
विमल बुद्धि दे वाग्देवी हे,
हे वीणा पुस्तक धारिणी l
ममतामयि आलोकपुंज हे,
अज्ञान तिमिर भय हरिणी l
मुखरित कर वाणी पुत्रों की,
अपनी वीणा झंकार से l
सतत विश्व कल्याण निरत हो,
यह भाव बहे हर तार से l
आसीन शाख को काट रहा
जो ऐसे कालिदास को l
सरस अमिय गन्ना स्वरूप
दिया तुच्छ से घास को l
कमल आसन छोड़ के
आओ हे मैया शारदे l
मंझधार में है डूबती
शत शत नमन तू तार दे l
साक्षतमूर्ति वातसल्य की
स्वजनों की नैया पर कर l
हिमगिरि सदृश्य तव पुत्र प्रखर हो
खडे तू दे ऐसा कुछ वर l
नक्षत्र बनें साहित्य गगन के
डूबें न कभी अवसाद में l
हृदतंत्री झंकृत हो जन जन का
लय स्वर भर ऐसी निनाद में ।
रचयिता स्व बजरंग प्रसाद शर्मा






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