बेटी ……तुम्हारे लिये
सुमन सी खिलो ,
सरिता सी बहो ।
नये समाज का ,
ढांचा तुम गढो ।
कोयल सी कूक हो वाणी में ,
मधुवन महके आचरण में ।
ऊंचा उठो यूं जिंदगानी में ,
जग पुष्प बिखेरे चरणों में ।

यूं करो तुम रोशनी ,
ज्यूं चॉंद आसमॉं पर ।
सितारे सी चमको सदा ,
ख्याति के आकाश पर ।
गुलाब सी पल्लवित हो ,
कविता सी मुखरित हो ।
मोगरे की कली सी ,
पतझड में भी अंकुरित हो ।
डॉक्टर मंजुला साहू “निर्भीक






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