लखन सुबोध बता रहे हैं महत्वपूर्ण तथ्य- सुधा भारद्वाज की षड्यंत्र पूर्वक गिरफ्तारी के पीछे मनुवादी फासिस्ट दमन नीति और हमारे कर्तव्य



सुधा भारद्वाज अन्याय के शिकार हुए श्रमिकों, दलितों ,आदिवासियों ,भू-विस्थापितों के बीच एवं इससे ज्यादा शोषक-लुटेरों के बीच एक जाना पहचाना नाम है।शोषित के लिए वे न सिर्फ न्यायलयीन कार्य में बतौर एडव्होकेट के रूप में बल्कि दैनंदिनम गतिविधियों में जन आंदोलनों में सहज सक्रिय व्यक्तित्व की धनी हैं। इसलिए शोषितों में वे अपना ” सुधा दीदी है न “ के रूप में लोकप्रिय हैं ।वहीं शोषकों व उनके दलालों के बीच ” वही सुधा गुंडी -नक्सली ” -जो ब्राम्हण होकर नीच सेवक श्रमिक -दलित -आदिवासियों के बीच रहती हैं।इन दो विपरीत मानकों के बीच सुधा जी के व्यक्तित्व को समझा जा सकता है कि,वे कौन हैं और किस मिट्टी की बनी हैं ।
सुधा जी से मेरा व्यक्तिगत तौर पर बहुत ज्यादा उठना-बैठना नहीं रहा,लेकिन जो थोड़ा भी रहा,वह शायद बहुत ज्यादा रहा है, क्योंकि विचारों की एकता ही वह तत्व है,जो खून-खानदान, जाति-धरम आदि से बहुत बड़ा होता है।मैं सुधा जी के गतिविधियों को जो थोड़ा -बहुत ,कभी -कभार कहीं पढ़ता -सुनता था तो शुरू में यही लगा कि ये वैसे ही कोई ट्रेड यूनियनिस्ट होंगी, जो आमतौर पर ” अर्थवाद ” में रमें -फंसे आम ट्रेड यूनियनिस्ट होते तो हैं ,लेकिन जब उनके संबंध में और ज्यादा जाना,तो मुझे लगा कि वे ट्रेड यूनियनिस्ट तो है, लेकिन सिर्फ “अर्थवाद ” के लिए नहीं, सम्पूर्ण राजनैतिक-सामाजिक समझ -सक्रियता भी है।जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बिलासपुर के नार्मल स्कूल बिल्डिंग में [ पुराना हाई कोर्ट बिल्डिंग ] लगता था ,तो उस समय मैं अपने संस्थागत प्रपत्र टाइप कराने वहां पर स्थित एक टायपिंग/स्टेशनरी दुकान में अक्सर जाया करता था, उस दुकान में बहुत सारे वकील आदि आया -जाया करते थे।उनमें कभी -कभी सुधा जी को भी देखा करता था।लेकिन उनसे मेरा कोई परिचय – संवाद नहीं था।लेकिन एक बात गौर करता था कि, उनका व्यक्तित्व – व्यवहार अन्य आम वकीलों से अलग लगता था ।बहुत सहज स्वरूप -हाव -भाव, अपने काम में रमे रहने,कभी अपने कागजात को देखती -खंगालती ,कभी कहीं भी सड़क किनारे भी अपनी लैपटॉप पर टिपटॉप करती हुई मिल जातीं ।मैं सोचता था कि,किसी उपयुक्त अवसर पर इनसे मिलूंगा ।
वह अवसर आया ,जब हमारी संस्था गुरुघासीदास सेवादार संघ [GSS ] द्वारा गुरु घासीदास के प्रचलित चित्र जिसे मनुवादियों व उनके चेलों ने अपने स्वार्थ के रंग -रूप में ” जपर्रा -साधु-मुनि ” जैसा बना दिया है,और GSS ने इस पर ऐतिहासिक शोध परक चित्र बनवाया और इसका लोकार्पण समारोह मुंगेली में करने का कार्यक्रम बना।इस समारोह में हम सुधा जी को लोकार्पणकर्ता के रूप में आमंत्रित करने का फैसला लिया।इसके लिए उनके ऑफिस में मैं मिला,चर्चा किया और चर्चा में बहुत सारी बातों पर विशेषकर गुरुघासीदास एवं सतनाम आंदोलन पर फैलाए -भरमाए गए जातिवादी स्वरूप एवं GSS के दृष्टिकोण पर लंबी चर्चा हुई,वे बहुत उत्सुकता से बातों को सुनी समझी और बोली की मैं इस कार्यक्रम में जरूर -जरूर जाती,लेकिन अफसोस है कि,इन्ही तारीख में मुझे पूर्व से तय दिल्ली के एक कार्यक्रम में शिरकत करने की वचनबद्धता
है।लेकिन GSS के बाद के और कार्यक्रमों में मुझे बुलाया गया तो मैं जरूर आऊंगी ।लेकिन बाद में भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तारी से आगे ऐसा हो नहीं सका।
सुधाजी से संपर्क -परिचय होने पर उन्होंने अपने सहयोगी -साथियों का परिचय कराया ,जिसमें रिनचिनजी के बारे में उन्होंने कहा इनसे परिचय के बाद हमारे सारे साथियों से परिचय हो जाएगा ।इसके बाद ऐसा ही हुआ।

