगल वीर की एक कथा भी प्रचलित है ।

*गुरू गोरखनाथ की धूणी
नगर ठट्टा में कभी सिन्ध की राजधानी थी, जहां से कई सिन्धी राजाओं ने अपना राज कार्य चलाया । इस प्राचीन नगर में नाथ पन्थ चलाने वाले गुरू गोरखनाथ की धूणी है । इस धूणी की भभूत (राख) लगाने से कई रोग मिट जाते थे, इसलिए आम लोग, कई राजा और साधू सन्त भी यहां आते थे । इस कारण ठट्टो नगर एक तीर्थ स्थान बन गया था । गोरखनाथ विक्रमादित्य और भर थरी के गुरू थे । वे हिंगलाज माता के दर्शन करने के लिए सिन्ध आए थे ।

भारत के उज्जैन और उसके आस-पास “सैंधव” जाति के हज़ारों परिवार रहते हैं, यहां का राज परिवार “सिन्धिया” कहलाता है । जिनका कहना है कि उनके पुरखे कभी सिन्ध से आए थे, इसलिए वे ‘सैंधव” और ‘सिन्धिया” अर्थात “सिन्ध के कहलाते हैं ।

क्या वीर विक्रमादित्य सिन्धी थे ?
सिन्ध में विक्रमादित्य और राजा भरथरी की समाधी और उनके भांजे राजा गोपीचंद की राजधानी होना और विक्रमादित्य का परिवार “पंव्हार” (परमार) जाति का था, इस जाति के लोग सिन्ध में भी हैं । इससे प्रमाणित होता है कि वे सिन्धी थे, क्योंकि मनुष्य अपनी समाधी वहीं बनवाते हैं, जो उनका जन्मस्थान होता है । बंटवारे के बाद भी भारत में आए हुए सिन्धियों ने कई शहरों में वीर विक्रमादित्य के “राजा वीर” के नाम से मंदिर बनवाए हैं । इधर हमारे छत्तीसगढ़ के मुंगेली में भी “राजा वीर” के नाम से मंदिर है । वीर विक्रमादित्य का सिन्धियों के साथ कौन सा गहरा सम्बन्थ था ? ये एक खोज का विषय है ।

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