
डॉ टी महादेव राव
हमारे एक मित्र हैं – शिक्षक हैं पांचवी कक्षा के। एक दिन कुछ नया कर गुजरने का शौक चर्राया। कक्षा में महुंचते ही बच्चों से बोले – बीस पक्षी, बीस पालतू पशु, बीस हिसक पशु बीस फल और बीस अपनी पसंद के नेताओं के चित्र एकत्रित करो, और उन्हें एक नयी कॉपी में चिपकाओ।
बच्चे जो गणित के मुश्किल सवालों, विज्ञान के कठिन सिद्धांतों, हिन्दी के प्रासंगिक व्याख्याओं और अंग्रेजी के हिज्जों से परेशान थे, एकाएक विषय परिवर्तन से खुश हो गये। उन्हें पंद्रह दिन का समय मिला। अब उनकी कक्षा का हर बच्चा कहीं पत्रिका, कहीं अखबार और कहीं पुस्तकें ढूंढता हुआ मिलता। एक असीम उत्साह था उनमें।
कई बच्चे घर में लड़-झगड़ के महीने के अखिरी दिनों में मां-बाप पर कर्ज बढ़ाकर, घर में अगर रद्दी है तो उसे बिकवाकर पैसे लेते और पुस्तकों की दुकानों में पशु पक्षी, नेता के चित्र खरीदते, उन्हें कापी पर चिपकाते। पूरे भागीरथी प्रयासों के बाद भी बीस का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पा रहा था। प्रतिदिन कक्षा में उनकी आपस में बातचीत भी इसी प्रोजेक्ट पर होती पढ़ाई-लिखाई सब ठप्प। शिक्षक भी आराम फरमा रहे थे।
कक्षा में जहां अति उत्साही प्रोजेक्ट बनाने वाले हैं, तो अति उत्साही पढंतू भी होते हैं। उन्हें मास्साब का यह तुगलकी प्रोजेक्ट कुछ सुहाया नहीं, जैसे कई असन्तुष्ट हमेशा हाई कमान से नाराज़ ही रहते हैं। और वे भिनभिनाते लगे। एक तो बोर्ड परीक्षा और उस पर यह बेमतलब का फालतू प्रोजेक्ट वर्क---। पढन्तुओं ने असंतुष्ट हो जाकर प्रधानाध्यापक से इस व्यर्थ मगजमारी को रोकने का अनुरोध किया। तुगलकी शिक्षक वैसे ऊंची पहुँच के माध्यम से आए थे, सो बच्चों को हां कहकर प्रधानाचार्य ने चुप्पी साध ली।
इधर पशु पक्षी खोजने वाले पूरे दम-खम से जुटे थे। जब अति उत्साही पढंतुओ ने अपनी बात को बेअसर होते देखा तो अपने पिताओं से इस व्यर्थ प्रोजेक्ट की तथाकथा और उससे होने वाली ज्ञान हानि के विषय में बताया। इस पर पिताओं का एक डेलीगेशन प्रधानाध्यापक से मिलकर धमकी भरे स्वर में बात बतायी, तब जाकर उनके कानों पर जूं रेंगी। उन्होंने उसी क्षण तुगलकी शिक्षक को बुलाया, फटकारा और प्रोजेक्ट बंद करने के आदेश दिये।
शिक्षक भले ही सिफारिश से आये थे, पर थे तो शिक्षक ही न। बस तुरंत कक्षा में आकर प्रोजेक्ट बंद करने का आदेश सुना डाला।
पढंतुओं ने तो कॉपी ही नहीं खरीदी थी तो चित्र कहां एकत्र करते? वे खुश थे लेकिन वे बेचारे जो मां-बाप के धन और अपने तन मन से प्रोजेक्ट में गहराई से डटे थे, जुटे थे- उनका प्रोजेक्ट पूर्ण होने को था--- ऐसे बच्चे क्या करते? अपना मुंह लेकर रह गये बाद में वे अपने-अपने खर्चे का हिसाब लगाते और पढंतुओं, उनके पिताओं, तुगलकी शिक्षक के साथ-साथ प्रधानाचार्य को बुरा भला कहते। मन की इच्छा पूरी नहीं हुई, सो अलग। घर में मां-बाप की डांट, फटकार, मार अलग।
