कामेश्वर पांडेय

देश में आंदोलनकारियों का होना लोकतंत्र के फ़ख़्र की बात होनी चाहिए। ज़ायज माँगों के बिना कोई भी आंदोलन लंबे समय तक नहीं टिकता। वैसे भी, लोकतांत्रिक अधिकारों की उपलब्धि और सुरक्षा आंदोलनों के ज़रिए ही होती है। पर प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में आज कहा कि देश में आंदोलनजीवी ‘ज़मात’ पैदा हो गई है। ये ज़मात वकील, विद्यार्धी मज़दूर, किसान हर किसी के आंदोलन में मौजूद रहती है।
अव्वल तो तब्लीगी ज़मात की तर्ज पर आंदोलनकारी ज़मात कहना, वह भी एक प्रधानमंत्री के द्वारा बड़ा ही दुर्भाग्यजनक है। जनसमर्थन के बिना कोई भी आंदोलन सफल नहीं होता। इसलिए आंदोलन तो लोकतंत्र के जीवित होने की पहचान है। मोदी धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की तरह आंदोलन शब्द को भी बुराई के प्रतीक के रूप में हीनता के दर्जे पर धकेल देना चाहते हैं। आंदोलनकारी, यानी अराजक और देशद्रोही।
संसद में अपने आज के संबोधन से उन्होंने जता दिया है कि लोकतंत्र के आगे वे झुकने वाले नहीं। उधर उनके इस रुख से किसानों का गुस्सा और उत्साह और बढ़ रहा है। नयी-नयी जगहों पर महापंचायतें बैठ रही हैं। रोज हजारों-लाखों किसान आंदोलन स्थलों की ओर उमड़ रहे हैं। मोदी इनका मज़ाक उड़ा रहे हैं। वे कार्पोरेट की ताकत के सामने जनता को कुछ नहीं समझते। जमात कहकर मोदी किसानों को तब्लीगियों की तरह हाँकने के मूड में नजर आ रहे हैं। पर आंदोलनकारी जमात में भेड़ें नहीं होतीं। किसान आंदोलन में किसान होते हैं, कर्मकर्ता होते हैं। उनके समर्थक जनता होती है। वे पहले से जानते हैं कि संघर्ष लंबा चलेगा। राकेश टिकैत ने तो दो अक्तूबर तक, और ज़रूरत पड़ी तो आगे भी, आंदोलन चलाने की घोषणा कर दी है। देखना है मोदी इन्हें कब तक सिर्फ़ परजीवी जमात मानते हैं।







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