शिक्षक दिवस सुरेशचंद्र रोहरा का विशेष संपादकीय

डाक्टर संजय गुप्ता: एक अद्भुत, अनुपम महानतम शिक्षाविद


-सुरेशचंद्र रोहरा

डाँक्टर संजय गुप्ता

डॉक्टर संजय गुप्ता नाम है एक अपने आप में शिक्षण संस्थान का, जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में जो ज्योति प्रज्वलित की है वह अनुपम है, अद्भुत है। उन्होंने शिक्षा क्षेत्र को जो दिशा प्रदान की है उसे देख कर के मैं आश्चर्यचकित हो गया, कोई एक प्राचार्य इतना गुणी हो सकता है, कितना सक्षम और सचेत हो सकता है। इतना तत्पर और प्रेरक हो सकता है, मुझे प्रकल्पना नहीं थी।

आज शिक्षक दिवस पर, मैं अपने उन सभी शिक्षकों को स्मरण करते हुए यह आलेख आज के शिक्षाविद प्राचार्य डॉक्टर संजय गुप्ता को समर्पित कर रहा हूं, जो मेरी दृष्टि में सच्चे अर्थों में आज एक महानतम शिक्षक का दायित्व निर्वहन कर रहे हैं।

निसंदेह शिक्षक के प्रति हर एक व्यक्ति के मन में एक सम्मान का भाव होता है अगर आप स्कूल गए हैं तो शिक्षक से आप अवश्य रूबरू हुए होंगे, भला इसके बिना ठौर कहां है। विकास में भी तो कहा है- बंधऊ गुरु पद कंज कृपा सिंधु…

तो, मैं भी स्कूल गया हूं प्राथमिक शिक्षा से लेकर के स्नातकोत्तर की शिक्षा अर्जित की है जाने कितने शिक्षकों से साबका पड़ा मगर आज जब मैं शिक्षक दिवस पर लिखने बैठा हूं तो आंखों के सामने ऐसा शिक्षक उतर रहा है जिससे मेरा दूर-दूर का कोई वास्ता नहीं रहा कुछ भी मुलाकाते हुई और मैंने महसूस किया कि यह शिक्षक अपने आप में इतर है।
यह है डॉक्टर संजय गुप्ता इनसे हाल ही में मेरी मुलाकात हुई और बातचीत के बाद ऐसा महसूस हुआ कि मानो हमारा बहुत पुराना संबंध है ओ मैं उन्हें बहुत दिनों से जानता हूं बहुत ही कम समय में पूछे जो चर्चा हुई उसे सुनकर कि मैं हतप्रभ रह गया और जो बातें सामने आए हैं उन्हें अगर आप भी महसूस करें तो मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि आपको यह मानना पड़ेगा कि आज के समय में शिक्षक के रूप में एक नेतृत्वकर्ता के रूप में डॉक्टर संजय गुप्ता जो काम कर रहे हैं कहीं दिखाई नहीं देता कोई शायद कल भी नहीं सकता इनमें जिजीविषा है काम करने का ऐसा उद्धाम भाव मैंने महसूस किया है वह दुर्लभ है एक शिक्षक में यह होना चाहिए अगर आप असंख्य असंख्य दिए जलाना चाहते हैं तो आप में वह