      दुनियां में जहां भी नाजी -फासिस्ट तत्व हैं या उनकी  सरकारें  बनी [ अब -तक के ज्ञात इतिहास में ] हैं ,वे अपनी लूट -शोषण को छिपाने के लिए लोगों के बीच कथित " लोक हितैषी देश भक्त " बनने - दिखने का नाटक रचते हैं और इस लूट व चेहरे के नकाब को बेनकाब करने वालों को " देशद्रोही ,हिंसक,घातक " और न जाने क्या -क्या उपमा गढ़कर " गाली " देते है।और इस "देशद्रोहियों को गाली-मजम्मत करों अभियान "  चलाने के लिए एक सुसंगठित " परियोजना " चलाते हैं।पूर्व समय में फासिस्ट/नाजियों के बीच इस " परियोजना निर्देशक" का नाम हिटलरी गोए बल्स" के नाम से कुख्यात है।

          लेकिन आज भारत में  जो फासिस्ट हैं  वे सिर्फ फासिस्ट नहीं है वे मनुवाद के मजबूत स्तंभ जातिवाद पर खड़ा फासिज्म है,जिसे " मनुवादी फासिज्म " के नाम से हम प्रयोग करते हैं।यहां का जो  " झुठलरी गोयबल्सी परियोजना " है, उसके सामने 

तो ” हिटलर का गोयबल्सी परियोजना ” बच्चा था।यहां न सिर्फ औपचारिक प्रिंट/दृष्य में बल्कि गली-गली ,ग्रुप-ग्रुप में [ परसनल से लेकर सोशल मीडिया तक] ” गोयबल्सी गुंडे “
[ मनुवादी पंडे -गुंडे ] की झूठ-फरेब की सहायता से सुधा जी एवं देश के जाने -माने बुद्धजीवियों को ” अपराधी ठहराकर ” [ न्यायालय -व्यायालय तो अपनी “भूरी-भूरी ” प्रशंसा करने करवाने में मगन हैं ,अब वे ऐसे अपराधियों के मामलें पर सुनवाई करने में अपना समय बर्बाद नहीं करते ,वे स्वयं मीडिया से ” ज्ञान -संज्ञान ” लेते हैं] बिना मामला सुनवाई के जेलों में निरुद्ध किया गया है।

