
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि एक साहित्य ही ऐसा है जो किसी भी राजनयिक के जीवन में विशेष भूमिका निभाता है। आप सोच कर देखो जब आप भी किसी दूसरे देश में रहने की तैयारी कर रहे होते हैं ,वो भी एक ऐसी जगह जहां आप पहले कभी नहीं गए, उस देश में किसी कहानी के एक पात्र की भूमिका में खुद को ही भूल जाना सबसे अच्छी शुरुआत मानी जाती है। एक हमारे बहुत ही करीबी महिला है जिनको हम बड़ी दीदी बोलता हूं, जो लंदन में वर्षों से रह कर हिंदी साहित्य पढ़ाती है और हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग सम्मेलनों का आयोजन करती रहती है, जिसके लिए पिछले वर्ष ही उनको दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय आदर्श महिला अवार्ड भी मिला था ,इस अवार्ड समारोह में मैं भी विशेष गेस्ट के रुप में मौजूद था। लंदन में रहकर हिंदी को बढ़ावा देने के साथ ही वंचित बच्चों के लिए भी वह काम करती हैं, मुझे भी सम्मानित करने के लिए उनकी संस्था ने आमंत्रित किया लेकिन कोविड 19 से उपजी वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण समारोह को अभी स्थगित कर दिया गया है । इससे पता चलता है कि किसी भी देश की समृद्ध पृष्ठभूमि और उसकी भावी चुनौतियों के संबंधों को समझने का सबसे अच्छा तरीका है साहित्य का अध्ययन। आज कहीं ना कहीं भारत के साथ उसके साहित्य की विशाल मौजूदगी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। चाहे वह ब्रिटेन में भारतीय विरासत के लेखकों का प्रसार हो, महान भारतीयों के अनुदित कार्य हो, या दोस्त दोनों देशों के नागरिकों की यात्राओं के मुखर वृतांत हो, ब्रिटेन भारत की साहित्यिक कड़ियों के जीवंत संबंध अद्भुत हैं।
देखे तो ई .एम .फोस्टर्र से लेकर अमित चौधरी तक कई महान लेखकों ने इन देशों को छोड़ने और पुनः लौटने की कहानियां लिखी है। इस तरह की लेखन हमें नई जगहों की और मुद्दों की समझ बनाने, रहस्योद्घाटन करने और अपरिचित को परिचित बनाने में मदद करते हैं।
दोस्त हमारे साहित्य इतिहास के बीच संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है। सिर्फ एक रचनात्मक उपकरण से कहीं अधिक महान साहित्य शिक्षित करता है, जानकारी देता है, अवसर पैदा करता है, अंतर्दृष्टि देता है और इसके साथ ही नवाचार लाता है। इस सांस्कृतिक संबंध की गहराई को लेकर हमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि यूके के प्रकाशक हमारे रचनात्मक उद्योग का एक खास हिस्सा है। 2015 की नीलसन रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा अंग्रेजी भाषा का प्रिंट पुस्तक बाजार है। निसंदेह भारत और ब्रिटेन के बीच ‘ लिविंग ब्रिज ‘ है यानी कि जीवंत सेतु शब्द जिसका पहली बार प्रयोग हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने दोनों देशों के बीच संस्कृति और विचारों के अनूठे आदान-प्रदान को दर्शाने के लिए किए ।
आपको बता दें कि ब्रिटेन के साहित्य क्षेत्र में भारतीय मूल के लेखकों का बहुत बड़ा प्रभाव है । 1971 में वीएस नायपॉल की पुस्तक ‘ इन ए फ्री स्टेट ‘ से लेकर दोस्तों 2008 में अरविंद अडिगा की ‘ द व्हाईट टाईगर ‘ तक 5 से अधिक भारतीय मूल की शख्सियत है जी की बुकर पुरस्कार से सम्मानित हो चुके है, दोस्तों यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है अपने भारत के लिए ।
आज भारतीय मूल के लेखक यूके के साहित्यिक और अकादमिक जीवन में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। इसका उदाहरण देखें तो अमित चौधरी जोकि वर्तमान में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंगिला में प्रोफेसर और समकालीन साहित्य पढ़ा रहे हैं। इसी प्रकार आज ब्रिटिश लेखकों को भी अपने भारत में बहुत पसंद किया जा रहा है। आज हम इस सांस्कृतिक संबंध की गहराई को लेकर कहीं से भी आश्चर्यचकित नहीं है क्योंकि यूके के प्रकाशक हमारे रचनात्मक उद्योगों का बहुत ही खास हिस्सा आज है। पिछले वर्ष ही ब्रिटेन में करीब 5.7 अरब पाउंड के इस उद्योग ने लगभग 20 करोड़ किताबों की बिक्री की,जबकि यूके दुनिया में भौतिक पुस्तकों का सबसे बड़ा निर्यातक है। देखो ना पिछले वर्ष ही यूके के प्रकाशन संगठन ने कहा था कि भारत के पास दुनिया में सबसे रोमांचक प्रकाशन उद्योग है।
दोस्तों साहित्य के लिए हमारा साझा स्नेह और साझे संदर्भ बिंदुओ ने भी जीवंत सेतु निर्माण में मदद की है,जिसकी दोस्त आज बड़ी कुशलता के साथ देखभाल भी की जा रही है। ईश्वर करे कि यह सफर ऐसे ही अनवरत जारी रहे, और हमारा साहित्य दिन पर दिन बढ़ता रहे।
विक्रम चौरसिया






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