ताकत होनी चाहिए कि आप उन चीजों को जला सके आपने अग्नि का अक्षय स्रोत होना चाहिए। आप यह आश्चर्य कर सकते हैं कि और अगर उन्हें देखे तो यह मानने को मजबूर हो जाएंगे की डॉक्टर संजय गुप्ता में वह आग है वह चिंगारी है जो जाने कितने बच्चों में विस्तारित हो रही है विस्तारित बहुत ही चले जाएगी और एक ऐसी नई पौध आने वाले समय में इस देश के लिए काम करेगी जिसकी सिर्फ हम कल्पना ही कर सकते हैं यह बात मैं अपने पूरी आस्था और विश्वास के साथ इसलिए कह रहा हूं कि मैंने अनुभूत किया है कि डॉक्टर संजय गुप्ता कर्मठता के प्रतीक हैं जैसे हांडी में पके हुए चावलों के कुछ गानों को पका हुआ देख कर के अनुमान लगाया जा सकता है कि सारे चावल पक गए हैं वैसे ही मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि डॉक्टर संजय गुप्ता जैसा मैंने अल्प समय में देखा और महसूस किया है तो मैं यह विश्वास के साथ कर सकता हूं जो काम कर रहे हैं वह बच्चों में छात्रों में एक ऐसी प्रेरणा का संचार करेगी कि वह कर्म योगी बनकर के सामने आएंगे इसका सबसे लघुतम उदाहरण यह है कि डॉक्टर संजय गुप्ता आज जहां भी है अक्सर उनके स्कूल की जो खबरें शंकर के हमारे आंखों के सामने तैरती हुई दिखाई देती हैं उन्हें यह महसूस कर सकता हूं कि कितने बड़े कर्मयोगी हैं। ऐसा कोई दिन नहीं होता जब उनके मार्गदर्शन में कोई ना कोई कार्यक्रम नहीं हो रहा हो देश की महत्वपूर्ण जयंतिया तो सभी मनाते हैं महत्वपूर्ण त्यौहार और महान लोगों को भी सभी याद करते हैं मगर आपके नेतृत्व में ऐसा कोई दिन नहीं होता जब स्कूल के छात्र सक्रिय रूप से उसे मना करके आप साथ ना करते हैं चाहे वह गांधी जयंती हो नेहरू जयंती हो भगत सिंह की जयंती हो या फिर किसी की पुण्यतिथि हो या त्यौहार हो हर एक दिन एक उत्सव का माहौल आपके इर्द-गिर्द दिखाई देता है और खुशियां और सुर्खियां बटोरोता है।
यह चीज बहुत छोटी है आपका सत्य है कि या तो बहुत सामान्य बात है मगर मेरी दृष्टि में यह बहुत बड़ी चीज है हमारे समय में तो 26 जनवरी 15 अगस्त के अलावा तभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती भी नहीं मनाई जाती थी देश के महान पुरुषों व्यक्तियों के बारे में सिर्फ हमें पाठ्यक्रम में ही जानकारी मिलती थी मगर उनके ऊपर कोई कार्यक्रम हो हमें बताया जाए ऐसा चलन नहीं था।