          क्या था " दोष" सुधा जी एवं अन्य बौद्धिक साथियों का ? वे उस भीमा कोरेगांव [पुणे-महाराष्ट्र से करीब 30 कि. मी. दूर] में जहां ई.1818 में आततायी  मनुवादी पेशवा शासन की सेना के खिलाफ महार सैनिकों ने विजयी युद्ध किया था ,वहां विजय उत्सव के रूप में हर वर्ष (1 जनवरी को) समारोह होता है इस आयोजन को बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर ने संवर्धित किया था। उसकी 200 वीं वर्षगांठ 1 जनवरी 2018 को हजारों -लाखों शोषितों -दलितों ने वहां पर समारोह में शिरकत करने पहुंचे।चूंकि ऐसे आयोजन को मनुवादी फासिस्ट तंत्र अपने लिए खतरा मानते हैं,वे जानते हैं कि, जिन्हें हम झूठ-जतन से जबरन अपना सेवक -चाकर बनाकर रखे हैं, वे अपनी बहादुरी के सही इतिहास को जान जाऐंगे तो हमारी चाकरी -गुलामी छोड़कर अपनी श्रमिक-दलित बिरादरी का राज कायम करेंगे ।इसलिए ऐसे आयोजन को कुचलने उनके गुंडा वाहिनी द्वारा [ जिसमें संभाजी भिड़े नामक वह मनुवादी सेनापति है,जिसे मोदी अपना गुरु मानते हैं] विध्वंस -दंगा किया गया।शासन-प्रशासन ने गुंडों को और उनके नेता को आज तक गिरफ्तार नहीं किया।

              मनुवादी फासिस्ट सत्ता जानता है कि,सबसे बड़ा खतरा वे लोग हैं,जो लोगों को दबाए-छिपाए इतिहास को छान-खोजकर लोगों को जागृत-संगठित करते हैं।अगर ये ऐसा नहीं करेंगे ,तो जनता को तो अफीम चटाकर [ नकली धर्म -इतिहास का नशा ] सुलाए और  उनकी पीठ पर चढ़े रहेंगे। इसलिए बौद्धिको को निशाना बनाया जाता है।इसके नूतन -पुरातन इतिहास में हजारों प्रमाण हैं।

      इन सब जुल्मों से एक दिन मुक्ति मिलेगी-लेकिन वह दिन तभी आएगा ,जब बौद्धिकजन और शोषित जनों की आपसी समझ से ब्यापक एका कायम होगा।यदि बौद्धिक जन,आम श्रमिक-शोषित -दलित  जन से नहीं जुड़ेगा और आम शोषित जन अपनी स्थितियों के दुख निवारण को शोधने-खोजने ,उन्हें बतानेवालों से नहीं जुड़ेगा, सिर्फ " अर्थवाद " में फंसा रहेगा, तो वह दिन नहीं आएगा।

          मजदूर आंदोलन को नेतृत्व देनेवाले शहीद शंकर गुहा नियोगी यदि सिर्फ " अर्थवाद " में फंसे होते तो आज दुनियां  " शाहिद वीरनारायण सिंह" को नहीं जानते ।श्रमिकों - दलितों को  अपनी रोजमर्रा दैनंदिनी में आर्थिक लड़ाई के साथ राजनैतिक-सामाजिक जागृति -चेतना विकसित नहीं होगी, तो जुल्म बढ़ेगा और जब  जागृति का तीसरा नेत्र खुलेगा तो जुल्म भस्म होगा ही।

 मनुवादी फासिस्ट के गुर्गे-दलाल नेता,मीडिया चारों तरफ सूंघ-सूंघ कर शोषितों को भ्रमित करने उनके जाति, क्षेत्र के " अपने नेता " के पीछे घुमा-घुमा कर रखे हुए हैं।जब हम नेता के पीछे नहीं " नीति" के साथ [ पीछे नहीं ] आगे बढ़ेंगे,तो जेल की फाटक खुलेगा और " नीतिवान "   जन नेता  बाहर होंगे। " सुधा जी " हमारें बीच  होंगी।

       *लखन सुबोध* 
      [केंद्रीय संयोजक]

गुरुघासीदास सेवादार संघ.

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