शिक्षक, जो प्रधानाचार्य के आदेश के कारण अपनी तुगलकी बुद्धि से उत्पन्न कार्य से मजा लेने से वंचित रह गये। कोर्स के बाहर के प्रश्न बच्चों से पूछने लगे। बच्चों ने जिनने पिछले दस दिनों से पाठ्य पुस्तकों की धूल नहीं झाड़ी थी, पाठ्यक्रम के प्रश्नों का ही उत्तर नहीं दे पाते, वे कोर्स के बाहर के प्रश्नों का उत्तर कैसे देते? शिक्षक का पूरा गुस्सा बच्चों की धूल झाड़ने में जाया हुआ।
यह केवल एक उदाहरण है। यदि आप अवलोकन के चक्षु, अफवाही मुख और रहस्यालाप श्रवण कर्णों को सजग रखें तो निश्चय ही ऐसे कई तुगलकों से सामना हो सकता है। मैं एक ऐसे युवक को जानता हूं जिसने शादी के मंडप में शादी से इंकार कर दिया। कारण न दहेज था, न दुल्हन अशिक्षित या कुरुप थी। दोनों परिवारों ने अच्छी तरह देखभाल कर रिश्ता तक किया था। लड़का जीनियस था, इंजीनियर था। फिर भी दिमाग के किसी कोने में शायद तुगलकी बुद्धि आ बैठी थी, रावण के गर्दभ शीष की मानिंद। ऐन वरमाला के वक्त उसने शादी करने से इंकार कर दिया।
वधू डर रही थी कि कहीं उसके पूर्व प्रेमी ने कुछ कह तो नहीं दिया? वधू के माँ-बाप चिन्तित थे कि कहीं आयकर विभाग द्वारा पड़े छापे की खबर तो लड़के को नहीं लगी। वर के मां-बाप जो लंबी चौडी रकम लेकर, पूरी वैगन (रेल डिब्बा) भर सामान के साथ बिदाई के मूड में थे, चकराये।
झिझक रहा था दूल्हा---- सैकडों के बीच में कारण किस तरह बताऊं। फिर भी जब वधू ने घूंघट उठाकर, अपने बाप के पैसों से खरीदे जा रहे दुल्हे के चेहरे पर प्रश्नचिह आँका, तो विवश हो दुल्हे को कहना पड़ा – मुझे तुम पसंद नहीं हों---- बड़ा बावेला मचा। वधू अवाक् बाराती घराती अवाक्। वर के बाप ने गश खायी अपनी पत्नी के चेहरे पर पानी के छींटे मारते हुए पूछा – बेटा अखिर बात क्या है? वर ने सामने खड़ी एक लड़की की ओर उंगली उठाकर कहा- मुझे यह लड़की पसंद है, आखिर तुगलकी भौरां जो मस्तिष्क में ज़ोर मार रहा था। पता चला वह घर की नौकरानी थी। वधू अपने प्रेमी के साथ और वर उस पसंदीदा नौकरानी के साथ ब्याहै गए। तुगलकी भौंरा कभी कभी मिलकर खुद का तो फायदा करते ही हैं, सामने वाले का भी फायदा करा देते हैं।
राजनीति जैसे तुगलकी क्षेत्र में इन शेख चिल्लियों की कमी नहीं। अब आप जिद पर अड़ जाएं- मूल्यों, नीतियों, सिद्धांतों और आदर्श को छोड़कर कि आप फलां पद पर ही बने रहेंगे और कोई माई का लाल है जो आपकी शक्ति को डिगा दे? वैसे राजनीतिक पार्टियां, नेता और चेले चपाटे और वर्तमान राजनीति आपको तुगलकी नहीं लगती ? सर्वसंग परित्यागी राजनीति में क्या आए राजनीति का बंटाढार तो हो ही रहा है, जनता की हालत परित्यक्ता स्त्री सी अगर हो रही है तो कारण यह राजनैतिक तुगलकी मानसिकता ही तो है।






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