डाक्टर संजय गुप्ता होने का अभियार्थ

आज शिक्षक दिवस है और ऐसे में निसंदेह शिक्षकों की बहुत याद आती है जिन्होंने बचपन में हमें उंगली पकड़ कर लिखना पढ़ना सिखाया शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य अगर मैं उन यादों में खो जाता हूं तो अनेक शिक्षकों के चेहरे मेरी आंखों के आगे तैरने लगते हैं। मुझे यह भी स्मरण है कि जब प्रथम कक्षा में मैंने प्रवेश किया था तो एक शिक्षक ने मुझे अनार … और आम का ककहरा सिखाया था उनका चेहरा आंखों के आगे अक्सर डोलने लगता है। प्राथमिक कक्षाओं के वह शिक्षक जिन्हें शायद मैं कभी नहीं भूल सकता।
अक्सर याद आते हैं उच्च शिक्षा के दरमियान जाने कितने शिक्षक शिक्षिकाओं ने ज्ञान का अमृत बरसाया। भला मैं उन्हें कैसे भूल सकता हूं। आज जब मैंने कलम उठा कर के शिक्षक दिवस पर लिखने बैठा हूं तो और संभवत पहली दफा प्रयास किया है तो एक एक करके सारे शिक्षकों के चेहरे आंखों के आगे आ और जा रहे हैं।
मगर ऐसे में आप आश्चर्य कर सकते हैं कि डॉक्टर संजय गुप्ता का चेहरा घनीभूत होकर के सामने है और शायद इसलिए सामने है कि आज की शिक्षा व्यवस्था पर मैं कुछ कहना चाहता हूं।मैं शिक्षक दिवस के आज के इस पवित्र दिवस पर यह बात बड़ी ही शिद्दत के साथ कहना चाहता हूं कि जब शिक्षा एक व्यापार बन गया है जब सच्ची शिक्षा और सच्चे शिक्षकों का पता नहीं! एक लेखक अखबारनवीस होने के नाते मुझे कठोर यथार्थ दिखाई देता है। मुझे लगता है- ऐसे में डॉक्टर संजय गुप्ता का व्यक्तित्व और उनका काम बोल रहा है। और मैं यह बात बड़े ही फक्र के साथ लिख रहा हूं कि आपने शिक्षा के क्षेत्र में जो महत्वपूर्ण काम किया है वह दुर्लभ प्रकृति का है।
आस पास कोई ऐसा शिक्षण संस्थान कोई एक शिक्षक दिखाई नहीं देता जो आपके आसपास भी काम करता हुआ महसूस होता हो। आपने शिक्षा और नौनिहालों को मानो आत्मसात कर लिया है। शिक्षा ही आपका जीवन है और शायद , नौनिहाल ही आपकी सांसे, यही कारण है कि कोरोना काल के भयावह समयकाल में भी सुबह-सुबह आप अपनी ड्यूटी पर स्व स्फूर्त हाजिर हो जाते थे। ऐसे समय में जब चारों तरफ भय का माहौल था लोग अपने घरों में घुस चुके थे लोगों को यह मौका मिल गया था कि कुंभकरण की तरह हम सोए लोग यह सोच रहे थे कि अब तो आराम ही आराम है। ऐसे समय में भी डॉक्टर संजय गुप्ता ने कभी भी स्कूल आना नहीं छोड़ा। और सदैव बिना नागा अपने नियत समय पर स्कूल आ जाते थे और आकर के अपने चेंबर में बैठ कर के अपना रूटीन काम करते थे। स्कूल में टहलते थे उन कक्षाओं में जाते थे जहां कभी बच्चे हंसते थे, पढ़ते थे, कभी चहल-पहल हुआ करती थी। वे आखिर क्या महसूस करते थे? आप सोचिए।

कोरोना काल में अगर सबसे ज्यादा असर दिखाई पड़ता है तो शिक्षण संस्थाओं पर ही, ऐसे में डॉक्टर संजय गुप्ता कि वह मनोदशा मैंने नजदीक से महसूस की और मुझे महसूस हुआ कि एक शिक्षक को ऐसा ही होना चाहिए जो अपने दायित्व को कभी ना भूले और चाहे जैसी भी परिस्थितियां क्यों ना हो कमल दल की भांति अपनी जड़ों से जुड़ा रहे, डॉक्टर संजय गुप्ता जुड़े हुए दिखाई देते रहे। जब चारों तरफ अंधेरा था, सन्नाटा था तब भी उन्होंने अपने स्कूल की बागडोर नहीं छोड़ी और अकेले दम ही बहुत कम स्टाफ के साथ स्कूल में मौजूद रहा करते थे।

इस भावना को ऐसे मनोविज्ञान के रूप में मैं महसूस करता हूं कि कोई व्यक्ति इस तरह अपनी जड़ों से सरोकार रखता है। अगर ऐसी स्थिति है इसका सीधा साधा प्रश्न यह है कि यह व्यक्ति, एक व्यक्ति मात्र नहीं है महामानव है। यह व्यक्ति प्रेरणा देता है कि किस तरह हमें अपनी भावना और कर्तव्य से जुड़ कर के काम करना चाहिए। ठीक है आज समय अच्छा नहीं है इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपनी आंखें बंद कर लें और अपने घर में घुस जाएं शुतुरमुर्ग बन जाएं।
दरअसल, यही तो परीक्षा है! यही तो अग्निपरीक्षा है !! यही समय आपके व्यक्तित्व की परख है। जो आप का निर्धारण करता है आपका मानक बताता है कि आप आखिर हैं क्या चीज। डॉक्टर संजय गुप्ता ने यह अनायास ही सिद्ध कर दिया कि एक शिक्षक के रूप में उनकी कितनी गहरी दृष्टि है। जब सारे शिक्षण संस्थाएं बंद थी ताले लग गए थे ऑनलाइन शिक्षा का दौर चल रहा था डॉक्टर संजय गुप्ता अगर अपने स्कूल में अपने कक्ष में मौजूद थे अपने स्कूल की लैबोरेट्री , कमरों में आ जा करके उन्हें महसूस कर रहे थे तो यह बताता है कि उनकी सोच और विजन शिक्षा को लेकर कितनी गहराई लिए हुए हैं।

