बेसहारा विक्षिप्तजनों की सुध लें


बस स्टैण्ड, बाजार, रेल्वे स्टेशन जैसे स्थानों पर अक्सर हमें मैले कुचैले कपड़ों या बिना कपड़ों के इधर उधर घूमते या बैठे विभिन्न आयु वर्ग के विक्षिप्त महिला पुरूष दिखाई देते हैं। ऐसे लोगों में, स्वयं घर छोड़ कर निकले गये लोगों के साथ ही साथ ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें उनके परिजन, विभिन्न कारणों जैसे ईलाज के लिए पैसों की कमी, पारिवारिक कलह, असुरक्षा या जानबू़झकर जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने के लिए, सार्वजनिक स्थलों पर छोड़ देते हैं। सार्वजनिक स्थलों पर विचरण कर रहें ऐसे विक्षिप्तजन कभी कभी हिंसक भी हो जाते हैं। जिससे कानून व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति उत्पन्न हो जाती हैै। इसके अतिरिक्त ये स्वयं भी हर समय खतरे में जी रहे होते हैं। बीमारी, दुर्घटना की आशंका हमेशा बनी रहती है। विशेष रूप के महिला विक्षिप्तों के लिए स्थिति और भी भयावह हो जाती है। ऐसे विक्षिप्त महिलाओं के असामाजिक तत्वों के हाथों यौन हिंसा का शिकार होने परिणामस्वरूप गर्भवती हो जाने की खबरें आऐ दिन समाचार प़़त्रों आती हैं। ऐसी एक गर्भवती महिला के गर्भपात करने की अनुमति मांगे जाने का मामला हाल ही में न्यायपालिका की चौखट पर पहुंचा था। परन्तु प्रकियागत विलंब के कारण समय रहते अनुमति नही मिल सकी। यह स्थिति और भी अधिक सोचनीय व पीड़ादायक है। ऐसे असुरक्षित विचरण कर रहे विक्षिप्तजनों के प्रति प्राथमिक दायित्व निकटतम थाने की होती है, जिस पर अपने क्षेत्राधिकार में घूम रहे विक्षिप्तजनों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी होती है। ताकि उन्हें सक्षम न्यायालय के आदेश पर समुचित चिकित्सकीय जांच के पश्चात पुनर्वास केन्द्र भेजा जा सके। परन्तु थाने के कर्मी संसाधनों की कमी का रोना रोते पाये जाते हैं। किसी तरह न्यायालय तक पहुंच गये मामलों को पुनर्वास केन्द्र तक पहुंचाने में भी बहुत सी व्यवहारिक दिक्कतें गिनाई जाती हैं। विक्षिप्तजनों के समुचित उपचारण के सम्बंध में बने नियमों के पालन में जो भी व्यवहारिक समस्यायें सामने आती है, उन्हें दूर करने की आवश्यकता है। समाज के तथाकथित जिम्मेदार लोंगो को भी आगे आना होगा। सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को केवल छायाचित्र लेने, प्रेस विज्ञप्ति, सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रखना कतई सही नहीं है। तथा यह भी उचित नहीं कि हम ऐसे विक्षिप्तजनों को मात्र खाना कपड़ा देकर उन्हें उनके हाल पर छोड़ के अपनी शेष जिम्मेदारी के मुंह मोड़ लें। विक्षिप्तजनों के साधन संपन्न परिजनो भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। नए उच्च स्तरीय चिकित्सालयों व् पुनर्वास केन्द्रो की स्थापना के साथ मौजूद केन्द्रो की व्यवस्था सुधारे जाने  की जरूरत है। इनके सुचार सञ्चालन के लिए उच्च प्रशिक्षित चिकित्सकों व् कर्मियों की तैनाती करनी होगी, रिक्त पदो को भरना होगा। कारगर औषधियों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। विक्षिप्तजनों को भी संविधान द्वारा उतने ही अधिकार प्राप्त हैं जितने किसी भी भारतीय नागरिक को प्रदत्त हैं। अत उन्हें  भी स्वस्थ्य गरिमापुर्ण जीवन जीने को अधिकार दिलाए जाने की समुचित व्यवस्था करनी ही होगी।
ऋषभ देव पाण्डेय
शिवरीनारायण
जांजगीर चाम्पा
छत्तीसगढ़

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