
एक जिंदगी जीने के लिए कितनी
बार मरता है आदमी
खुद की पहचान बनाने को कितनी
पहचान मिटाता है आदमी
ख्वाहिशों की चाह में मुस्कुराना
भूल जाता है आदमी
दो पल सुकून की तलाश में
तमाम उम्र भागता है आदमी
आदमी ही आदमी के काम नहीं आता
कितना खुदगर्ज है आज का आदमी
भुलाकर खुद की चाहत
विवेकानंद, भगत सिंह ,सुभाष
सरीखा अगर बने आदमी
लोकहित की खातिर
कबीर, तुलसी , सूर जैसा
साहित्य सृजन करे आदमी
है यकीं ममता को कि
प्रेमचंद ,महादेवी ,निराला ,पंत सा
अमर होगा आदमी
एक जिंदगी जीने के लिए
कितनी बार मरता है आदमी
✍डॉ ममता श्रीवास्तवा, सरूनाथ






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