कहते हैं ना, कि आपको आपका काम ऊंचाई तक पहुंचाता है। और सभी का काम करने का तरीका अलग अलग होता है। मगर सत्य है कि काम एक होता है काम करने की प्रक्रिया अलग अलग होती है। किसी किसी शख्सियत का काम करने का तरीका सबसे अलग होता है वही समाज को एक दिशा दे जाता है। और समाज रौशनी फैलाता है। डॉक्टर संजय गुप्ता ने भी शिक्षा के क्षेत्र में एक अद्भुत रोशनी रोशन की है जिसका प्रकाश दिखाई देता है। सैकड़ों हजारों संस्थाओं में एक संस्था से कोई हजारों लोगों में एक व्यक्ति अगर कुछ अलग दिखाई दे रहा है उसका सीधा सा मतलब यह है कि उसमें कुछ अलग ताब है। उसमें कुछ अलग करने की क्षमता है और जो व्यक्ति अलग क्षमता के साथ काम करता है तो उसके परिणाम भी निसंदेह अलग ही दृष्टिगोचर होते हैं।

यही कारण है कि इस आलेख के माध्यम से यह बात यह संदेश हम प्रसारित करना चाहते हैं कि संजय गुप्ता होना कोई सहज और सरल बात नहीं है। ऐसे समाज को दिशा देने वाले शिक्षक आज बहुत ही कम है जिन्होंने शिक्षा को ही अपना जीवन का एक संदेश बना दिया है और शुभ संदेश प्रसारित कर रहे हैं शुभ ज्योति लिए हुए हैं।

एक शिक्षक एक कर्मवीर

थोड़े ही समय में डॉक्टर संजय गुप्ता के नेतृत्व में चल रहे शिक्षण कामकाज को देख कर के मैं अचंभित रह गया। कोई एक प्राचार्य, कोई एक शिक्षक, कोई एक स्कूल ऐसा भी होता है, ऐसा प्रेजेंटेशन दे सकता है। यह कम से कम मेरे ख्याल और कल्पना से बाहर था स्कूल के संदर्भ में जो एक मनोभावना आमतौर पर लोगों के मन में है कि स्कूल तो सिर्फ शिक्षक की औपचारिकता मात्र का निर्वहन कर रहे हैं शिक्षक शिक्षा दान की जगह स्कूल में सिर्फ समय व्यतीत करते हैं। स्कूल की, भवन की, स्कूल के स्टाफ कर्मचारी, शिक्षक इन सब का चित्र विशेष रूप से आज के निजी स्कूलों के कारण कुछ बिगड़ सा गया है।स्कूलों में चल रहा घात प्रतिघात मानो किसी राजनीतिक शतरंज की एक कहानी बयां करता है।

वहीं आज मुझे एक महाविद्यालय जिस पर एक पूरा व्यंग्यात्मक उपन्यास श्रीलाल शुक्ल ने “राग दरबारी” लिखा था स्मरण हो आया है। शिक्षकों की दशा और दिशा पर लगभग 60 वर्ष पूर्व इस उपन्यास में जो चित्र उकेरा गया है वह मानो आज भी सही प्रतीत होता है। मगर, इससे उलट अगर हम डॉक्टर संजय गुप्ता के नेतृत्व में चल रहे शिक्षण संस्थान पर दृष्टिपात करते हैं तो सब कुछ ऐसा दिखाई देता है मानो भविष्य का एक सुंदर दृश्य साकार होने जा रहा है, ऐसे विद्यार्थी यहां से बाहर आ रहे हैं जो देश और समाज को मजबूत बनाएंगे। अपना योगदान देंगे। सीधी सी बात है कि जब कोई शिक्षक शिक्षा को अपना एक मिशन बना लें तो फिर सब कुछ ठीक होने लगता है अगर वह अपने आप को ठीक कर ले तो आसपास की स्थिति परिस्थितियां भी ठीक होने लगती हैं। सब कुछ बेहतर होने लगता है। यही कारण है कि डॉ संजय गुप्ता के नेतृत्व में चल रहा संस्थान कुछ ऐसे नए प्रतिमान गढ़ रहा है जो आज के शिक्षा जगत के लिए एक नजीर है।

