इस विषय पर बात करने से पहले यहां हम गांधी जी के कथन को रखना चाहेंगे “जो परिवर्तन आप विश्व में देखना चाहते हो वह पहले स्वयं में देखो”साथियों यही नैतिकता का वह सरल रूप है जिसे सभी लोग मानते हैं लेकिन कार्य रूप में बहुत कम लोग अपने जीवन में परिणित आज कर पाते हैं।
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे यहां सिविल सेवकों से लेकर राजनेताओं तक को एक अचार संहिता का पालन करना होता है, यह आचार संहिता निर्वाचन से लेकर कार्यालयो तक में लागू होती है। साथियों हमारे भारत में अगर हम नागरिक सेवा की बात करें तो कहा जाता है कि भारत के लोग स्वाभावत: बहुत ही ईमानदार होते हैं, यहां मेरा ईमानदारी का मतलब सिर्फ आर्थिक लाभ से नहीं है, बल्कि दोस्त समाज की भलाई और सेवा भाव की दृष्टिकोण से ऐसा माना जाता है। हमारे यहां साथियों बहुत से लोग नैतिकता को बनाए रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे देते थे, जिससे कि समाज में एक उदाहरण पेश किया जा सके। लेकिन साथियों समय के बदलने के साथ ही आज कुछ लोगों की सोच बदलने लगा है, और अब नैतिकता की बात करना अधिकतर लोगों को बेमानी सी लगने लगी है। हम सभी ने देखा कि 2017 के संघ लोक सेवा आयोग के मुख्य परीक्षा में एक आईपीएस ऑफिसर नकल करते हुए पकड़े गए, यह आईपीएस साहब ब्लूटूथ के जरिए अपनी पत्नी से संपर्क में थे , इनको नकल करने में इनकी पत्नी सहयोग कर रही थी। अब आप सोच कर देखो यह खुद एक आईपीएस ऑफिसर थे, अब उनकी तमन्ना थी कि फिर से परीक्षा देकर आईएएस बना जाए। लेकिन साहब जी खुद संघ लोक सेवा आयोग के द्वारा निर्धारित पेपर चौथी यानी कि एथिक्स और इंटेग्रिटी वाले पेपर में नकल करते हुए पकड़े गए । आखिर यह कैसी नैतिकता है? नैतिकता कहीं ना कहीं उचित आचरण के एक सिद्धांत का समूह है, जिसमें की ऐसे संस्कार और मूल्य है जो व्यवहार, चयन और कार्य को मार्गदर्शन देते हैं। दुनिया के संस्थानों और उनके कर्मचारियों के कुछ नैतिक मानक होते हैं साथियों, जिसको हम कोड ऑफ कंडक्ट भी कर सकते हैं। यही मानक जिम्मेदारियों को निभाने में एकरूपता लाते हैं, जिसके द्वारा ही व्यक्ति समाज के प्रति अपने दायित्वों को सही तरीके से निर्वहन करता है। नैतिकता से ही अपने आपको सुधारने तथा ईश्वर द्वारा प्रदान किया गया इस मानव शरीर रूपी जीवन को सफल बनाने में सहायता मिलती है।
अगर हम सिविल सेवा की बात करें तो भारत में यह सेवा सर्वाधिक प्रतिष्ठित सेवा है जिससे कि पूरे देश को अनेकों अपेक्षाएं होती है। लोगों को ऐसा विश्वास भी रहता है कि एक सिविल सेवक में नैतिकता का उच्च मानदंड होता है जैसे कि उनमें कृतज्ञता होनी चाहिए, समाज के अनुकूल और व्यवहारिक कार्य करने की क्षमता, निर्णय लेने की क्षमता, इसके साथ ही एक सिविल सेवक की पहुंच समाज के सभी नागरिक को तक होनी चाहिए चाहे वह किसी भी धर्म जाति या संप्रदाय का हो, कहीं ना कहीं साथियों एक सिविल सेवक को निर्णय लेने में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए, जो निर्णय ले वह निर्णय समाज हित में होना चाहिए ना की स्वाहित में, वंचित तबकों तक संसाधनों का पहुंच सुनिश्चित कराना एक सिविल सेवक का दायित्व होना चाहिए। साथियों ऐसी ही गुण होने से सिविल सेवकों के वे मजबूत स्तंभ बनेंगे जिस पर एक बेहतर समाज रूपी इमारत का निर्माण होगा । साथियों भारत की संप्रभुता और अखंडता का बचाव और समर्थन राज्य की सुरक्षा सार्वजनिक व्यवस्था सभ्यता और नैतिकता के साथ पूर्ण अखंडता बनाए रखना ही होगा, इसके