ये कैसी बात है ?कृषि संशोधन बिल पुनर्विचार की आवश्यकता- राकेश श्रीवास्तव

खाद एवं प्रसंस्करण मंत्री हरसिमरत कौर बादल का इस्तीफा अभी तक शांत एनडीए मे एक हलचल पैदा करता है।वैसे देखने में तो यह एक राजनीतिक पैतरेबाजी लगती है परंतु जहां पर सरकारी लाईन के विरोध में बड़े-बड़े दिग्गज एक लाइन भी नहीं बोल सकते हैं वहां अकाली दल का यह फैसला गठबंधन से हटकर चलने का एक प्रतीक बन सकता है।पीपली,हरियाणा में भारतीय किसान यूनियन के गुरनाम सिंह चढ़ुनी के नेतृत्व में आयोजित निहत्थे किसानों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर जिस पुलिस-प्रशासन ने बर्बतापूर्ण लाठीचार्ज़ किया था उसमे दुष्यंत चौटाला उपमुख्यमंत्री हैं। जेजेपी पार्टी के समर्थन से ही मनोहर लाल खट्टर की सरकार बनी थी।चौटाला की पार्टी किसानों के नाम की ही राजनीति करती है।अब जेजेपी पार्टी के दुष्यंत चौटाला पर भी दबाव बढता जा रहा है है कि वह डिप्टी सीएम का पद त्याग कर किसानों के हित के लिए सामने आयें।
पिपली से निकली जो आग धीरे-धीरे आगे बढ़ती जा रही है उसके पीछे ये तीन अध्यादेश हैं जो अब कानून की शक्ल लेने जा रहे हैं।
*‘किसान( सशक्तिकरण और सरंक्षण ) समझौता मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अध्यादेश 2020’
***‘कृषि उत्पाद, व्यापार और वाणिज्य ( संवर्धन और सरलीकरण ) अध्यादेश 2020’

  • ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश2020

इस समय जब सम्पूर्ण देश कोरोनावायरस के गंभीर संकट से जूझ रहा है और हम प्रतिदिन एक लाख नए मरीजों की संख्या पर पहुंचने वाले हैं,हमारी अर्थव्यवस्था संघर्ष कर रही है,सीमा पर चीन की चुनौती अलग मुंह बाए खड़ी है तब इन तीन अध्यादेशों को इतनी तत्परता से लाने का कारण स्पष्ट नहीं होता है। सरकार कोरोना काल में ढांचागत बदलावों के प्रति अतिरिक्त उत्साहित दिख रही है चाहे वह विनिवेशीकरण हो, निजीकरण हो,श्रम कानूनों में संशोधन की बात हो या अन्य महत्वपूर्ण विषय जहां व्यापक जन प्रतिरोध की आशंका दिखती है।
अब थोड़ी बात अध्यादेश के विषय में।संविधान के अनुसार अध्यादेश ऐसे कानून हैं ,जिन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर भारत के राष्ट्रपति (भारतीय संसद) द्वारा प्रख्यापित किया जाता है ,जिसका संसद के अधिनियम के समान प्रभाव होगा। उन्हें केवल तभी जारी किया जा सकता है जब संसद सत्र में नहीं हो।वे भारत सरकार को तत्काल विधायी कार्रवाई करने में सक्षम बनाते हैं।अध्यादेश या तो संसद के छह सप्ताह के भीतर संसद द्वारा उन्हें मंजूर नहीं किए जाने पर,या यदि दोनों सदनों द्वारा अस्वीकृत प्रस्तावों को पारित कर दिया जाता है, तो वे कार्य करना बंद कर देते हैं।छह महीने के भीतर संसद का सत्र होना भी अनिवार्य है।
जब संसद का सत्र सितंबर में संभावित था तो इतनी जल्दबाजी मे अध्यादेश लाना संसद में इन अध्यादेशों पर एक व्यापक और सार्थक बहस से बचने का प्रयास ही हो सकता है क्योंकि संख्या बल के आधार पर यह पास तो ऐसे भी हो जाता।