शिक्षक शिक्षा संस्थान कैसा होना चाहिए यह हम इन पर सामान्य सा दृष्टिपात करके जान समझ सकते हैं। शिक्षा को अपना सर्वस्व समझ कर के जिस भांति एक कर्म योगी की तरह डॉक्टर साहब ने प्रयास किए हैं वह अत्यंत महत्वपूर्ण है और रेखांकित करने योग्य हैं।
एक दिन की बात है मैं अचानक उनके स्कूल पहुंच गया औपचारिक चर्चा के बाद उन्होंने कहा – रोहरा जी, आइए! मेरे साथ, मैं साधारण भाव से उनके साथ हो लिया। धीरे-धीरे उन्होंने मुझे पूरा शिक्षण संस्थान घुमा दिया जब मैं उनके साथ पहली ही कक्ष में पहुंचा तो मैं चौक गया क्योंकि मेरे मस्तिष्क में स्कूल की, कक्षा का मतलब एक सामान्य सा कक्ष अंकित है। मगर स्कूल के प्रथम कक्षा का भी कक्ष देख कर के मैं सोच में पड़ गया कि मैं कहां आ गया हूं और क्या हमारे आस-पास भी कोई ऐसा स्कूल हो सकता है जहां नौनिहालों के लिए इतनी बेहतरीन सुंदर व्यवस्था हो सकती है। ऐसा अनुशासन हो सकता है। सब कुछ कल्पना से बाहर आज यह सब हमारे इर्द-गिर्द हो रहा है। मैं सचमुच अचंभित डॉक्टर संजय गुप्ता के चेहरे की तरफ देखता रह गया। उन्होंने धीरे-धीरे मुझे अन्य सभी कक्ष और लैबोरेट्री दिखाई बच्चों का पुस्तकालय दिखलाया। यह सब देख कर के सचमुच ऐसा प्रतीत हुआ कि कहीं किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गया हूं।

यह हमारे अंचल का एक स्कूल एक शिक्षण संस्थान है आश्चर्य और निश्चित रूप से वहां के बच्चे जब इस माहौल से निकलेंगे तो पूरी दुनिया उनके मुट्ठी में होगी। यह तय है डॉक्टर संजय गुप्ता के साथ बिताए हुए वह लगभग 20 मिनट मेरी आंखों के आगे बारंबार आ जाते हैं। और मैं मुग्ध हो जाता हूं। जिस तरीके की शिक्षण व्यवस्था आज डॉक्टर संजय गुप्ता के नेतृत्व में की जा रही है वह नए नए प्रतिमान रचेगी यह मुझे पूरी उम्मीद है।
आज शिक्षक दिवस के शुभ अवसर पर मैं इस आलेख के माध्यम से डॉक्टर संजय गुप्ता को अशेष शुभकामनाएं और बधाई देता हूं और सरकार से प्रार्थना करता हूं कि ऐसी विभूतियां हमारे आस पास बहुत कम हैं, हो सके तो इनसे शिक्षा जगत में आमूलचूल परिवर्तन के लिए चर्चा करके प्रदेश की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था को बदलने का प्रयास किया जाए ताकि आने वाला भविष्य एक नई रोशनी लेकर आए और कल कोई यह न कह सके कि जब कोई एक डॉक्टर संजय गुप्ता आधुनिक भारत का एक शिक्षाविद नए नए प्रतिमान मानक गढ़ रहा था तो सरकार कुंभकर्णी निद्रा में थी।
gandhishwar.rohra@gmail.com

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