साथ ही साथियों निष्पक्षता के साथ कार्य करते हुए, व किसी के भी खिलाफ भेदभाव नहीं करते विशेषकर गरीब वंचित और समाज के पिछड़े वर्गों के साथ हमें अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होगा। पिछले कुछ वर्षों से हम देख रहे हैं कि सिविल सेवकों के कार्यों को लेकर तमाम तरह के प्रश्न उठ रहे हैं, इन प्रश्नों में सबसे ज्यादा नैतिकता पर ही प्रश्न उठ रहा है। आज साथियों सिविल सेवकों की ट्रेनिंग से लेकर उनके द्वारा समाज में दिए गए सेवाओं पर जो बहस चल रहा है वह भारतीय समाज के लिए कतई सही नहीं है। इन्हीं सब बातों को लेकर तो संघ लोक सेवा आयोग ने अपने पाठ्यक्रम में नैतिकता पर एक प्रश्न पत्र जोड़ा जिससे कि सिविल सेवकों में नैतिक आचरण को बनाए रखा जा सके। याद कीजिए 2016 में ही प्रशिक्षु आईएएस की मौत तब हो गई जब वे दिल्ली में ट्रेनिंग के दौरान रुके थे, अपने दोस्तों के साथ पार्टी के बाद स्विमिंग पूल में तैरने के दौरान डूबने से उनकी मृत्यु हो गई। बड़ा सवाल यहां यह है कि उस दौरान सभी अल्कोहल ले रखी थी जिसके ही कारण उनके दोस्त लोग भी चाह कर भी उन्हे बचा न सके, इस तरह की तमाम घटनाएं जो पिछले कई वर्षों से सुनने में आ रही है वह नैतिकता का क्षरण ही है जो एक प्रतिष्ठित सेवा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। आज भ्रष्टाचार को भी देख लो अब यह तो प्रचलित हो गया है कि जो जितना बड़ा सिविल सेवक होगा वह उतना ही धनी और राजनीतिक पहुंच वाला होगा,अगर यहां साथियों हम कुछ अपवादो को छोड़ दे तो यह आज सत्य भी है, क्योंकि भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्ति जब पकड़ा जाता है वह याद तो राजनेता होता है या फिर केंद्र या राज्य का कोई सिविल सेवक होता है। वैसे आज तो लगभग सभी राज्यों के प्रथम श्रेणी के कर्मचारी से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक के कर्मचारियों का नाम भ्रष्टाचार में सामने आ ही रहा है। साथियों जिस सिविल सेवक के ऊपर हजारों लाखों का भविष्य टिका है, आज कुछ अपवादो को छोड़ दे तो वही अधिकारी इन सब बातों को दरकिनार करके अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए वह सब कुछ करता है जो उसे नहीं करना चाहिए।आज नेता और अधिकारी का गठजोड़ भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है जिसे तोडे बगैर देश का विकास असंभव है। आज सिविल सेवकों में गिरती नैतिकता को लेकर कहीं ना कहीं आम जनता और सरकार दोनों चिंता ग्रस्त है तथा इसके समाधान के लिए सरकार के द्वारा कई प्रयास किए गए जिससे कि सेवाओं में नैतिकता को बनाए रखा जा सके, जैसा कि पिछले माह ही देखा कि मोदी सरकार ने सरकारी बाबू के लिए कर्मयोगी योजना की शुरुआत किए हैं, जिससे कि सरकारी कर्मचारियो को नैतिक बनने में प्रोत्साहन किया जा सके। साथियों नैतिकता वैसे कोई किताबी ज्ञान नहीं है यह सिर्फ और सिर्फ व्यवहार की चीज है जिसमें व्यक्ति का पूरा व्यक्तित्व झलकता है। फिर भी लोक सेवा आयोग ने इसको अपने पाठ्यक्रम में शामिल करके एक सराहनीय कार्य किया है और पिछले माह ही भारत सरकार ने कर्म योगी योजना से भी सरकारी कर्मचारियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने का एक सराहनीय पहल की शुरुआत किया है। कहीं ना कहीं एक नैतिकता पूर्ण और लोक कल्याणकारी देश के लिए यह आवश्यक है कि उसके सभी नागरिकों में नैतिकता का उच्च मानदंड शामिल होना चाहिए।

विक्रम चौरसिया







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