सरकार का मानना है इन कानूनों के आने पर फसलों का उत्पादन बढ़ेगा,किसानों की हालत बेहतर होगी।उनको उनके उत्पाद का सही मूल्य मिलेगा।सरकार कह रही है की एमएसपी को समाप्त नहीं करेगी।उसका कहना है कि विपक्षी दल किसानों को भड़का कर राजनीति कर रहे हैं। सरकार इन कानूनों के माध्यम से कृषि व्यापार से तमाम नियंत्रण हटाकर मुक्त व्यापार व्यवस्था लागू करना चाहती है।इस बिल के पैरोकारों का मानना है कि किसानों को फ़सलों के और अधिक दाम मिलेंगे।इन अध्यादेशों के अनुसार बिचौलिए या आढ़तियों के स्थान पर निर्यातक ,भंडारण व प्रसंस्करण कंपनियां और बड़े औद्योगिक घराने किसान से सीधा माल लेंगे। इस कानून मे किसानों के हितों की बजाय कारपोरेट घरानों के हितों की रक्षा की जा रही है।इन अध्यादेशों में फसलों को एम.एस.पी. पर ख़रीदे जाने का उल्लेख नहीं है।समर्थन मूल्य या एम.एस.पी. के पीछे संकल्पना थी कि किसान को उसके लागत मूल्य को आधार मानकर एक न्यूनतम मूल्य पर सरकारी खरीद का प्राविधान हो जिससे किसान को नुकसान ना हो और वह आगे भी फसल को उगाने के लिए उत्प्रेरित रहे। हमारे देश में पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन और उसका बफर स्टाक होने का एक प्रमुख कारण एमएसपी का होना भी है,जिस पर सरकार किसान से मौटे तौर कृषि उत्पादों को लेती है।आंकड़ों के अनुसार पिछले सात वर्षों में एमएसपी पर गेहूं बेचने वालों की संख्या 100% बढ़ी है जबकि धान बेचने वालों की संख्या 70% बढ़ी है।उपलब्ध जानकारी के अनुसार आज हमारे एफ.सी.आई. के गोदामों में लगभग 750 लाख टन गेँहू ,चावल के बफर-स्टॉक भरे हैं।इसी एमएसपी व्यवस्था के कारण कोरोना काल में देश का किसान रीढ की हड्डी बन कर सामने डटा रहा और महामारी के संकट के दौरान 80 करोड़ जनता को इसी भंडार से अन्न बांटा गया। कल्पना करिए कि यदि अनाज प्राइवेट गोदामों में होता तो क्या होता ? यदि आप सोचते हैं कि वह जनता की मदद करता तो बेहतर है कि आप इस मृग मरीचिका से जल्दी से जल्दी बाहर आ जाए क्योंकि जो वर्ग अपने कर्मचारियों को न खिला सका बस देश के सामान्य जन के लिए क्या उदारता दिखाएगा।

कांट्रैक्ट फार्मिंग के अन्तर्गत किसान और ठेकेदार यानी कारपोरेट कंपनी या बड़े व्यापारी के बीच में एक करार हो जाएगा जिसमें दाम पहले से तय रहेंगे,और भी शर्तें रहेंगी परंतु यदि मांग और उत्पादन मैं संतुलन बिगड़ता है तो बड़े ठेकेदार अनाज खरीदने के समय तमाम नियम बताकर फसल की खराब गुणवत्ता बताकर फसल को औने-पौने दाम पर खरीदने का प्रयास करेंगे और किसान किसी न्यायालय को भी नहीं जा सकेगा।अब इस परिस्थिति में वह केवल माई बाप यानी सरकार पर निर्भर रहेगा।उसको किसी न्यायालय से कोई राहत मिलने की संभावना नहीं रहेगी।
जहाँ तक तीसरे अध्यादेश ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश’ की बात है तो इसके माध्यम से सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम ,1955 की धारा 3 में बदलाव प्रस्तावित किया है। अनाज , दालें , आलू ,प्याज और खाद्य तेलों की बड़ी प्रसंस्करण व निर्यातक कंपनियों , थोक विक्रेताओं , वैल्यू चेन के बड़े आपूर्तिकर्ताओं के लिए कोई भंडारण सीमा नहीं होगी।यह धारा अब केवल युद्ध . महामारी या बाज़ार में तेजी-मंदी की उथल-पुथल वाली स्थिति में ही लागू हो सकेगी। इससे देश के आम उपभोक्ता प्रभावित होंगे। बड़े व्यापारी और कारपोरेट घराने इन चीजों के मूल्यों को अपने हिसाब से निर्धारित करेंगे। बाजार की आदत के अनुसार यह लोग फसल आने पर कम दर से खरीद कर उनका भंडारण कर लेंगे।उसकी बाजार में कमी पैदा करके बाद में महंगी दरों पर भेजेंगे बेचेंगे।अनाज , दाल , आलू , प्याज आदि आम आदमी के दैनिक खानपान का हिस्सा हैं अतः आम आदमी ज्यादा प्रभावित होगा।

इस व्यवस्था मे प्रावधान है की किसान को अपनी फसल बेचने पर जो मूल्य मिलेगा उसमें सबसे पहले लिए गए कर्ज की धन राशि काटकर उनका ऋण समायोजित किया जाएगा।उसके बाद जो राशि बचेगी वही उनको देय होगी। इसका एक अर्थ यह भी है यदि किसान की फसल खराब हो गई और उसको आंशिक राशि मिली तो उसका जीवन यापन भी खतरे में पड़ जाएगा।मैं यहां पर लोन वापस न देने की पैरवी नहीं कर रहा हूं परंतु यदि किन्हीं परिस्थितियों से उसकी फसल गड़बड़ होती है तो उसके सामने अपने जीवन यापन के लिए कोई मार्ग उपलब्ध नहीं होगा।

इन अध्यादेशों के बाद किसानों को न्याय भी आसानी से उपलब्ध नहीं होगा।अभी तक भुगतान संबंधी विवाद स्थानीय एस.डी.एम. के यहां निपट जाते थे।अपील सुनने की शक्तियां न्यायिक अधिकारियों मे विहित थीं। पर इन अधिनियमों में यह शक्तियां प्राधिकृत सरकारी अधिकारियों को दे दी गई हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अब सारी शक्तियों का एकीकरण सरकारी अधिकारियों के पास ही रहेगा। किसानों को न्यायालय से न्याय नहीं मिलेगा। यह संविधान की शक्ति के पृथ्थीकरण के सिद्धांत के भी विरूद्ध है जो न्यायिक शक्तियों को सरकार के आधीन नहीं रखता है।इससे सरकार की इच्छा के बारे में संदेह पैदा होता है।सरकारी अधिकारीयों के सरकार के अधीन होने के कारण कारपोरेट क्षेत्र के उद्योगपतियों के पक्ष में झुकने का खतरा बना रहता है।इन अध्यादेशों से किसान की न्यायिक प्रणाली तक की पहुंच को बाधित कर दिया गया है।

पुरानी सरकारों ने भी वर्तमान स्वरूप की मंडियां बहुत आसानी से नहीं बनाई थी। इसके लिए बहुत संघर्ष हुआ। संविधान के अनुसार कृषि क्षेत्र राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में है।मंडी बनाने का काम और उसके संचालन के कार्य से संबंधित नियम बनाना और उसकी देखभाल करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। ।संविधान के अनुसार कृषि उत्पादों के अंतर-राज्यीय व्यापार को सुचारू रूप से चलाने का अधिकार केंद्र सरकार का है।जी.एस.टी. कानून से केंद्र का हस्तक्षेप बढ़ गया है । सरकार का कहना है कि इन तीनों कृषि अध्यादेशों के माध्यम से एक राष्ट्र एक बाज़ार का सिद्धांत लागू हो जाएगा जो किसान के हित में होगा। परंतु वास्तव में यह राज्यों के कृषि संबंधी काम में हस्तक्षेप की अनाधिकार चेष्टा है । इन अध्यादेशों से हमारे संविधान में उल्लिखित संघीय ढ़ाँचे का क्षरण ही हुआ है।

इस कानून के अंदेशों को दूर करने के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी ने भी एमएसपी एवं अन्य मामलों पर आश्वस्त करने का प्रयास किया है परंतु उनकी बातों से लोगों के मन की आशंका खत्म नहीं हो रही है। दूसरा यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी भी इसके समर्थन में थी कांग्रेस के समर्थन में बुझाने से हो जाने से किसानों के हित की लड़ाई का संघर्ष बीच में छोड़ा नहीं जा सकता है। अनेक जन विरोधी नीतियों में दोनों प्रमुख जनों की नीतियां एक ही हैं परंतु उसके सामान जन्म का संघर्ष समाप्त नहीं हो सकता है आज आवश्यकता है की इन बिलों को पर पुनर्विचार हूं और इसमें से छोटे हो मजबूरी और मझोले किसानों के हितों की रक्षा की जाए।

इन सब कानूनों को ध्यान में रखते हुए कहीं आपको चंपारण, नील,निलहे,रैयत,सट्टा,इकरारनामा,तिनकठिया, नील की खेती तो नहीं याद आने लगे हैं।

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